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हाईकोर्ट बोला- बच्चों के पुनर्वास और शिक्षा की जिम्मेदारी उठाएं:कहा-कानून का मकसद बच्चों को दंड देकर समाज से अलग करना नहीं




इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि किशोर न्याय कानून का उद्देश्य बाल अपराधियों को केवल दंडित करना नहीं, बल्कि उनके पुनर्वास, विकास और समाज में पुनर्स्थापना को सुनिश्चित करना है।
न्यायालय ने कहा- किशोर न्याय अधिनियम 2015 ने कठोर दंडात्मक व्यवस्था से हटकर पुनर्वासात्मक न्याय की अवधारणा को अपनाया है। किशोर न्याय बोर्ड और बाल न्यायालयों को बच्चों के पुनर्वास और पुनर्स्थापना की जिम्मेदारी निभानी होगी। कासगंज और जालौन का मामला
कासगंज और जालौन निवासी दो बाल अपचारियों की आपराधिक अपील स्वीकार हुए न्यायमूर्ति अजय भनोट ने यह आदेश दिया। अधीनस्थ न्यायालय ने पाक्सो एक्ट में आरोपित दोनों ही आरोपितों की जमानत अर्जी अस्वीकृत कर दी थी। वह हाईकोर्ट से मिली अंतरिम जमानत पर हैं। कोर्ट ने क्या कहा जानिए
कोर्ट ने कहा भारत ने 11 दिसंबर 1992 को संयुक्त राष्ट्र के बाल अधिकार संबंधी कन्वेंशन को स्वीकार किया था, जिसके बाद बच्चों के सर्वोत्तम हित को ध्यान में रखते हुए किशोर न्याय कानून में व्यापक प्रावधान किए गए। न्यायालय ने किशोर न्याय अधिनियम की धारा 3 के तहत बच्चे के सर्वोत्तम हित, सकारात्मक उपाय, संस्थागत देखभाल को अंतिम विकल्प और न्यायिक प्रक्रिया से अलग वैकल्पिक उपाय जैसे सिद्धांतों को महत्वपूर्ण बताया। कहा, ‘हर निर्णय में बच्चे के सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। उसकी क्षमताओं के पूर्ण विकास के लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराया जाना चाहिए। कानून का मकसद बच्चों को दंड देकर समाज से अलग करना नहीं, बल्कि उन्हें सशक्त बनाकर मुख्यधारा में वापस लाना है। किशोर न्याय बोर्ड और बाल न्यायालय बच्चे के संरक्षक की भूमिका में भी कार्य करते हैं।’ पीठ का कहना था कि किशोर न्याय बोर्ड को यह सुनिश्चित करना होगा कि बच्चे और उसके माता-पिता की प्रक्रिया के प्रत्येक चरण में सूचित भागीदारी हो। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बच्चे को रिहा किए जाने के बाद भी पुनर्वास और समाज में पुनर्स्थापना की प्रक्रिया समाप्त नहीं होती। किशोर न्याय बोर्ड को उसकी निगरानी और देखभाल जारी रखनी होगी। बच्चा केवल अपराध का आरोपित नहीं
कोर्ट ने कहा कि किशोर न्याय अधिनियम का पूरा ढांचा इस सोच पर आधारित है कि कानून से संघर्षरत बच्चा केवल अपराध का आरोपित नहीं है, बल्कि उसके विकास और भविष्य की भी चिंता की जानी चाहिए। अपीलकर्ता के जमानत के अधिकार को मनमाने शर्तों या जमानतदारों की अनावश्यक मांगों से बाधित नहीं किया जाना चाहिए। निर्णय की प्रतियां सभी बाल न्याय बोर्डों और बाल न्यायालयों को भेजे जाने का भी निर्देश कोर्ट ने दिया है। प्रकरण में राज्य सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी और एजीए प्रथम परितोष कुमार मालवीय ने पक्ष रखा। अदालत ने प्रकरण में सहयोग के लिए एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) विजेता सिंह की भी सराहना की।



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