Headlines

A woman spy sehmat khan who helped India defeat Pakistan in 1971


भास्कर सीरीज ‘स्पाई फाइल्स’ में आप पढ़ रहे हैं जासूस सहमत की कहानी। पार्ट-1 में आपने पढ़ा कि कश्मीर के कपड़ा कारोबारी हिदायत खान भारत की खुफिया एजेंसी RAW के जासूस थे। पाकिस्तानी सेना के अफसरों में उनकी गहरी पैठ थी। उन्हें कैंसर हो गया। मौत से पहले उ

.

सहमत के ससुर सईद पाक सेना में ब्रिगेडियर और जेठ महबूब मेजर थे। सहमत ने परिवार का इतना दिल जीत लिया कि ब्रिगेडियर सईद सेना के मामलों में भी उसकी सलाह लेने लगे। सहमत ने चालाकी से ब्रिगेडियर के बॉस लेफ्टिनेंट जनरल अमीर खान को भी अपने प्रभाव में ले लिया। इस तरह RAW को पाक सेना की गोपनीय खबरें मिलने लगीं। पार्ट-2 में आगे की कहानी…

जासूस सहमत वॉशरूम में लगे खुफिया ट्रांसमीटर से मैसेज भारत भेजती थी। AI इमेज

जासूस सहमत वॉशरूम में लगे खुफिया ट्रांसमीटर से मैसेज भारत भेजती थी। AI इमेज

सहमत को पाकिस्तान में रहते हुए दो साल बीत गए थे। अभी तक कोई बड़ी जानकारी उसके हाथ नहीं लगी थी। वो समझ गई कि उसे कुछ बड़ा करना होगा। एक रोज उसने ससुर सईद से बताया कि वो स्कूल में संगीत सिखाना चाहती है।

सईद नाराज हो गए। उन्होंने कहा- ‘हमारे घर की औरतें नौकरी नहीं करतीं। तुम्हें किसी चीज की कमी है क्या?’

सहमत धीरे से बोली- ‘किसी चीज की कमी नहीं है, पर खाली वक्त नहीं कटता। घर में बैठे-बैठे परेशान हो गई हूं।’

तभी इकबाल वहां आ गया। उसने कहा- ‘सहमत ठीक कह रही है अब्बू। संगीत में इसकी दिलचस्पी है। स्कूल के बहाने इसका मन भी लगने लगेगा।’

कुछ देर सोचने के बाद ब्रिगेडियर ने कहा- ‘जैसा तुम लोगों को ठीक लगे करो, पर खानदान का नाम खराब नहीं होना चाहिए।’

सहमत ने मुस्कुराते हुए कहा- ‘जी अब्बू।’

कुछ दिनों बाद सहमत ने एक स्कूल में संगीत सिखाना शुरू कर दिया। यह कोई आम स्कूल नहीं था, यहां पाकिस्तान के रईसों और सेना के आला अफसरों के बच्चे पढ़ते थे।

जल्द ही सहमत की खोजी नजरों ने अपना शिकार ढूंढ निकाला- ‘अनवर खान।’

अनवर, पाकिस्तानी सेना के ताकतवर अफसर, लेफ्टिनेंट जनरल इम्तियाज खान का पोता था। संगीत में उसकी दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन सहमत ने उसे म्यूजिक क्लास का ग्रुप लीडर बना दिया।

खास तौर पर ट्रेनिंग की व्यवस्था की। हर दिन अलग से उसे घंटों रियाज कराती। धीरे-धीरे संगीत में अनवर की दिलचस्पी बढ़ने लगी।

कुछ महीने बाद स्कूल का एनुअल फंक्शन होना तय हुआ। सहमत ने लेफ्टिनेंट जनरल इम्तियाज खान और उनकी बेगम को इनवाइट किया। दोनों शामिल भी हुए।

अनवर की परफॉर्मेंस देखकर ऑडिटोरियम की अगली कतार में बैठे लेफ्टिनेंट जनरल इम्तियाज और उनकी बेगम बेहद खुश हुए।

पोते की परफॉर्मेंस के पीछे उन्हें एक ही चेहरा नजर आ रहा था- लेडी टीचर सहमत। इस शाम ने सहमत के लिए जनरल इम्तियाज के आलीशान बंगले के दरवाजे खोल दिए।

