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खेल मंत्रीजी के इलाके में 'पा नी सा..':ड्रम तक पहुंची DIG साहब की टीम; किसान की तोहमत-SDM 'रील-प्रेमी'




नमस्कार जयपुर में खेलमंत्रीजी का निशाना ड्रेनेज के मामले में चूक गया। राज्यसभा सांसद और रिटायर्ड IAS साहब को पुराने दिन याद आ रहे हैं। चौमूं SDM पर किसान ने बड़ी तोहमत लगाई और एंटी नारकोटिक्स वाले DIG साहब की टीम ड्रम तक पहुंच गई। राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में.. 1. खेल मंत्रीजी का ‘ड्रेनेज प्लान’ खेल मंत्रीजी खिलाड़ी रहे हैं। उनका निशाना अचूक है। खिलाड़ी जब राजनेता बनता है तो ईमानदार होता है। उसके जेहन में खेल नियम हमेशा रहते हैं। वह फाउल से डरता है। जबकि नेता ‘बड़े खिलाड़ी’ होते हैं। उनके पास हर मर्ज की दवा होती है। हर समस्या का तोड़ होता है। तोड़ न हो तो तोड़ का आश्वासन का जरूर होता है। खेल मंत्रीजी उन ‘बड़े खिलाड़ियों’ जैसे नहीं। आज भी वे समर्पित खिलाड़ी की तरह राजनीति की बिसात पर चल रहे हैं। मंत्रीजी ने अपने क्षेत्र में 500 करोड़ के ड्रेनेज प्लान का ऐलान किया था। जनता को आस जगी कि इस बार बारिश में सड़कें दरिया नहीं बनेंगी। लेकिन मानसून के एक ही झटके ने झोटवाड़ा की हालत झर-झर कर दी। लोग रील बनकर डालने लगे। तोहमतें लगाने लगे। ड्रेनेज प्लान पर पानी फिरता दिखा। झोटवाड़ा ही क्यों? सारे शहर का यही हाल है। ठेकेदार कैसे इतनी खामियां कर जाते हैं। इतने साल में ड्रेनेज के हाल क्यों नहीं सुधरे। जबकि निगम और विकास प्राधिकरण करोड़ों फूंक रहे हैं। व्यवस्था में ही छेद हो सकता है। राठौड़ साहब गोली मारकर बोतल उड़ा देते हैं। टारगेट बोर्ड के बीचों-बीच निशाना लगा सकते हैं। लेकिन राजनीति में अच्छे-अच्छों का निशाना चूक जाता है। 2. तस्वीरें कुछ बोलती हैं.. आदमी जब किसी मुकाम पर पहुंचता है तो उसे सफर के शुरुआत की बहुत याद आती है। बीते दौर में किया हुआ संघर्ष बहुत प्रिय लगने लगता है। सतीश पूनियाजी ने एक पोस्ट शेयर की। एबीवीपी का कार्यक्रम है। पूनिया शपथ ले रहे हैं। बिल्कुल नौजवान। पहचान पाना मुश्किल। पूनियाजी तस्वीर शेयर करते हुए प्रसिद्ध गीतकार शैलेंद्र के गीत की लाइन लिखते हैं- कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन.. एबीवीपी के उन शुरुआती दिनों से लेकर राज्यसभा की सीढ़ियां चढ़ने तक पूनियाजी ने क्या कुछ सहा होगा, क्या-कुछ किया होगा। कभी उठे होंगे, कभी गिरे होंगे, कहीं जीते होंगे, कुछ हारे होंगे। किसी के भले बने होंगे, किसी के लिए बुरे हो गए होंगे। रास्ते भर सिर्फ बहारें तो आती नहीं। कंकड़ पत्थर शूल धूल आंधी-तूफान बारिश ओले..सारे मौसम आते हैं। फिर भी शिखर पर पहुंचकर आदमी को शैलेंद्र का गीत ही याद आता है- कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन.. बीते दिनों का लौटना मुमकिन नहीं, लेकिन उन दिनों की यादें जेहन में अंत तक रहती हैं। ऐसी ही एक पोस्ट सोशल मीडिया पर रिटायर्ड IAS रोहित कुमार सिंह ने भी शेयर की है। उन्होंने 1983 में अपनी इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान बनाए कुछ नोट्स के पन्ने शेयर किए हैं। उन्होंने इन पन्नों को