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2 घंटे पहले
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सवाल- मेरी उम्र 33 साल है। मेरी कुछ बहुत पुरानी दोस्तियां थीं। हम सालों से साथ थे, लेकिन धीरे-धीरे मुझे लगने लगा कि ये रिश्ते सिर्फ उनकी जरूरत और स्वार्थ के हैं। जब उन्हें मदद की जरूरत होती तो मैं सबसे पहले याद आता, लेकिन मेरी जरूरत के समय उनके पास हमेशा कोई-न-कोई बहाना होता था। कई बार मेरी निजी बातें भी दूसरों तक पहुंच जाती थीं। बहुत सोचने के बाद मैंने उनसे दूरी बना ली और धीरे-धीरे सारे रिश्ते खत्म कर दिए।
शुरू में राहत महसूस हुई। लेकिन अब करीब छह महीने बाद मुझे बहुत अकेलापन महसूस होता है। फोन में कोई मैसेज नहीं आता। वीकेंड पर कहीं जाने के लिए कोई दोस्त नहीं होता। क्या टॉक्सिक दोस्ती खत्म करने के बाद भी अकेलापन महसूस होता है? क्या सिर्फ इस अकेलेपन से बचने के लिए पुराने टॉक्सिक रिश्तों में लौटना ठीक होगा?
एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर।
सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। हां, टॉक्सिक दोस्ती खत्म करने के बाद भी अकेलापन महसूस हो सकता है। कई बार उस अकेलेपन के कारण पुरानी टॉक्सिक दोस्ती में लौटने की इच्छा भी हो सकती है। लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि रिश्ता खत्म करके आपने कोई गलती की।
कई बार हम किसी रिश्ते से इसलिए नहीं जुड़े रहते क्योंकि हमें उसमें खुशी मिलती है। हम इसलिए जुड़े रहते हैं क्योंकि वह पुराना है, जाना-पहचाना है और हमारी जिंदगी का हिस्सा बन चुका है।

टॉक्सिक रिश्तों के साथ हम क्या खोते हैं?
टॉक्सिक रिश्ता खत्म होने के बाद भी सिर्फ एक व्यक्ति नहीं जाता। उसके साथ हमारी रोज की बातचीत, वीकेंड की योजनाएं, साझी यादें और जिंदगी का एक पूरा हिस्सा भी खाली हो जाता है।
इसलिए ऐसा हो सकता है कि टॉक्सिक दोस्ती खत्म करने के बाद राहत और अकेलापन, दोनों एक साथ महसूस हों।

टॉक्सिक दोस्ती क्या है?
टॉक्सिक दोस्ती का मतलब क्या है। टॉक्सिक दोस्ती कोई मेडिकल कंडीशन या मानसिक बीमारी नहीं है। इसे यूं समझिए कि–
- हर खराब दोस्ती टॉक्सिक नहीं होती।
- हर झगड़ा टॉक्सिक नहीं होता।
- हर असहमति भी टॉक्सिक नहीं होती।
किसी दोस्ती, रिश्ते या व्यक्ति को टॉक्सिक या नुकसानदेह बताने वाली सिर्फ एक घटना नहीं होती। इसके पीछे लंबा अनुभव और बार-बार दोहराया जाने वाला एक पैटर्न होता है। मसलन—
- आपकी सीमाओं का लगातार अनादर होना।
- आपकी निजी बातें दूसरों से साझा करना।
- बार-बार आपका इस्तेमाल करना।
- जरूरत पड़ने पर ही आपको याद करना।
- आपकी भावनाओं को छोटा या महत्वहीन बताना।
- ‘न’ कहने पर आपको अपराधबोध देना।
- आपकी दूसरी दोस्तियों से परेशानी होना।
- गलती के बाद जिम्मेदारी न लेना।
- आपको लगातार तनाव, अपराधबोध या थकान महसूस होना।