धीरे-धीरे वह जनरल के परिवार की इतनी करीबी बन गई कि उनका उठना-बैठना और पारिवारिक मशविरे सहमत के बिना अधूरे होने लगे।

इसका फायदा सहमत के पाकिस्तानी परिवार को भी मिला। ब्रिगेडियर सईद पाकिस्तान की ताकतवर खुफिया एजेंसी ISI के डिप्टी चीफ बन गए।

यानी अब सहमत, ससुर के बहाने ISI की देहरी तक पहुंच चुकी थी।

पाकिस्तानी अफसर के पोते अनवर के साथ लेडी टीचर सहमत। AI इमेज

पाकिस्तानी अफसर के पोते अनवर के साथ लेडी टीचर सहमत। AI इमेज

सहमत की बायोग्राफी लिखने वाले पूर्व नेवी अफसर हरिंदर सिक्का बताते हैं- ‘एक शाम हवेली के स्टडी रूम में सन्नाटा पसरा था। सहमत, ब्रिगेडियर की फाइलें पलट रही थी।

अचानक उसके माथे पर पसीने की बूंदें तैरने लगीं। एक पन्ने पर लिखा था- पाकिस्तानी पनडुब्बियां बंगाल की खाड़ी की तरफ कूच करने वाली हैं। INS विक्रांत को तबाह करना है।

भारत के सबसे बड़े युद्धपोत INS विक्रांत की तस्वीरें वहां चस्पा थीं, जिसमें उसके क्रू मेंबर्स की तादाद से लेकर हथियारों की तैनाती तक का पूरा ब्योरा था।

इत्तेफाक से उस वक्त सहमत की जेठानी मुनीरा मायके गई हुई थी। शौहर कैप्टन इकबाल और जेठ मेजर महबूब अपने कामों में मशरूफ थे।

सहमत ने उस फाइल को कपड़ों में छुपाया और दबे पांव अपने वॉशरूम में चली गई।’

अचानक… ‘थाप! थाप! थाप!’ वॉशरूम का दरवाजा जोर-जोर से बजा। बाहर नौकर अब्दुल खड़ा था, जो बुरी तरह किवाड़ पीट रहा था।

सहमत घबरा गई। कुछ सेकेंड तक उसने अपनी सांसें रोकीं, खुद को संभाला और फिर रोबीली आवाज में चिल्लाई, ‘बाहर इंतजार करो अब्दुल, मैं आ ही रही हूं!’

अब्दुल बाहर चला गया।

अब सहमत ने वॉशरूम में लगे खुफिया ट्रांसमीटर से RAW को मैसेज भेजा। फिर दबे पांव अपने कमरे में पहुंची। खुद को संभाला और चुपचाप स्टडी रूम जाकर अनगिनत फाइलों में उस सीक्रेट कागज को वापस रखा और बाहर निकल गई।

गलियारे में ससुर ब्रिगेडियर सईद बदहवास से खड़े थे। ‘तुम कहां थी सहमत? मैं कब से एक फाइल ढूंढ रहा हूं…’

‘अब्बू जान, परेशान मत होइए। आप कमरे में चलकर आराम कीजिए, मैं अभी ढूंढकर लाती हूं।’ सहमत जानती थी कि ब्रिगेडियर का ब्लड प्रेशर किस फाइल के लिए बढ़ा हुआ था।

चंद मिनटों बाद, सहमत वही फाइल हाथ में लिए ब्रिगेडियर के सामने खड़ी थी। सईद ने बिना कुछ कहे फाइल ली और तेज कदमों से दफ्तर की तरफ चल पड़ा।

ब्रिगेडियर के जाते ही सहमत अपने कमरे में लौटी। वॉशरूम का दरवाजा खुला हुआ था। मैसेज भेजने वाली खुफिया मशीन उखाड़ दी गई थी।

‘अब्दुल सब देख चुका है!’ मन में बुदबुदाते हुए सहमत उल्टे पैर बाहर की तरफ भागी। उसने देखा कि रसोई के पिछले रास्ते से एक जानी-पहचानी परछाई हवेली के गेट की तरफ जा रही थी। वह अब्दुल ही था।

हवेली के दरवाजे पर सेना का राशन सप्लाई ट्रक खड़ा था, जिसका ड्राइवर कहीं आसपास गया हुआ था। सहमत बिजली की फुर्ती से ड्राइविंग सीट पर बैठी, चाबी घुमाई और एक्सीलेटर पर पैर रख दिया।

कुछ ही दूरी पर उसे अब्दुल भागता हुआ मिल गया। वह ब्रिगेडियर सईद के दफ्तर की तरफ जा रहा था। सेना का ट्रक आता देख अब्दुल ने दोनों हाथ हवा में लहराए- ‘रोको! रोको!’

