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पश्चिम एशिया के संदर्भ में हूती उग्रवादी शायद ही कभी चर्चा का केंद्र बनते हैं। वे तभी सुर्खियों में आते हैं, जब इजराइल पर मिसाइलें दागी जाती हैं, लाल सागर में व्यावसायिक जहाजों पर हमले होते हैं या यमन में उनके ठिकानों पर हमले होते हैं। उन्हें ईरान का प्रॉक्सी भर मान लिया जाता है। पर यह आकलन उनकी रणनीतिक अहमियत को समझाने में सक्षम नहीं। हूती अब एक स्थानीय उग्रवादी संगठन से बदलकर दुनिया का सबसे प्रभावशाली नॉन-स्टेट सैन्य संगठन बन चुके हैं। उन्होंने बड़ी नौसैनिक ताकतों को चुनौती देने, व्यस्ततम समुद्री मार्गों में से एक को बाधित करने और लंबी दूरी तक अपनी सैन्य शक्ति के प्रदर्शन की क्षमता दिखाई है, जो पहले केवल सम्प्रभु देशों के पास होती थी। आधुनिक वॉरफेयर की बदलती प्रकृति को समझने के लिए अब हूतियों को समझना भी जरूरी है। हूती संगठन 1990 के दशक के दौरान उत्तरी यमन में एक सामाजिक-धार्मिक मुहिम के तौर पर उभरा था। यमन की लंबी अस्थिरता ने इसे शक्तिशाली सशस्त्र संगठन बना दिया। 2014 में राजधानी सना पर उनके कब्जे के बाद गृहयुद्ध छिड़ गया था, जिसमें सऊदी अरब, यूएई और अप्रत्यक्ष रूप से ईरान भी शामिल हो गया। आज उत्तरी यमन के बड़े हिस्से पर हूतियों का नियंत्रण है। वे किसी उग्रवादी संगठन की तरह कम और गवर्निंग अथॉरिटी की भांति अधिक काम करते हैं। इसमें संदेह नहीं कि हूतियों को मिसाइल और ड्रोन तकनीक, प्रशिक्षण, खुफिया और राजनीतिक सहायता देकर उनकी सैन्य क्षमता बढ़ाने में ईरान की भूमिका निर्णायक रही है। फिर भी, दोनों के रिश्ते को सीधे नियंत्रण के बजाय रणनीतिक साझेदारी के रूप में बेहतर समझा जा सकता है। हूती लगातार ऐसे उद्देश्यों के लिए काम कर रहे हैं, जो ईरान के क्षेत्रीय हितों के अनुरूप तो हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि ऐसा वे सीध तेहरान के निर्देशों पर कर रहे हों। हालिया ईरान युद्ध ने इसी हकीकत को उजागर किया। ‘एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस’ अब केंद्रीय तौर पर नियंत्रित किसी गठबंधन के बजाय साझेदारों के नेटवर्क जैसा दिखाई देता है। हूतियों की अहमियत महज उनकी विचारधारा नहीं, बल्कि उनकी भौगोलिक स्थिति में भी निहित है। उनका दबदबा बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट पर है, जो लाल सागर को अदन की खाड़ी और हिंद महासागर से जोड़ने वाला संकरा समुद्री मार्ग है। स्वेज नहर का उपयोग करने वाले सारे जहाज इसी रास्ते से गुजरते हैं। ऐसे में हूतियों का समर्थन करके ईरान ने नौसेना बनाने में खर्च किए बगैर ही दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक पर अपना अप्रत्यक्ष दबाव कायम कर लिया। हूतियों की अत्याधुनिक सैन्य क्षमता उन्हें दूसरे उग्रवादी संगठनों से अलग बनाती है। उनके पास बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलें, सशस्त्र ड्रोन, एंटी-शिप मिसाइलें, अनमैन्ड सर्फेस वेसल्स और समुद्री बारूदी सुरंगें हैं। इससे भी अहम यह है कि उन्होंने बार-बार इन हथियारों का प्रभावी प्रदर्शन किया है। व्यावसायिक जहाजों पर उनके हमलों के कारण अनेक जहाजों को दिशा बदल कर केप ऑफ गुड होप होकर जाना पड़ता है। इससे ढुलाई लागत, बीमा प्रीमियम और वैश्विक सप्लाई चेन में सामान पहुंचने का समय बढ़ गया है। बिना किसी नौसेना या वायुसेना के बहुत कम नॉन-स्टेट संगठन ऐसा व्यापक असर डाल पाए हैं। भारत के लिए हूतियों का अनुभव एक महत्वपूर्ण रणनीतिक सबक देता है। भारत ने अपने सतत राजनीतिक, सैन्य और खुफिया प्रयासों के जरिए सीमाओं पर ऐसे खतरों को काफी हद तक निष्प्रभावी किया है। फिर भी बदलती भू-राजनीति निष्क्रिय नेटवर्कों को फिर सक्रिय कर सकती है। बाहरी समर्थन से उनकी युद्ध-क्षमता तेजी से बढ़ सकती है। हूती हमें याद दिलाते हैं कि भविष्य की सुरक्षा चुनौतियां ऐसे नॉन-स्टेट संगठनों से भी पैदा हो सकती हैं, जो सीमाओं और पारंपरिक युद्धक्षेत्रों से परे सक्रिय हैं। केवल सैन्य कार्रवाई से हूतियों का सफाया नहीं किया जा सकता। वर्षों तक सऊदी अरब के नेतृत्व वाले सैन्य अभियान और बाद में अमेरिका-ब्रिटेन के हमलों ने उनकी सैन्य क्षमताओं नुकसान पहुंचाया, लेकिन उन्हें युद्ध का अधिक अनुभव भी दे दिया।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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सैयद अता हसनैन का कॉलम:अब उग्रवादी संगठनों के पास भी है देशों जैसी सैन्य ताकत