हम ‘टॉक्सिक’ दोस्ती में क्यों लौटते हैं?
यहां सबसे जरूरी सवाल ये है कि “मैं ऐसे रिश्ते में वापस क्यों जाना चाहता हूं, जिसने मुझे चोट पहुंचाई?” इसका जवाब हमेशा यह नहीं होता कि हमें वह व्यक्ति बहुत याद आ रहा है। कई बार इसके पीछे हमारी अपनी कोई मनोवैज्ञानिक जरूरत होती है।
1. अकेलापन ज्यादा डरावना
अकेलापन डराता है। खासकर तब, जब हमें लगता है कि नए दोस्त बनाना मुश्किल है। ऐसे में पुराना दोस्त भले ही हमें दुख दे, लेकिन वह जाना-पहचाना लगता है। हमें पता है कि उससे क्या उम्मीद करनी है।
हमारा दिमाग कई बार परिचित तकलीफ को अनजान स्थिति से ज्यादा सुरक्षित मान लेता है। इसलिए मन कह सकता है कि—
“जो भी था, कम–से–कम कुछ तो था। अब तो कोई भी नहीं है।”
2. आपकी पहचान ‘मदद करने वाले’ की
कुछ रिश्तों में एक व्यक्ति हमेशा समस्या सुलझाने वाला बन जाता है।
- दोस्त को परेशानी हुई – आप मौजूद।
- उसका किसी से झगड़ा हुआ – आप सलाह देने लगे।
- उसे पैसे, समय या इमोशनल सहारे की जरूरत हुई – आपने मदद की।
- ऐसे में धीरे-धीरे मन में एक विश्वास बन सकता है कि–
- “उन्हें मेरी जरूरत है, इसलिए मैं महत्वपूर्ण हूं।”
यहां खतरा यह है कि आप अपने महत्व को दूसरे से जोड़कर देखने लगते हैं। ऐसे में जब रिश्ता खत्म होता है तो सिर्फ दोस्त नहीं जाता, आपके महत्वपूर्ण होने का एहसास भी चला जाता है।
3. बुरे अनुभवों को ढकती अच्छे पलों की याद
किसी भी लंबे रिश्ते में सिर्फ बुरे पल ही नहीं होते।
- आप साथ में हंसें होंगे।
- घूमे होंगे।
- नाचे–गाए होंगे।
- खुश हुए होंगे।
- मुश्किल समय देखा होगा।
- निजी बातें साझा की होंगी।
रिश्ता खत्म होने के बाद दिमाग अक्सर उन अच्छे पलों को याद करता है। लेकिन उन अच्छे पलों को पूरी दोस्ती का प्रमाण मत बनाइए। यह देखिए कि ज्यादातर समय वह रिश्ता आपको कैसा महसूस कराता था। असली सवाल यही है कि क्या आपकी जरूरत के समय वे मौजूद थे। इसलिए आगे बढ़ने से पहले खुद से ये छह सवाल जरूर पूछिए–

4. पुरानी दोस्ती के साथ अपराधबोध भी जुड़ा होता है
हमारे समाज में दोस्ती को निभाने की बहुत अहमियत है। हमें सिखाया जाता है– “मुश्किल समय में दोस्त का साथ नहीं छोड़ते।” यह बात खूबसूरत है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि दोस्ती में हम अपनी गरिमा छोड़ दें। वफादारी और आत्म-उपेक्षा एक चीज नहीं हैं।
क्या आपकी दोस्ती टॉक्सिक है?
करें सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट
यहां मैं आपको एक सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट दे रहा हूं। पिछले तीन महीने को ध्यान में रखकर नीचे दिए सवालों का जवाब दें। नीचे ग्राफिक्स में कुल 10 सवाल हैं। आपको इन सवालों को 0 से 3 के स्केल पर रेट करना है। जैसेकि पहले सवाल के लिए अगर आपका जवाब ‘कभी नहीं’ है तो 0 नंबर दें और अगर आपका जवाब ‘लगभग हमेशा’ है तो 3 नंबर दें। अंत में टोटल स्कोर की एनालिसिस करें और अपना स्कोर इंटरप्रिटेशन आगे देखें।

