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आज का एक्सप्लेनर:खामेनेई के जनाजे में न पीएम मोदी जाएंगे, न विदेश मंत्री; राज्यपाल और राज्यमंत्री क्यों भेज रहे, भारत की स्ट्रैटेजी क्या




अयातुल्लाह अली खामेनेई को हत्या के 131 दिन बाद सुपुर्द-ए-खाक किया जाना है। 6 दिन के राजकीय जनाजे में ईरान दुनियाभर से नेताओं को बुला रहा है। 23 जून को राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने पीएम मोदी को भी न्योता दिया। ईरानी और भारतीय सूत्रों के मुताबिक भारत सरकार ने एक डेलीगेशन भेजने का फैसला किया, जिसमें न पीएम शामिल हैं और न विदेश मंत्री। आखिर न्योता मिलने के बावजूद पीएम मोदी खुद क्यों नहीं जा रहे, अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच भारत किस दुविधा में है और क्या संतुलन साध पाएगा; आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: पीएम मोदी नहीं, तो ईरान कौन जा रहा है? जवाबः खामेनेई के जनाजे में शामिल होने के लिए भारतीय डेलीगेशन में दो प्रमुख शख्सियतें हैं… 1. ले. ज. (रि.) सैयद अता हसनैन, बिहार के राज्यपाल डेलिगेशन में क्यों चुना गया: ईरान शिया बहुल इस्लामिक देश है और अयातुल्ला खामेनेई शियाओं के सर्वोच्च धार्मिक और राजनीतिक नेता थे। सैयद अता हसनैन भी शिया हैं। रिटायर्ड आर्मी अफसर और राज्यपाल जैसा संवैधानिक ओहदा भी रखते हैं। 2. पबित्र मार्गरिटा, केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री डेलिगेशन में क्यों चुना गया: सीधे विदेश मंत्रालय का हिस्सा हैं। हाई प्रोफाइल भी नहीं हैं और न ज्यादा लो-प्रोफाइल। ईरान को लेकर भारत के मौजूदा स्टैंड पर फिट बैठते हैं। सवाल-2: पीएम मोदी का बुलावा था, फिर वो खुद क्यों नहीं गए? जवाबः पहले जाहिर वजहों की बात। पीएम मोदी का शेड्यूल पहले से तय है। 1 से 3 जुलाई तक जापान की पीएम सनाए ताकाइची भारत दौरे पर रहेंगी, जिनसे पीएम मोदी मुलाकात करेंगे। 4 जुलाई को पीएम मोदी राजस्थान के जोधपुर जाएंगे। फिर 6 से 11 जुलाई तक वे इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की यात्रा करेंगे। हालांकि एक्सपर्ट्स पीएम मोदी के ईरान न जाने के पीछे 3 छिपी वजहें भी बताते हैं। JNU में मिडिल-ईस्ट स्टडीज के प्रोफेसर पीआर कुमारस्वामी और इंटरनेशनल स्टडीज के एसोसिएट प्रोफेसर राजन कुमार के मुताबिक… 1. खामेनेई का जनाजा बेहद उग्र हो सकता हैः खामेनेई की मौत एक हमले में हुई है। शिया परंपरा के मुताबिक उनका जनाजा सिर्फ एक शोक सभा नहीं, बल्कि न्याय और प्रतिरोध का धार्मिक और राजनीतिक रूप ले लेगा। 6 दिन के अंतिम संस्कार में लोग मुहर्रम की तरह विलाप करेंगे और खुद को पीटेंगे। ये बहुत ज्यादा उग्र होगा। इसमें शामिल होने का मतलब होता कि पीएम मोदी भी खुलकर ईरान के प्रतिरोध के साथ खड़े हैं। भारत इससे बचना चाहता है। 2. अचानक स्टैंड बदलने से आलोचना का खतरा: खामेनेई की मौत पर भारत ने चुप्पी साध रखी थी। 5 दिन बाद पहली सार्वजनिक प्रतिक्रिया दी, जब विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने ईरानी दूतावास जाकर शोक जताया। अब 4 महीने बाद अचानक पीएम मोदी का खामेनेई के जनाजे में जाना पूरी तरह स्टैंड बदलना होगा। 