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कुछ दिनों पहले ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के दौरान पुणे में युवा महिलाओं को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि भारत में आदर्श नारी को तीन वर्गों में डाल दिया जाता है, उसे सिर्फ बेटी, पत्नी या मां के रूप में देखा जाता है। राहुल ने आगे कहा कि इनमें से किसी एक के रूप में देखे जाने में कोई गलत बात नहीं है, लेकिन यही आपकी एकमात्र पहचान नहीं हो सकती। कई महिलाएं बेहतरीन प्रोफेशनल होती हैं, जिनकी महत्वाकांक्षाएं और सपने इन पारंपरिक भूमिकाओं से आगे हैं। लेकिन अपने लक्ष्यों को हासिल करने की उनकी कोशिश अक्सर उन रुकावटों से भरी होती है, जो समाज और उसे चलाने वाली सोच उनके सामने खड़ी करती है। इन रुकावटों और इस सोच के खिलाफ लड़ना और उन्हें दूर करना जरूरी है। महिला दर्शकों की जोरदार तालियों के बीच राहुल का आखिरी संदेश था : ‘पिंजरा तोड़ो, पितृसत्ता को खत्म करो।’ अब तक इस तरह की बातें दुनिया भर में अकादमिक सेमिनारों और कॉन्फ्रेंस में लगातार सुनने को मिलती रही हैं। लेकिन जहां तक मेरी जानकारी है, पहली बार इन्हें भारत की मुख्यधारा की राजनीति में लाया गया है।
अकादमिक और राजनीतिक मुख्यधारा अकसर सामाजिक और राजनीतिक जीवन के दो अलग-अलग हिस्से होते हैं। अमेरिका की आईवी लीग यूनिवर्सिटीज में ‘मागा’ की सोच का बहुत कम या बिल्कुल असर दिखाई नहीं देता। भारत में जेएनयू को भी अकसर एक अलग दुनिया माना गया है। केरल या बंगाल (जब राज्य में सीपीएम की सरकार थी) को छोड़ दें तो जेएनयू की राजनीतिक संस्कृति का राष्ट्रीय मुख्यधारा से बहुत कम मेल रहा है। दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (और सोशियोलॉजी) का रिकॉर्ड भी कुछ ऐसा ही रहा है- मुख्यधारा की राजनीति में उसकी भूमिका शायद ही कभी उसकी बौद्धिक चमक के बराबर रही हो। इसलिए राहुल गांधी का पितृसत्ता के खिलाफ कदम नया और अलग है। यह सुनिश्चित करने के लिए कि पितृसत्ता को खत्म करो की अपील को ऊपर से थोपी गई कोई बौद्धिक बात न माना जाए, जिसका महिलाओं की रोजमर्रा की जिंदगी से कोई लेना-देना नहीं हो, पुणे में राहुल का बात रखने का तरीका काफी अलग था। उन्होंने इसे किसी यूनिवर्सिटी की ऊंची अकादमिक दुनिया से सीधे निकले राजनीतिक भाषण की तरह नहीं, बल्कि एक बड़े जन-कार्यक्रम की तरह पेश किया। मंच पर कई युवा महिलाओं को बुलाया गया था। इनमें लगभग सभी छात्राएं या हाल ही में पढ़ाई पूरी करने वाली युवा महिलाएं थीं। उन्होंने अपनी पढ़ाई और दूसरे लक्ष्यों के बारे में बताया और उन रुकावटों के बारे में भी बताया, जिनका उन्हें सामना करना पड़ता है। इनमें शहर और गांव, दोनों जगहों से आई महिलाएं थीं। कुछ अंग्रेजी अच्छी तरह बोल रही थीं, कुछ हिंदी में और कुछ मराठी में। कुछ ऊपरी-मध्यम वर्ग के परिवारों से थीं; एक आदिवासी महिला थीं और एक महाराष्ट्र के एक छोटे शहर के एक सफाई कर्मचारी की बेटी थीं। सफाईकर्मी की बेटी ने दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पढ़ाई की थी और पत्रकार बनना चाहती हैं, लेकिन उन्हें बार-बार कहा जाता है कि वे पत्रकार नहीं बन सकतीं, उन्हें शादी के बारे में सोचना चाहिए। सभी महिलाओं ने अपनी बात इस तरह रखी कि रोजमर्रा की जिंदगी पर पितृसत्ता के बुरे असर को समझा जा सके। उन्होंने बताया कि गांव से बाहर के स्कूलों में जाना कितना मुश्किल है; सार्वजनिक परिवहन कितना असुरक्षित है, चाहे बसें भरी हों या खाली; सोशल मीडिया का इस्तेमाल उन्हें शर्मिंदा करने और दबाव बनाने के लिए कैसे किया जाता है। सिर्फ लिखकर ट्रोल करने के जरिए नहीं, बल्कि तस्वीरों और वीडियो के साथ छेड़छाड़ करके भी; महिला वकीलों को कमतर मानने वाली सोच के कारण कानूनी मामले योग्यता के आधार पर नहीं, बल्कि जेंडर के आधार पर दिए जाते हैं; कैसे नागरिक के तौर पर अभिव्यक्ति की आजादी का इस्तेमाल करने पर उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कर दी जाती है और कहा जाता है कि महिलाओं को अभिव्यक्ति की इतनी स्वतंत्रता नहीं दी जा सकती। इस कार्यक्रम का मकसद सिर्फ किसी विचार को उदाहरणों के जरिए समझाना नहीं था। इस कवायद का मकसद गहराई से राजनीतिक था। बंगाल में जीत के बाद बीजेपी का राजनीतिक प्रभाव बहुत बढ़ गया था। लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) आंदोलन- खासकर जंतर-मंतर का प्रदर्शन- ने देश में राजनीतिक विमर्श को बदला है। इसी मौके का फायदा उठाते हुए राहुल गांधी राजनीतिक बहस में बढ़त हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं। 2027 में कई विधानसभा चुनाव होने हैं और छात्र व महिलाएं यकीनन एक महत्वपूर्ण वोटर समूह हैं। अब तक जिस तरह की बातें अकादमिक सेमिनारों और कॉन्फ्रेंस में सुनने को मिलती थीं, उन्हें पहली बार मुख्यधारा की राजनीति में लाया गया है। देखना होगा कि पितृसत्ता को खत्म करो वाले संदेश का महिलाओं पर क्या असर होता है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)
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