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शेखर गुप्ता का कॉलम:एक दुष्चक्र में फंस गए हैं देश के स्टूडेंट्स




धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद प्रदर्शनकारी अपने घर लौट गए हैं, लेकिन युवाओं की परेशानियां अभी खत्म नहीं होंगी। आज के समय में भारतीय बच्चों का बचपन सबसे ज्यादा तनाव भरा और प्रतियोगिता वाला बन गया है। ‘नीट’ को ही लें। इस साल 22 लाख बच्चों ने परीक्षा दी। 5 फीसदी को एमबीबीएस की 1,39,489 सीटों के लिए चुना गया। इनके अलावा 25-35 हजार बच्चे एमबीबीएस की पढ़ाई के लिए विदेश जाएंगे- खासतौर से यूरोप, फिलिपींस और बांग्लादेश तक। ये अगर लौटकर भारत में डॉक्टरी करना चाहेंगे तो उन्हें नीट में 50% अंक के कट-ऑफ से ज्यादा नंबर लाने होंगे। यह बताता है कि हमारे यहां डॉक्टरों की कमी क्यों है। इसके बाद भी 20 लाख बच्चे बचे रहते हैं। उनमें से कई ने कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट भी दिया होगा, ताकि वे केंद्रीय विश्वविद्यालयों और उनके कॉलेजों में दाखिला ले सकें, जिनमें आगे की अपनी चुनौतियां हैं। इनके अलावा कई लाख दूसरे बच्चे इंजीनियरिंग कॉलेजों में दाखिले के लिए जेईई की परीक्षा दे रहे होंगे। लेकिन इस पहली सीढ़ी को पार कर लेने के बाद भी प्रतियोगी परीक्षाओं से मुक्ति नहीं मिलती, चाहे पोस्ट-ग्रेजुएशन करना हो या पीएचडी, टीचिंग के जॉब हों या और कुछ। भारतीय मध्यवर्ग या इससे नीचे के परिवारों के बच्चे 15 साल की उम्र से ही कोचिंग क्लासों, कॉम्पीटिशन, पेपर-लीक और फिर से परीक्षा देने के अंतहीन जाल में उलझ जाते हैं। अब आप समझ सकते हैं कि इतनी बड़ी तादाद में बच्चे और कई तो अपने अभिभावक समेत जंतर-मंतर पर क्यों इकट्ठा हुए थे। बच्चों के पास पढ़ाई के अलावा दूसरी गतिविधियों तक के लिए समय नहीं है। फिर भी हम पूछते हैं कि खेलों में हम इतने पीछे क्यों हैं? इस पेंच को समझने के लिए जरा उस खेल के खिलाड़ियों के स्वरूप पर नजर डालिए, जिसमें हमें विश्व स्तरीय प्रतिभाएं मिल रही हैं। क्रिकेट में हर फॉर्मेट के अलावा आईपीएल से लेकर दर्जनों दूसरी स्थानीय लीगों में प्रायः हर फ्रेंचाइजी में आपको कॉलेज की ग्रेजुएट की पढ़ाई कर चुका कोई खिलाड़ी शायद ही मिलेगा। ये प्रतिभाएं दसवीं क्लास के स्तर पर ही चुन ली जाती हैं। वैभव सूर्यवंशी इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। हमारी शिक्षा व्यवस्था बच्चों पर रटंत विद्या का बोझ डालकर और प्रतियोगी परीक्षाओं में ‘बाजी मारने’ के लिए धकेलकर तमाम प्रतिभाओं का गला घोंट देती है। इस तरह हम ऐसे आक्रोशितों की पीढ़ियां तैयार कर रहे हैं, जो खुद को उपेक्षित और पीड़ित महसूस करती हैं। किसी मंत्री को बदलने से इस सामूहिक दमन का समाधान नहीं होने वाला। इसे जड़ से समाप्त करना होगा! मौजूदा सरकार के पहले कार्यकाल में नीट था ही नहीं। यूपीए ने भी मेडिकल कॉलेजों में दाखिले की प्रक्रिया को केंद्रीकृत बनाने की कोशिश की थी। लेकिन 2013 में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने उस समय के नीट को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) ने 2010 में नीट का गठन निजी मेडिकल कॉलेजों में दाखिले की प्रक्रिया को परोक्ष रूप से अपने कब्जे में लेने के इरादे से किया था। 