सहमत ने ब्रेक की जगह एक्सीलेटर को पूरी ताकत से दबा दिया। पलक झपकते ही… ट्रक के भारी-भरकम टायर अब्दुल को रौंदते हुए आगे निकल गए।

अब्दुल को कुचलने के बाद सहमत ट्रक सड़क पर ही छोड़कर भाग निकली। AI इमेज

अब्दुल को कुचलने के बाद सहमत ट्रक सड़क पर ही छोड़कर भाग निकली। AI इमेज

सड़क किनारे ट्रक को छोड़ सहमत नीचे उतरी। एक घर के बाहर तार पर टंगे बुर्के को उसने झपटकर पहना और लगभग दौड़ती हुई हवेली पहुंची।

सबसे पहले वॉशरूम का रूख किया। वहां मौजूद हर सबूत को मिटाया।

उधर, लहूलुहान अब्दुल को किसी ने अस्पताल पहुंचा दिया था। खबर मिलते ही सहमत का जेठ, मेजर महबूब भी अस्पताल पहुंच गया।

अब्दुल, महबूब को देखकर कुछ बोलना चाह रहा था, लेकिन हलक से सिर्फ घड़घड़ाहट की आवाज निकल रही थी।

उसने भारी मशक्कत के साथ कंबल के नीचे से अपना हाथ बाहर निकाला और मेजर की हथेली पर मेटल के दो टुकड़े रख दिए।

महबूब ने अब्दुल का चेहरा थामकर चीखते हुए पूछा, ‘बताओ अब्दुल! क्या हुआ है? किसने किया यह?’

उसने बस इतना ही कहा- ‘हहहह… मत… मत…’ और उसकी आंखें हमेशा के लिए बंद हो गईं।

रात को मेजर महबूब घर लौटा, तो उसके चेहरे पर गहरा तनाव था। उसने परिवार को अब्दुल की मौत की खबर दी और जेब से मेटल के वे दो टुकड़े निकालकर मेज पर रख दिए।

दूर कोने में खड़ी सहमत का दिल तेजी से धड़क रहा था। वह समझ चुकी थी कि महबूब शातिर फौजी अफसर है। वह इन दो टुकड़ों के पीछे छिपे राज को ढूंढने के लिए जमीन-आसमान एक कर देगा।

सहमत को अब बहुत जल्द, कुछ और बड़ा करना था।

एक रोज सहमत ने बुर्का पहना और कार में बैठकर नजदीक की एक मस्जिद के लिए निकल पड़ी। मस्जिद के बाहर चिलचिलाती धूप के बीच एक फटेहाल महिला छाते बेच रही थी।

सहमत को देखते ही वह मिन्नतें करने लगी, ‘मेम साहब, खुदा के लिए एक छतरी खरीद लो। बच्चे सुबह से भूखे हैं, कुछ पैसे आ जाएंगे तो उनके निवाले का इंतजाम हो जाएगा।’

ड्राइवर चिढ़ गया, लेकिन सहमत ने सौ के दो नोट पर्स से निकाले और छाता ले लिया।

छाता बेचने वाली महिला से बात करती हुई सहमत। AI इमेज

छाता बेचने वाली महिला से बात करती हुई सहमत। AI इमेज

घर लौटकर सहमत ने कमरे का दरवाजा बंद किया। छतरी के हैंडल को आहिस्ता से घुमाया। हैंडल से कांच की एक छोटी शीशी बाहर निकली।

उस पर हाथ से लिखी एक पर्ची चिपकी थी- ‘पीछे लगे बटन को दबाकर आप एक खास केमिकल की बूंदें सीधे इंसान के जिस्म में उतार सकती हैं। शिकार को दर्द का एहसास नहीं होगा। कुछ ही घंटों के भीतर वह दम तोड़ देगा।’