3. साझेदार देशों को गलत मैसेज जाने की चिंता: खामेनेई के जनाजे में पीएम मोदी की मौजूदगी भारत के साझेदार और ईरान के विरोधी देशों को नाराज कर सकती है। इनमें अमेरिका, इजराइल के अलावा सऊदी अरब, यूएई जैसे सुन्नी बहुल देश भी हैं। सवाल-3: ईरान को लेकर भारत के सामने दुविधा क्या है? जवाबः ईरान से जुड़ा हर फैसला भारत के लिए तीन मोर्चों पर एक साथ संतुलन मांगता है… 1. आर्थिक दुविधा: ईरान की तरफ झुका, अमेरिका से खतरा होर्मुज स्ट्रेट पर अब भी ईरान का कब्जा है। भारत का 40% कच्चा तेल, 50% LNG और 90% LPG इसी रूट से आता है। यहां जरा सी रुकावट भारत में तेल संकट खड़ा कर सकती है। दूसरी तरफ अमेरिका भारत का बड़ा ट्रेड पार्टनर है, और जल्द ही दोनों देशों के बीच बड़ी ट्रेड डील होने वाली है। यानी, ईरान से नाता टूटा तो ऊर्जा संकट, अमेरिका से दूरी बढ़ी तो व्यापार को नुकसान। 2. सांस्कृतिक दुविधा: भारतीय लोगों की हमदर्दी ईरान के साथ
भारत और ईरान के रिश्ते सदियों पुराने हैं। भाषा, व्यापार और सभ्यता के स्तर पर गहरे जुड़े हैं। यही वजह है कि जंग के दौरान भी भारत ने ईरान की खुलकर निंदा नहीं की। खामेनेई की मौत पर भी भारत ने सीधी चुप्पी नहीं, बल्कि शालीन शोक जताया। 3. रक्षा दुविधा: इजराइल बड़ा डिफेंस पार्टनर, खाड़ी देशों में भारतीय
इजराइल भारत का भरोसेमंद रक्षा साझेदार है, जो हर मुश्किल वक्त में खुलकर साथ खड़ा रहा है। वहीं खाड़ी देशों में रह रहे 1 करोड़ से ज्यादा भारतीयों की सुरक्षा भी उतनी ही अहम है। जंग के दौरान भारत ने इजराइल या अमेरिका की आलोचना नहीं की, लेकिन खाड़ी देशों पर हुए हमलों की निंदा जरूर की। पाकिस्तान के ईरान के प्रति सहानुभूति दिखाने के बाद UAE ने कई पाकिस्तानी वर्कर्स को डिपोर्ट कर दिया था। भारत ऐसी कोई गलती दोहराना नहीं चाहता। सवाल-4: क्या भारत अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच संतुलन बना पाएगा? जवाबः 1989 में जब ईरान के सुप्रीम लीडर अली खुमैनी की मृत्यु हुई थी, तो उनके अंतिम संस्कार में भारत ने विदेश मंत्री पी. वी. नरसिंहा राव को भेजा था। 2024 में जब ईरान के राष्ट्रपति अब्राहिम रइसी की हेलिकॉप्टर क्रैश में मौत हुई थी, तो भारत के उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ अंतिम संस्कार में शामिल हुए थे। लेकिन इस बार ईरान के सुप्रीम लीडर के अंतिम संस्कार में किसी मंत्री स्तर के नेता को नहीं भेजा जा रहा है। सवाल-5: खामेनेई के अंतिम संस्कार में क्या-क्या होना है? जवाबः 28 फरवरी को खामेनेई की मौत के बाद, 4 मार्च को उनका अंतिम संस्कार होना था लेकिन लगातार होते हमलों की वजह से यह टल गया। अब 4 जुलाई को अंतिम संस्कार कार्यक्रम की शुरूआत होगी… ——— ये खबर भी पढ़िए… आज का एक्सप्लेनर: CM विजय, गृहमंत्री शाह से मुलाकात, सैन्य कमांड का दौरा; ट्रम्प के दूत सर्जियो गोर आखिर भारत में कर क्या रहे हैं अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर 22 जून को तमिलनाडु के सीएम विजय थलापति से मिलने चेन्नई पहुंच गए। उससे 4 दिन पहले, 18 जून को गृहमंत्री अमित शाह से दिल्ली में मुलाकात की। 6 महीने में 6 मुख्यमंत्रियों से मिले। दिल्ली के उपराज्यपाल और राजस्थान की डिप्टी सीएम तक से मीटिंग की। भारतीय सेना के पश्चिमी कमान हेडक्वार्टर के दौरे पर तो हंगामा भी हुआ था। पूरी खबर पढ़िए



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