2013 के फैसले को चुनौती दी गई और 2016 में पांच जजों की पीठ ने इसे रद्द कर दिया। अब नीट न्यायपालिका के आदेश से गठित संस्था बन गई। यूपीए के दौर में केंद्रीकरण पर जोर कई निजी मेडिकल कॉलेजों में कैपिटेशन फीस पर रोक लगाने के समाजवादी चिंतन के तहत दिया गया। जब वे दाखिला देने के बारे में फैसला नहीं कर पाएंगे तो जबरन फीस वसूली कैसे करेंगे? इस लिहाज से, यह मेडिकल शिक्षा के राष्ट्रीयकरण जैसा है। और चूंकि मेडिकल शिक्षा पर दक्षिणी राज्यों और महाराष्ट्र का वर्चस्व था, इसलिए एमसीआई और केंद्रीय सत्ता ने आबादी के आधार पर नए मेडिकल कॉलेज के लिए लाइसेंस देने का आदेश देकर इस उद्योग का गला घोंटने की कोशिश की। इस तरह, प्रति 10 लाख की आबादी पर एक मेडिकल कॉलेज के लिए लाइसेंस देने का फैसला किया गया। दक्षिणी राज्यों और महाराष्ट्र ने इसके खिलाफ दबाव डाला और फैसले को खारिज कर दिया गया। यह तथ्य भी है कि कई नेता मेडिकल कॉलेजों के मालिक हैं। नीट से पहले तमाम राज्यों ने दाखिले की अपनी परीक्षाएं और प्रक्रियाएं लागू कर रखी थीं और स्कूली बच्चों को इस राष्ट्रीय दबाव से निजात मिली हुई थी। केंद्र सरकार भी बड़े पैमाने पर परीक्षाएं आयोजित करने के खतरों से बची हुई थी। लेकिन सरकार देश भर में उच्च शिक्षा को अपने और कड़े नियंत्रण में लेने के लिए नया कानून बनाने को तैयार बैठी है। ‘विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, 2025’ क्या कहता है? इसमें कहा गया है कि उच्च शिक्षा आयोग और तीन नियमन परिषदों का गठन किया जाएगा, जिनमें यूजीसी, एआईसीटीई और एनसीटीई आदि को समाहित कर दिया जाएगा और ये विश्वविद्यालयी, तकनीकी तथा शिक्षक आदि की शिक्षा की निगरानी करेंगे। शुक्र मनाइए कि संसद की स्थायी कमिटी ने इस पर फिलहाल रोक लगा दी है। सरकार ने ‘सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट’ के तहत एनटीए के गठन के साथ केंद्रीकरण करने में जो सफलता हासिल की थी, उसे मुकम्मल करने के लिए नीट का गठन किया गया था। माना जाता है कि एनटीए ही नीट, जेईई, यूजीसी-नेट (रिसर्च) और केंद्रीय विश्वविद्यालयों में अंडर-ग्रेजुएट तथा पोस्ट-ग्रेजुएट कोर्स में दाखिले के लिए कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट परीक्षाओं का आयोजन करेगा। यह महज एक ‘सोसाइटी’ को बहुत भारी अधिकार देने का मामला है। सत्ता के अति-केंद्रीकरण की कीमत सरकार को चुकानी पड़ रही है। मंत्री तो आते-जाते रहेंगे, लेकिन अगर आप समस्या का जड़ से इलाज करना चाहते हैं तो नीट से शुरू कीजिए। सभी तकनीकी शिक्षा में दाखिले का विकेंद्रीकरण कीजिए और राज्यों को उनकी स्वायत्तता वापस दीजिए। एनटीए को खत्म कीजिए। हमारे संघीय परिवार में राज्यों को वयस्कता का दर्जा दीजिए। शिक्षा संस्थानों के मुनाफे को वैधता दीजिए और सैकड़ों और कॉलेजों को स्थापित होने दीजिए। और मैं तो इमरजेंसी दौर के 42वें संविधान संशोधन को रद्द करने तक की बात करूंगा, जिसने शिक्षा को समवर्ती विषयों की सूची में डाल दिया था। इस तरह राज्यों की स्वायत्तता बहाल कीजिए। हम कह सकते हैं कि यह सब नहीं किया जाएगा, लेकिन सुझाव देने में क्या हानि है? जड़ से इलाज जरूरी है…
मंत्री तो आते-जाते रहेंगे, लेकिन अगर आप समस्या का जड़ से इलाज करना चाहते हैं तो नीट से शुरू कीजिए। सभी तकनीकी शिक्षा में दाखिले का विकेंद्रीकरण कीजिए और राज्यों को उनकी स्वायत्तता वापस दीजिए। एनटीए को खत्म कीजिए और सैकड़ों और कॉलेजों को स्थापित होने दीजिए। (ये लेखक के अपने विचार हैं)



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