कुछ देर बाद सहमत ने उस छतरी को अपने पर्स में छिपाया और बाजार जाने का बहाना बनाकर पाकिस्तान सेना के ‘ब्यूरो ऑफ इंस्पेक्शन’ की तरफ निकल पड़ी। इसी दफ्तर में उसका जेठ महबूब काम करता था।

वहां पहुंचने के बाद वो पहली मंजिल के एक कोने में खड़ी हो गई। करीब 20 मिनट तक इंतजार किया। नीचे एक फौजी गाड़ी आकर रुकी। गहरे हरे रंग की वर्दी पहने एक अफसर कार से निकला। सहमत ने पहचान लिया- ‘वो मेजर महबूब है।’

वो तेजी से सीढ़ियां चढ़ता हुआ ऊपर आ रहा था। तभी सहमत लड़खड़ाकर गिर पड़ी।

‘ओह! संभालिए…’ महबूब उसे बचाने के लिए तेजी से आगे बढ़ा। दोनों एक पल के लिए टकराए और उसी पल बुर्के के भीतर से सहमत ने छतरी का बटन दबा दिया। छतरी की नोक से वो केमिकल महबूब के शरीर में चला गया।

सहमत संभलकर खड़ी हुई, उसने शुक्रिया कहा और आगे बढ़ गई। उसने पलटकर देखा कि मेजर सीढ़ियां चढ़ते हुए हल्के-हल्के अपनी बांह सहला रहा था। सहमत मन ही मन मुस्कुराई- ‘काम हो गया।’

कुछ ही घंटों बाद, ब्यूरो ऑफ इंस्पेक्शन के दफ्तर में तहलका मच गया। मेजर महबूब अपनी छाती थामकर फर्श पर गिर पड़ा था। उसे आनन-फानन में मिलिट्री अस्पताल ले जाया गया।

डॉक्टरों ने पूरी कोशिश की पर महबूब को बचा नहीं पाए। मौत की वजह हार्ट अटैक बताई गई।

सहमत के घर में मातम पसर गया। हर कोई बिलख रहा था, लेकिन महबूब की बेवा मुनीरा की आंखों में एक गहरा शक तैर रहा था।

पहले वफादार नौकर अब्दुल का कत्ल, उसका मरते-मरते महबूब के हाथ में मेटल के टुकड़े सौंपना और फिर महबूब का इस तरह दुनिया से चले जाना… मुनीरा समझ चुकी थी कि इन दोनों मौतों के पीछे कोई तो कड़ी है।

इधर, ब्रिगेडियर की जिंदगी दो पाटों के बीच पिस रही थी। एक तरफ परिवार में हुई दो मौतों का मातम था, तो दूसरी तरफ जंग की तैयारियां।

इसी आपाधापी के बीच, उन्हें प्रधानमंत्री से एक जरूरी मुलाकात करनी थी, जिसके लिए ‘टॉप सीक्रेट’ फाइलें तैयार की गई थीं।

हमेशा की तरह, सहमत ने ब्रिगेडियर का ब्रीफकेस तैयार किया और मौका पाकर फाइलों के पन्ने भी याद कर ली। उन पन्नों में जंग की रणनीतियों के साथ-साथ दिल्ली में बैठे ISI के एजेंटों की लिस्ट थी।

ब्रिगेडियर सईद के लिए फाइल तैयार करती हुई सहमत। AI इमेज

ब्रिगेडियर सईद के लिए फाइल तैयार करती हुई सहमत। AI इमेज

लेखक हरिंदर सिक्का बताते हैं- ‘सहमत को यह पैगाम हर हाल में सरहद पार पहुंचाना था। सख्त पहरे के बीच बाहर निकलने के लिए सहमत ने जेठानी मुनीरा को अपने साथ मस्जिद चलने के लिए राजी कर लिया।

जैसे ही दोनों मस्जिद पहुंचीं, सहमत बोल पड़ी, ‘आप यहीं मेरा इंतजार कीजिए, मैं मेजर साहब की मजार के लिए कुछ ताजे फूल लेकर आती हूं।’

सहमत ने एक बड़ी टोकरी फूलों का ऑर्डर दिया और नजरें बचाकर पास ही के एक फोन बूथ की तरफ भागी। फोन खराब था। आसपास कोई दूसरा बूथ नजर नहीं आ रहा था।

