![]()
हार्ट अटैक को अचानक होने वाली कोई अप्रत्याशित घटना माना जाता है। लेकिन इसके पीछे हमेशा एक पृष्ठभूमि होती है, जो अकसर बिना किसी चेतावनी के लंबे समय दबी-छुपी रह सकती है। कोरोनरी आर्टरी डिसीज एक धीमी और खामोश प्रक्रिया है, जो लक्षण दिखने से कई साल या कई दशकों पहले से विकसित हो रही होती है। दुनिया में शायद ही कहीं यह स्थिति भारत से ज्यादा स्पष्ट दिखाई देती हो। दुनिया भर में कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों से होने वाली मौतों में से 20% अकेले भारत में ही होती हैं। भारतीयों में कोरोनरी आर्टरी डिसीज पश्चिमी देशों के लोगों की तुलना में लगभग एक दशक पहले विकसित हो जाती हैं। कम उम्र में हार्ट अटैक के मामले बढ़ रहे हैं तो आशंका यह भी है कि शायद बड़ी संख्या में इस जोखिम से अनजान लोग इन बीमारियों के साथ जी रहे हों। आज हम 30 की उम्र के लोगों में भी हार्ट अटैक देख रहे हैं। इनमें वो भी हैं, जो पूरी तरह फिट दिखते हैं। 2000-2024 के बीच हेल्थ डेटा की समीक्षा से पता चलता है कि शहरी क्षेत्रों के लगभग 12% भारतीय किसी न किसी तरह की कार्डियोवैस्कुलर डिसीज से प्रभावित थे। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की 2022 की रिपोर्ट में हार्ट अटैक से 32 हजार से अधिक मौतें दर्ज की गईं, जो साल-दर-साल 12% से अधिक की वृद्धि को दर्शाती हैं। भारतीय पुरुषों में होने वाले हार्ट अटैक में से करीब 25% 40 वर्ष की उम्र से पहले होते हैं। 50 की उम्र तक तो यह आंकड़ा 50% तक पहुंच जाता है। कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों के इतने मामले समय रहते पहचान में क्यों नहीं आ पाते? इसकी वजह हमारी बुनियादी वैस्कुलर बायोलॉजी में छिपी है। एथेरोस्क्लेरोसिस, यानी धमनियों में प्लाक जमा होने के कारण उनका धीरे-धीरे संकरा होना अपने आप में दर्द पैदा नहीं करता। धमनियों में दर्द महसूस कराने वाले रिसेप्टर होते ही नहीं हैं। इस प्रक्रिया के तीन सबसे बड़े फैक्टर्स- हाइपरटेंशन, डिसलिपिडेमिया और डायबिटीज भी अपने-आप में साइलेंट स्वास्थ्य स्थितियां हैं। कोई व्यक्ति वर्षों तक खतरनाक रूप से बढ़े हुए ब्लडप्रेशर या कोलेस्ट्रॉल के साथ रह सकता है और बिल्कुल सामान्य महसूस कर सकता है। आमतौर पर लक्षण तभी दिखते हैं, जब धमनी बहुत ज्यादा ब्लॉक हो गई हो। लेकिन तब तक बीमारी काफी बढ़ चुकी होती है। सीने में दर्द, प्लाक-रेप्चर, सांस फूलने या थकान जैसे लक्षणों का इंतजार करना उस स्थिति का इंतजार करना है, जब शरीर का सिस्टम फेल हो चुका हो। भारत में कम उम्र में ही तेजी से बढ़ते हृदय रोगों के मद्देनजर जोखिम का आकलन 30-35 वर्ष की उम्र में या उससे भी पहले हो जाना चाहिए, न कि परंपरागत तौर पर 40-45 वर्ष की उम्र के बाद, जैसा विदेशों में होता है। खासकर 30 की उम्र के पार बेसिक लिपिड प्रोफाइल, ब्लड प्रेशर और ब्लड ग्लूकोज की जांच हर वयस्क के नियमित हेल्थ चेकअप का हिस्सा होने चाहिए। जिन लोगों की हार्ट डिसीज, डायबिटीज या अन्य जोखिम कारकों की फैमिली हिस्ट्री हो, उनके लिए इमेजिंग आधारित जांचें किसी भी एबनॉर्मेलिटी के सामने आने से वर्षों पहले ही धमनियों में जमा प्लाक का पता लगा सकती हैं। इन जांचों के अपने फायदे और सीमाएं हैं। डॉक्टर किसी व्यक्ति की हेल्थ प्रोफाइल, लक्षणों और रिस्क-फैक्टर के आधार पर उपयुक्त जांच का चुनाव कर सकते हैं। समय पर जांच कराना आपात स्थिति में बायपास सर्जरी और स्टेंटिंग से बेहतर है। एम्प्लॉयर्स को भी सालाना कार्डियक रिस्क स्क्रीनिंग को वर्कप्लेस सेफ्टी प्रोटोकॉल जितनी ही गंभीरता से लेना चाहिए। बीमा कंपनियों को भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए कि वे बीमारी होने के बाद इलाज का खर्च उठाने के बजाय प्रिवेंटिव डायग्नोस्टिक्स को भी कवर करें, क्योंकि बीमारी का जल्दी पता लगाना ज्यादा किफायती रास्ता है। भारतीयों में कोरोनरी आर्टरी डिसीज पश्चिमी देशों के लोगों की तुलना में एक दशक पहले विकसित हो जाती हैं। कम उम्र में हार्ट अटैक के मामले बढ़ रहे हैं तो आशंका यह भी है कि शायद बड़ी संख्या में इस जोखिम से अनजान लोग इन बीमारियों के साथ जी रहे हों।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
Source link
डॉ. नरेश त्रेहान का कॉलम:बिना चेतावनी लंबे समय तक दबे-छुपे रह सकते हैं हृदय रोग