एसेसमेंट टेस्ट का स्कोर इंटरप्रिटेशन
0–8: दोस्ती में सामान्य तनाव हो सकता है। कोई स्पेसिफिक समस्या हो तो उस पर ध्यान दें।
9–17: रिश्ते में असंतुलन है। सीमाएं तय करें, सामने वाले की प्रतिक्रिया नोटिस करें।
18–26: लंबे समय से चल रहा नुकसानदेह पैटर्न हो सकता है। दूरी बनाना उचित है।
27–36: मेंटल हेल्थ को गंभीर नुकसान हो सकता है। भरोसेमंद व्यक्ति से बात करें या मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट की मदद लें।
नोट: यह कोई मेडिकल टेस्ट या बीमारी का निदान नहीं है। यह सिर्फ अपने रिश्ते को समझने का एक तरीका है। अगर रिश्ते में धमकी, पीछा करना, हिंसा, यौन दबाव या आर्थिक शोषण हो, तो सिर्फ स्कोर देखकर फैसला न करें। अपनी सेफ्टी को प्राथमिकता दें।
आगे का कदम क्या हो?
दोस्ती में वापस न जाकर खुद को वापस कैसे पाएं?
टॉक्सिक दोस्ती को खत्म करना पहला कदम था। अब दूसरा कदम है, उस खाली जगह को हेल्दी फ्रेंडशिप से भरना।
1. अपनी फीलिंग्स को आइडेंटीफाई करें
जब भी पुराने दोस्त को फोन करने का मन करे, तो उन पुरानी घटनाओं और उसके पैटर्न को एक डायरी में लिखिए। जब आप दोस्त थे तो उसका बिहेवियर क्या होता था।
घटना– दोस्त का फोन आया, उसे हेल्प मांगी।
विचार– “अगर मैंने मदद नहीं की तो मैं स्वार्थी हूं। ”
भावना– अपराधबोध महसूस हुआ।
मेरा व्यवहार– अपना काम छोड़कर तुरंत मदद की।
तुरंत मिला फायदा– महसूस हुआ कि मैं अच्छा और जरूरी हूं।
बाद की फीलिंग्स– बाद में गुस्सा आया, थकान महसूस हुई।
2. अपनी पुरानी धारणाओं को चुनौती दें
आप दोस्त हैं। आप किसी के इमरजेंसी सर्विस सेंटर नहीं हैं। इसलिए अगर आपका मन कहता है– “मेरा महत्व तभी है, जब मैं दूसरों की समस्याएं हल करूं।” तो इसे बदलकर खुद से कहें—
“मदद करना मेरी खूबी है। लेकिन मेरी महत्व इस बात पर निर्भर नहीं करता कि कितने लोग मुझ पर निर्भर हैं।”
3. ‘NO’ कहने की शुरुआत करें
सीधे बड़े बदलावों की जरूरत नहीं है। इसलिए छोटे–छोटे प्रयोग करें। इस सप्ताह ये छोटे कदम उठाएं—
- किसी गैरजरूरी डिमांड का जवाब तुरंत न दें।
- एक बार सम्मानपूर्वक ‘NO’ कहें।
- किसी दोस्त से छोटी-सी मदद मांगें।
एक बार अपनी जरूरत सामने रखें। फिर देखें कि सामने वाला क्या करता है। याद रखें–
एक स्वस्थ दोस्त आपकी हर बात से सहमत नहीं होगा। लेकिन वह आपकी सीमा का सम्मान करेगा।
अब नए दोस्त कैसे बनेंगे?
यहीं सबसे ज्यादा धैर्य की जरूरत है। अकेलेपन का इलाज पुराने खराब रिश्ते में वापस लौटना नहीं है। उसका बेहतर रास्ता है, नए और स्वस्थ सामाजिक रिश्ते बनाना।
लेकिन ऐसा नहीं है कि पहली मुलाकात में ही कोई आपका अच्छा दोस्त बन जाएगा। दोस्ती अचानक नहीं बनती। वह बार-बार मिलने, बात करने, चीजें शेयर करने और साझे अनुभवों से बनती है।

पुराने दोस्त वापस आ जाएं तो क्या करें?
उनसे जुड़ा कोई फैसला सिर्फ इस आधार पर न लें कि आप अब अकेले हैं। इसके बजाय ये सवाल पूछें—
- पुराने और नए वक्त में क्या बदला है?
- क्या उन्होंने अपने पुराने व्यवहार की जिम्मेदारी ली है?
- क्या उन्होंने आपकी निजता का सम्मान करना शुरू किया है?
- क्या वे आपकी जरूरत के समय भी मौजूद हैं?
- क्या वह आपकी सीमाओं को स्वीकार करते हैं?
- क्या माफी मांगने के साथ उनके व्यवहार में भी बदलाव आया है?
याद रखें– माफी मांगना और खुद को बदलना दो अलग चीजें हैं।
प्रोफेशनल हेल्प कब जरूरी?
अगर अकेलापन, चिंता, उदासी या अपराधबोध लगातार बना हुआ है और रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर रहा है तो मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट से बात करना मददगार हो सकता है।
अंतिम बात
दोस्ती खत्म होने के बाद पैदा हुए खालीपन को तुरंत भरने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। इसके बजाय यह समझना चाहिए कि वास्तव में किस चीज की कमी महसूस हो रही है।
अगर आप बार-बार ऐसे रिश्तों में फंसते हैं, जहां आपको अपनी जरूरतों से ज्यादा दूसरे व्यक्ति की जरूरतों की चिंता रहती है, तो इस पैटर्न को भी समझना बहुत जरूरी है। जीवन का मकसद सिर्फ एक टॉक्सिक दोस्ती के लूप से बाहर निकलना नहीं, बल्कि ओवरऑल स्वस्थ, सुंदर रिश्ते बनाना है।
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किसी करीबी दोस्त की अचानक मौत बहुत बड़ा मानसिक झटका हो सकती है। इसके बाद अपनी सेहत को लेकर ज्यादा सतर्क हो जाना भी सामान्य है। लेकिन अगर बार-बार जांच कराने के बाद भी मन को तसल्ली न मिले, हर छोटे लक्षण को गंभीर बीमारी मान लिया जाए तो यह सिर्फ सतर्कता नहीं है। यह हेल्थ एंग्जाइटी का संकेत हो सकता है। पूरी खबर पढ़िए…