अब उसकी नजर एक पान की दुकान पर पड़ी। सहमत ने पान वाले के फोन का इस्तेमाल किया और हांफती हुई आवाज में पूरा खुफिया मैसेज बता दिया।

जब सहमत घर लौटी, तो हवेली के बाहर फौज की गाड़ियां खड़ी थीं। अंदर दो ISI के अफसर खड़े थे। कमरे की मेज पर खून से सने मेटल के वे टुकड़े रखे थे, जिन्हें देखकर सहमत के भीतर सिहरन दौड़ गई।

ISI ने उस फूलवाले और पान वाले को धर-दबोचा था। अगले कई दिनों तक हवेली में ISI के अफसरों का आना-जाना लगा रहा।

एक दोपहर, तंग आकर सहमत ने कड़े लहजे में अफसरों से कह दिया, ‘सईद साहब इस वक्त आराम कर रहे हैं। आप लोग या तो यहीं इंतजार कीजिए, या फिर बाद में तशरीफ लाइए।’

अफसरों ने एक-दूसरे को देखा और सहमत के हाथ में एक सीलबंद लिफाफा थमाते हुए कहा, ‘ठीक है बेगम साहिबा, यह फाइल ब्रिगेडियर साहब को दे दीजिएगा।’

जैसे ही अफसर बाहर गए, सहमत ने उस लिफाफे को खोला। लिखा था- ‘हवेली की सुरक्षा में बहुत बड़ी सेंध लगी है। हिंदुस्तान को खुफिया खबरें भेजी जा रही हैं। गद्दार घर के भीतर ही है।’

अपनी घबराहट छुपाने के लिए सहमत वॉशरूम चली गई। थोड़ी देर बाद जैसे ही उसने दरवाजा खोला सामने खड़े शख्स को देखकर वह ठिठक गई। उसका शौहर, कैप्टन इकबाल खड़ा था।

उसने सहमत को घूरते हुए कहा, ‘क्या मैं तुम्हारे वॉशरूम का इस्तेमाल कर सकता हूं?’

सहमत समझ गई कि इकबाल को उस खुफिया ट्रांसमीटर का अंदाजा हो चुका है। उसने बस सिर हिलाया और एक तरफ हट गई। इकबाल अंदर दाखिल हुआ।

सहमत ने मेज पर रखे इकबाल के बटुए को जल्दी से उठाकर देखा। करारे नोटों के बीच एक छोटा सा कागज रखा था। सहमत ने उसे पढ़ा और वापस रख दिया।

5 मिनट बाद इकबाल ने दरवाजा खोला, तो देखा सहमत एक चमचमाती हुई रिवॉल्वर लेकर खड़ी थी। उंगली ट्रिगर पर कसी हुई थी और निशाने पर इकबाल।

सहमत ने सख्त लहजे में कहा- ‘इकबाल, मैं इस चौखट पर तुम्हारी सेज सजाने और तुम्हारी बीवी बनकर जिंदगी गुजारने नहीं आई हूं। मैं अपने मुल्क हिंदुस्तान के लिए आई हूं। मेरे इस रास्ते में जो भी रोड़ा बनेगा, उसे कुचल दूंगी… फिर चाहे वो तुम ही क्यों न हो।’

इकबाल ने वॉशरूम में जो कुछ देखा और सहमत के मुंह से उसके कानों ने जो कुछ सुना…वह किसी सदमे से कम नहीं था। उसके दिल में अभी भी सहमत थी।

उसने सहमत की तरफ बेबसी से देखते हुए कहा- ‘ये सब छोड़ दो, पकड़ी जाओगी। ISI वाले मुनीरा को पूछताछ के लिए ले गए हैं और अब्बा हुजूर को भी हेडक्वार्टर ना छोड़ने को कहा गया है।’

सहमत मुस्कुराती रही…हंसते हुए इकबाल से बोली- ‘मियां बहुत भोले हो आप… जो लड़की अपना मुल्क छोड़कर यहां तक आई है, उसे डराकर रोक लोगे? बेहतर होगा मैं जैसा कह रही हूं करो, इसी में आपका और परिवार का भला है।’

उसने पास पड़ी एक कुर्सी पर इकबाल को बैठाया और रस्सी से बांध दिया। काफी देर इकबाल छटपटाता रहा। फिर सहमत ने उसकी हथकड़ी खोली और धमकाते हुए कहा- ‘तुम हर पल मेरे निशाने पर हो। जरा भी चालाकी की, तो समझो तुम्हारे साथ तुम्हारा खानदान भी खत्म।’