अनमोल बताया है। उस दोस्त को धन्यवाद दिया, जिसने इन्हें संभालकर रखा। तस्वीर हो या पन्ना अगर बीते दौर की याद ताजा कर दे, हंसा दे या फिर रुला दे तो समझिए आप अभी जिंदा हैं और सफर जारी है। मुंशी प्रेमचंद ने ठीक ही कहा था- अतीत कितना भी संघर्ष भरा रहा हो, यादें मधुर ही होती हैं… 3. SDM साहब का रील प्रेम चौमूं के SDM साहब रील प्रेमी बताए जाते हैं। सोशल मीडिया पर उनकी रील्स की भरमार है। रील्स में साहब लोगों की समस्याएं सुलझाते दिखते हैं। बुजुर्गों का आशीर्वाद पाते दिखते हैं। खरी बात कहते नजर पड़ते हैं। लोगों से कहते हैं कि फलां काम न बने तो सीधे मेरे कोर्ट में आ जाना। बहू गर्म रोटी न दे तो मेरे कोर्ट में आ जाना। माता-पिता की इज्जत नहीं करता तो मेरे कोर्ट… उनकी रील्स की चर्चा है। हालांकि रील्स बनाकर अपने जनसेवक अवतार का प्रदर्शन करना नेताओं का काम है। उन्हें लोगों के वोट चाहिएं। इसलिए नेता रील बनाते हैं। अफसर क्यों रील बनाए? उसका तो काम ही है जनता के काम करना। लेकिन डिजिटल युग है तो कोई बात नहीं। मैसेज तो जा रहा है कि अच्छा काम हो रहा है। आजकल वैसे भी बड़े मंचों पर सम्मानित वही होते हैं जो रील्स में काम करते नजर आते हैं। इधर रील्स बनाने वाले अफसर को एक लोकल नेताजी पचा नहीं पा रहे हैं। स्थानीय नेता किसान भी हैं। अपना मामला लेकर गए थे एसडीएम के पास। शिकायत लेकर लौटे। उन्होंने एसडीएम साहब के रील प्रेम का भेद खोल दिया। बोले-साहब कोई काम ढंग का नहीं करते। सेवा शिविर में वक्त पर नहीं पहुंचते। एक लड़का साथ रखते हैं जो उनकी रील बनाकर सोशल मीडिया पर डालता रहता है। हालांकि नेताजी को यह पचता नहीं होगा कि कोई अफसर खुद नेता बनकर घूमे। बाकी, सच क्या है झूठ क्या है राम जाने। 4. चलते-चलते.. बच्चन साहब की फिल्म ‘शराबी’ में गीतकार अंजान ने बहुत ही सुनहरी शब्दों में नशेबाजों को डिफेंड किया। गीतकार ने लिखा है- नशे में कौन नहीं है मुझे बताओ जरा। इस पंक्ति के बाद गीतकार नशे के प्रकार गिनाते हैं- किसी को हुस्न-जवानी का नशा, किसी को इस बात का, किसी को उस बात का नशा। फेहरिस्त लंबी है। बहरहाल, एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स के DIG विकास कुमार ने भी कविता के जरिए बताया कि उन्हें भी कुछ नशों की लत है। डीआईजी साहब कहते हैं- एक नशा है, सेनानी खड़े कई लाख कर देंगे। एक नशा है कि नशाखोरों की खत्म साख कर देंगे एक नशा है कि नशे की निशा का नाश कर देंगे और एक नशा है कि नशे को जलाकर राख कर देंगे। ईंधन बचाने के लिए डीआईजी साहब साइकिल से दफ्तर पहुंचते नजर आए थे। लेकिन नशा तस्करों और नशे के नेटवर्क तक उनके पहुंचने की स्पीड सुपर-सोनिक है। राजस्थान मध्यप्रदेश में बेखौफ नेटवर्क फैलाने वाले नशा तस्कर सुनील रावत मीणा को उनकी टीम ने मध्यप्रदेश के नीमच से आधी रात को उठा लिया। खौफ ऐसा कि कुख्यात तस्कर ने ड्रम के पीछे छुपकर बचने की कोशिश की। उसे बिल से निकालकर दफ्तर में पेश किया गया है। इनपुट सहयोग- मनोज सैनी (चौमूं, जयपुर), ओम टेलर (पाली)। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल सुबह 7 बजे मुलाकात होगी।



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