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बक्सर के बनारपुर गांव में गुरुवार को दुबई में मजदूरी करने गए धनजी चौधरी(22) का शव उनके पैतृक गांव पहुंचा। धनजी लगभग 10 महीने पहले परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने और घर बनाने का सपना लेकर दुबई गए थे। बेटे का शव देखते ही मां मीरा देवी और पिता शंभू चौधरी का रो-रोकर बुरा हाल था। परिजनों के क्रंदन से गांव का माहौल गमगीन हो गया। शव पहुंचने की खबर मिलते ही बड़ी संख्या में ग्रामीण धनजी के घर पहुंच गए। बनारपुर गांव निवासी शंभू चौधरी के चार बेटों में धनजी सबसे बड़े थे। परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण उन्होंने कम समय में अधिक पैसा कमाने और परिवार का जीवन स्तर सुधारने का सपना देखा था। इसी उम्मीद में वह नवंबर 2025 में मजदूरी करने दुबई गए थे। धनजी का सपना था कि वह विदेश में कुछ साल मेहनत कर पैसा कमाएंगे, गांव में पक्का मकान बनवाएंगे, शादी करेंगे और अपने छोटे भाई-बहनों को अच्छी शिक्षा दिलाएंगे। तबीयत बिगड़ने से दुबई में हुई मौत हालांकि, परिवार की उम्मीदें उस समय टूट गईं जब 15 अगस्त 2026 को परिजनों को दुबई में धनजी की तबीयत बिगड़ने और मौत होने की सूचना मिली। बताया गया कि काम के दौरान अचानक उनके पेट में दर्द हुआ, जिसके बाद उनकी मृत्यु हो गई। बेटे की मौत की खबर मिलते ही परिवार में चीख-पुकार मच गई। माता-पिता ने जिस बेटे को बेहतर भविष्य की उम्मीद में हजारों रुपये कर्ज लेकर विदेश भेजा था, अब उसका शव ही वापस लौटा। कर्ज लेकर मां ने बेटा को भेजा था दुबई धनजी की मां मीरा देवी ने बताया कि बेटे को दुबई भेजने के लिए उन्होंने साहूकार से करीब 80 हजार रुपए ब्याज पर कर्ज लिया था। बेटे ने विदेश जाते समय कहा था कि वह वहां से नियमित रूप से पैसे भेजता रहेगा। पहले कर्ज चुका देना और उसके बाद बचे हुए पैसे से घर बनवाने की बात कही थी। मां ने बताया कि किसी तरह बेटे के भेजे पैसे से लिया हुआ कर्ज चुकाया ही जा सका था, लेकिन इसके बाद बेटे की मौत की खबर आ गई। जिस बेटे से घर में खुशियां आने की उम्मीद थी, उसी बेटे की मौत ने पूरे परिवार को तोड़कर रख दिया। मिट्टी की झोपड़ी में रहता है परिवार धनजी का परिवार आज भी गांव में एक छोटे से जमीन के टुकड़े पर बनी मिट्टी की झोपड़ी में रहता है। झोपड़ी के चारों तरफ घास-फूस की घेराबंदी है। इसी छोटे से आशियाने में धनजी अपने माता-पिता, एक बहन और तीन भाइयों के साथ रहता था। परिवार के लिए वह सिर्फ बड़ा बेटा ही नहीं, बल्कि आने वाले बेहतर भविष्य की सबसे बड़ी उम्मीद था। धनजी के पिता शंभू चौधरी गांव में ही मछली पकड़कर और उसे बेचकर किसी तरह परिवार का भरण-पोषण करते हैं। मछली बेचकर मिलने वाले पैसों से घर में साग-सब्जी और भोजन का इंतजाम होता है। ऐसे परिवार के लिए धनजी का विदेश जाना आर्थिक मजबूरी के साथ-साथ एक बड़े सपने की शुरुआत थी। परिवार को उम्मीद थी कि बेटा कुछ वर्षों में पैसे कमाकर पक्का मकान बनवाएगा और छोटे भाई-बहनों की पढ़ाई का खर्च उठाएगा। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। धनजी की मौत से परिवार के सामने अब न केवल बेटे को खोने का गहरा दुख है, बल्कि भविष्य की चिंता भी खड़ी हो गई है। जिस बेटे के सहारे परिवार ने बेहतर जिंदगी का सपना देखा था, उसके चले जाने के बाद घर की जिम्मेदारी फिर उसी गरीबी और मजबूरी के बीच खड़ी है। पीड़ित परिवार को मुआवजा देने की मांग वहीं, बनारपुर गांव के उपमुखिया अजय चौधरी, पूर्व जिला पार्षद बसंती देवी समेत अन्य जनप्रतिनिधियों ने पीड़ित परिवार की आर्थिक स्थिति को देखते हुए सरकार से मुआवजा देने की मांग की है। जनप्रतिनिधियों का कहना है कि परिवार बेहद गरीब है और कमाने वाले बड़े बेटे की मौत से परिवार पर आर्थिक संकट और गहरा गया है। ऐसे में सरकार को पीड़ित परिवार की मदद के लिए आगे आना चाहिए, ताकि परिवार को कुछ आर्थिक सहारा मिल सके। धनजी के घर में अब वह पक्का मकान नहीं बन पाएगा, जिसका सपना लेकर वह हजारों किलोमीटर दूर दुबई गया था। जिस बेटे के लौटने पर मां की आंखों में खुशियां देखने की उम्मीद थी, उसी मां की आंखों के सामने आज बेटे का शव है। एक गरीब परिवार का वह सपना, जो कर्ज लेकर शुरू हुआ था, महज दस महीने में ही मातम में बदल गया।
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दुबई से बक्सर लौटा बेटे का शव:परिवार ने कर्ज लेकर पैसा कमाने भेजा था, पक्का मकान बनाने का सपना अधूरा