सहमत ने पति इकबाल को साफ चेता दिया कि वो अब से हर पल उसके निशाने पर है। AI इमेज

सहमत ने पति इकबाल को साफ चेता दिया कि वो अब से हर पल उसके निशाने पर है। AI इमेज

अगले दिन छावनी के मेन गेट पर फौज के झंडे वाली एक चमचमाती कार आकर रुकी। गार्ड जैसे ही तलाशी और पहचान पत्र के लिए आगे बढ़ा, कार की पिछली खिड़की का शीशा सरसराता हुआ नीचे उतरा।

अंदर से कड़क आवाज गूंजी- ‘मैं जीओसी बशीर हूं, जनरल सईद की हवेली के लिए कौन सा रास्ता जाता है?’

घबराए गार्ड ने बिना कोई सवाल किए हवेली की तरफ इशारा कर दिया- ‘जनाब, सीधे हाथ पर।’ गाड़ी आगे बढ़ गई।

हवेली के बैठकखाने में कुछ देर इंतजार करने के बाद, जनरल बशीर के भेष में आए उस शख्स का सामना मेजर इकबाल से हुआ।

जनरल ने कहा, ‘मेजर, तुम्हारी बेगम साहिबा इस शहर के सबसे बेहतरीन और ऊंचे रसूख वाले स्कूल में संगीत सिखाती हैं, उनकी बड़ी तारीफ सुनी है। मैंने सोचा क्यों न उनसे मिल लिया जाए।’

इकबाल ने कुछ नहीं कहा। उसी वक्त सहमत हॉल में दाखिल हुई। उसने अपने काले पर्स में एक लोडेड रिवॉल्वर छुपा रखी थी।

औपचारिक बातचीत के बीच, जनरल ने जेब से मुड़ा हुआ कागज निकाला और सहमत की तरफ बढ़ाते हुए कहा, ‘बेगम साहिबा, इस खत में आपके परिवार के लिए ताजीयत (शोक संदेश) है।’

सहमत ने खत खोला। ऊपर सांत्वना के शब्द थे, लेकिन लाइनों के बीच छुपा असली संदेश था- ‘ठीक तीन घंटे बाद, पुरानी वादियों के पास।’

सहमत ने खत वापस जनरल को सौंपा और खुदाहाफिज कहकर अंदर चली गई। जनरल ने भी मेजर इकबाल से विदा लिया।

उसी रोज रात करीब 8 बजे। स्थानीय पठानी लिबास में RAW का वो अफसर रावलपिंडी के एक मशहूर रेस्तरां के कोने वाली मेज पर बैठा चाय की चुस्कियां ले रहा था।

तय वक्त पर, रेस्तरां के बाहर बुर्के में लिपटी एक औरत दाखिल हुई। उसके पीछे बेहद डरा और सहमा हुआ मेजर इकबाल चल रहा था।

इसी बीच RAW अधिकारी को भनक लग गई कि बाहर गाड़ियों के पीछे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI के शार्पशूटर मुस्तैद हैं। उनकी उंगलियां ट्रिगर पर थीं और सीधा निशाना बुर्के वाली औरत और इकबाल पर।

RAW अधिकारी के माथे पर पसीना छलक आया। ‘सहमत पकड़ी जा चुकी है! अगर ISI ने उसे जिंदा दबोच लिया, तो टॉर्चर सेल में वह टूट सकती है। भारत का पूरा नेटवर्क, दर्जनों स्लीपर सेल और सालों की मेहनत तबाह हो जाएगी।’

यहीं सोचते हुए उसने भारी मन से अपना दाहिना हाथ जैकेट की अंदरूनी जेब में डाला और एक छोटे से इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमीटर का बटन तीन बार दबाया।

‘सूंss…!’ सन्नाटे को चीरता हुआ एक जहरीला तीर बुर्के वाली औरत की गर्दन में जा धंसा। वह वहीं फर्श पर ढह गई। पाकिस्तानी एजेंट कुछ समझ पाते, रेस्तरां के पिछले हिस्से में एक जोरदार धमाका हुआ। चारों तरफ चीख-पुकार मच गई।

जैसे ही RAW एजेंट ने धमका किया, रावलपिंडी के बाजार में अफरा-तफरी मच गई। AI इमेज

जैसे ही RAW एजेंट ने धमका किया, रावलपिंडी के बाजार में अफरा-तफरी मच गई। AI इमेज

भगदड़ का फायदा उठाकर RAW अधिकारी और उसके साथी वहां से फरार हो गए। वे शहर से दूर एक सुरक्षित और बंद कमरे में पहुंचे। सब खामोश थे।

RAW अधिकारी अपनी हथेलियों में सिर छुपाए बैठा था। उसकी आत्मा कचोट रही थी-’भारत लौटकर वह सहमत की बूढ़ी मां को क्या जवाब देगा? कैसे कहेगा कि उसने देश को बचाने के लिए अपनी ही सबसे बेहतरीन एजेंट की जान ले ली?’

‘ट्रीन-ट्रीन…’ अचानक सन्नाटे को चीरती हुई दरवाजे की घंटी बजी।

कमरे में मौजूद एजेंटों के बदन में बिजली दौड़ गई। अधिकारी ने अपनी रिवॉल्वर का सेफ्टी कैच हटाते हुए बेहद सख्त लहजे में हुक्म दिया, “कोई भी जिंदा हाथ नहीं आएगा। जितने दुश्मनों को मार सकते हो मारो, या खुद को गोली मार लो।’

घंटी दोबारा बजी। अधिकारी दरवाजे की तरफ बढ़ा और ‘पीप-होल’ से बाहर झांका।

अब उसकी उंगलियां ढीली पड़ गईं और भारी पिस्तौल फर्श पर जा गिरी। उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं। उसने कांपते हाथों से दरवाजे की कुंडी खोली।

बाहर सहमत जिंदा सलामत खड़ी थी।

कमरे में मौजूद हर शख्स मानो काठ का हो गया। किसी को अपनी आंखों पर यकीन नहीं हो रहा था। अधिकारी ने हैरान होकर पूछा- ‘जिंदा कैसे बच निकली?’

सहमत के चेहरे पर एक मुस्कान उभर आई। ‘रेस्तरां में इकबाल के साथ मैं नहीं थी। मैंने मुनीरा को अपनी जगह बुर्का पहनाकर इकबाल के साथ भेज दिया था।’

सहमत का मिशन अब मुकम्मल हो चुका था। RAW की टीम सहमत को गोपनीय तरीके से सरहद पार कराकर भारत ले आई। भारत आने के बाद सहमत को महसूस हुआ कि वह सिर्फ यादें लेकर नहीं लौटी है। मेडिकल चेकअप में पता चला कि उसके पेट में इकबाल का बच्चा पल रहा है।

कुछ महीने बाद सहमत ने एक बेटे को जन्म दिया। आगे चलकर उस बच्चे ने इंडियन आर्मी की वर्दी पहनी और देश की हिफाजत की कसम खाई।

सहमत के बेटे ने ही मां की कहानी लेखक हरिंदर सिंह सिक्का को बताई थी। हरिंदर सिक्का का दावा है कि वे सहमत से मिले हैं और कई बार पाकिस्तान भी गए हैं। 8 साल की रिसर्च के बाद उन्होंने ‘सहमत कॉलिंग’ किताब लिखी है।

*****

जासूस सहमत पार्ट-1 भी पढ़िए…

पाकिस्तानी बहू निकली भारत की जासूस: बॉयफ्रेंड छोड़ फौजी अफसर से शादी की, वॉशरूम से मैसेज भेजकर INS विक्रांत को बचाया; सहमत पार्ट-1

उस रोज सहमत का आखिरी पेपर था। वह हॉल से निकली ही थी कि एक आदमी उसके पास आया और सीलबंद लिफाफा देकर चला गया। सहमत ने मुस्कुराकर सोचा- ‘अभिनव ने कोई हरकत की होगी, मगर जैसे ही उसकी निगाह लिफाफे पर लिखे भेजने वाले के पते पर गई, वह घबरा गई।

कांपते हाथों से उसने लिफाफा खोला। अंदर हवाई जहाज का टिकट था और एक पर्ची, जिस पर लिखा था- ‘जल्द श्रीनगर पहुंचो।’ पूरी कहानी पढ़िए…



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *