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Himalaya Spy Mission | India US Nuclear Device Mystery


जमीन से हजारों फीट ऊपर, बादलों के पार, भारत और अमेरिका मिलकर चीन की जासूसी कर रहे थे। वे 23 हजार फीट ऊंचे पहाड़ पर खतरनाक परमाणु उपकरण छोड़ आए। ऐसा उपकरण, जिसमें नागासाकी को तबाह करने वाले परमाणु बम में इस्तेमाल किए गए प्लूटोनियम का एक-तिहाई हिस्सा मौ

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23 जून 1965 की शाम। दिल्ली का पालम हवाई अड्डा, जो अब इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट के नाम से जाना जाता है। रनवे के पास भीड़ जुटी थी। ढोल-नगाड़े बज रहे थे। भीड़ में सबसे आगे खड़े थे देश के कार्यवाहक प्रधानमंत्री गुलजारी लाल नंदा।

साढ़े चार बजे हवा को चीरता हुआ वायुसेना का डकोटा विमान रनवे पर उतरा। दरवाजा खुला और बाहर निकले 21 जांबाज।

यह वही दस्ता था, जो माउंट एवरेस्ट के माथे पर देश का झंडा गाड़कर लौटा था। दुनिया के नक्शे पर ब्रिटेन, अमेरिका और चीन के बाद भारत का नाम दर्ज हो गया था।

टीम के अगुवा थे- कैप्टन एमएस कोहली। वह नौसेना में थे, लेकिन जुनून पहाड़ चढ़ने का था। बंटवारे के वक्त पाकिस्तान के हरिपुर से जान बचाकर आए थे। उनकी ट्रेन में सवार एक हजार यात्रियों को दंगाइयों ने मार डाला था।

रनवे पर खड़े कोहली के दिमाग में वही पुरानी तस्वीरें घूम रही थीं, तभी गुलजारी लाल ने उन्हें गले लगा लिया। कुछ देर बधाइयों का सिलसिला चला। फिर टीम एग्जिट गेट की तरफ बढ़ने लगी।

तभी भारत की खुफिया एजेंसी इंटेलिजेंस ब्यूरो के अफसर बलबीर सिंह ने कोहली के कान में धीरे से कहा- ‘विमान के पीछे कोई तुम्हारा इंतजार कर रहा है।’

कोहली पीछे पहुंचे। वहां आरएन काव खड़े थे। चेहरे पर हल्की मुस्कान और पैनी निगाहें। काव तब IB की हवाई खुफिया विंग ‘एविएशन रिसर्च सेंटर’, यानी ARC के डायरेक्टर थे।

काव ने कोहली को गले लगाते हुए कहा- ‘Congratulations Captain.’

कोहली कुछ कहते उससे पहले ही काव बोले- ‘एक सीक्रेट ऑपरेशन के लिए आपको अमेरिका जाना है।’

अमेरिका! कब और क्यों?

काव ने कोहली के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा- ‘अभी दिल्ली मत छोड़ना। जल्द मिलते हैं।’

15 अगस्त 1965 को भारत सरकार ने एवरेस्ट अभियान के नाम पर 15 पैसे का डाक टिकट जारी किया था।

15 अगस्त 1965 को भारत सरकार ने एवरेस्ट अभियान के नाम पर 15 पैसे का डाक टिकट जारी किया था।

दो दिन बाद… 25 जून 1965, दिल्ली का एक सेफ हाउस। बंद कमरे में 5 लोग बैठे थे- कैप्टन कोहली, IB प्रमुख बीएन मलिक, ARC डायरेक्टर आरएन काव, अमेरिकी माउंटेनियर बैरी बिशप और अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA का एक अफसर।

बीएन मलिक ने कोहली से कहा, ‘चीन परमाणु बम बना चुका है। वह भारत पर मिसाइल हमला कर सकता है। अमेरिका-भारत मिलकर उसकी निगरानी करेंगे।’

कैप्टन कोहली चुप रहे।

तभी आरएन काव बोले- ‘हमें हिमालय की एक चोटी पर जासूसी उपकरण लगाना है। आप टीम के फील्ड कमांडर होंगे।’

कैप्टन कोहली के मन में कई सवाल थे, लेकिन उन्होंने सहमति में सिर हिला दिया। वे जानते थे कि ना कहने का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि दो देशों की सरकारें फैसला कर चुकी हैं।

तारीख बदली और वो घड़ी आ गई, जिसका इंतजार कैप्टन कोहली 24 दिनों से कर रहे थे। 19 जुलाई को कोहली और उनके तीन साथियों को एक पैसेंजर विमान से चुपचाप अमेरिका भेज दिया गया।

वहां 20 हजार फीट ऊंची मैकिनाले चोटी पर माइनस 30-40 डिग्री तापमान और खतरनाक बर्फीले तूफानों के बीच काम करने की ट्रेनिंग दी गई। फिर प्लूटोनियम से चलने वाले जासूसी डिवाइस को पीठ पर लादकर पहाड़ चढ़ने की प्रैक्टिस कराई जाने लगी।

इधर, भारत-पाकिस्तान के बीच 1965 की जंग छिड़ चुकी थी। अमेरिका इस जंग में तटस्थ था, लेकिन पाकिस्तान खुलकर अमेरिकी पैटन टैंकों और हथियारों का इस्तेमाल कर रहा था।

तब वियतनाम जंग में फंसे अमेरिका ने भारत को युद्ध रोकने की धमकी दी और गेहूं की सप्लाई रोक दी, लेकिन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री अड़ गए।

हफ्ते में एक दिन के उपवास की घोषणा कर दी। यहीं से ‘जय जवान जय किसान’ का नारा गूंजने लगा।

इस सब के बावजूद दोनों देशों का खुफिया मिशन जारी रहा।

अगस्त 1965, अमेरिका और भारत की वो टीम जो चीन की जासूसी के लिए नंदा देवी की टॉप चोटी पर जाने वाली थी।

अगस्त 1965, अमेरिका और भारत की वो टीम जो चीन की जासूसी के लिए नंदा देवी की टॉप चोटी पर जाने वाली थी।

28 अगस्त को भारतीय टीम लौट आई। एक सैनिक विमान से अमेरिकी खुफिया अफसर और जासूसी उपकरण भी भारत पहुंचा दिया गया।

अमेरिकी टीम उपकरण को दुनिया की तीसरी सबसे ऊंची चोटी ‘कंचनजंगा’ पर लगाना चाहती थी। कैप्टन कोहली इसके लिए राजी नहीं हुए। लंबी बहस के बाद ‘नंदा देवी की टॉप चोटी’ को चुना गया। ऊंचाई 25 हजार 645 फीट। यह भारत की सीमा के भीतर थी और चीन की सरहद पर सीधी नजर रखती थी।

सीक्रेट मिशन का नाम रखा गया- ‘ऑपरेशन HAT’, यानी High Altitude Training.

18 लोगों की टीम बनी- कैप्टन कोहली समेत 4 भारतीय और 14 अमेरिकी। कोहली को ऑपरेशन का फील्ड कमांडर बनाया गया।

1 सितंबर 1965 की सुबह दिल्ली से काफिला निकला और 3 सितंबर को जोशीमठ पहुंच गया। आगे सड़कें नहीं थीं। करीब 15 हजार फीट की ऊंचाई पर नंदा देवी बेस कैंप था। वहीं से पूरा ऑपरेशन चलने वाला था।

वहां जाने का रास्ता संकरा, पथरीला और जानलेवा था। पैदल ही चलकर जाना था, वो भी 57 किलो भारी जासूसी उपकरण को लेकर।

खुफिया अफसरों ने मोटी रकम देकर लद्दाख के कुछ शेरपाओं और कुलियों को हायर कर लिया। ये वो लोग थे, जिनका जीवन ही पर्वतों पर बीतता है।

अब असल मुश्किल इस मिशन की सीक्रेसी थी। सब जानना चाहते थे कि इतनी भारी डिवाइस को नंदा देवी की चोटी पर क्यों ले जाया जा रहा।

फिर एक कहानी गढ़ी गई। कहा गया कि अमेरिकी ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी से होने वाले प्रभाव की स्टडी करने आए हैं।

200 कुलियों और 14 शेरपाओं को जुटाया गया। मशीन को 6 टुकड़ों में बांटा गया, ताकि किसी एक बंदे पर ज्यादा बोझ न पड़े। टीम चल पड़ी। आगे-आगे शेरपा, कुली और पर्वतारोही चल रहे थे, और ठीक पीछे CIA के अफसर और कैप्टन कोहली।

18 सितंबर को टीम नंदा देवी बेस कैंप पहुंच गई। बर्फानी हवाएं इतनी ठंडी थीं कि हर सांस फेफड़ों में सुइयों की तरह चुभती थी। यहां करीब 15 दिन गुजारने थे। भारतीय अफसरों के दिमाग में फिर से मिशन की सीक्रेसी का सवाल कौंधने लगा।

नंदा देवी पर्वत पर चढ़ाई के दौरान भारत-अमेरिका की टीम। AI इमेज

नंदा देवी पर्वत पर चढ़ाई के दौरान भारत-अमेरिका की टीम। AI इमेज

इतने अमेरिकी यहां क्या कर रहे हैं? बेस कैंप में रहने वाले कर्मचारियों के बीच कानाफुसी होने लगी थी। अमेरिकी टीम से कहा गया- ‘कम से कम बात करें। हां या ना में जवाब दें।’ पर, इतने से काम चलने वाला था नहीं।

खुफिया अफसरों को आइडिया आया- अमेरिकी अफसरों की बॉडी पेंट करने का, लेकिन वे इसके लिए राजी नहीं हुए।

अमेरिकी अफसरों को ‘मैन टैन’ नाम से एक लोशन दिया गया। कहा गया कि यह सनबर्न से बचाएगा, लेकिन असल में उनकी गोरी रंगत को ढकने की यह चाल थी।

अब तारीख आई 7 अक्टूबर 1965…

अमेरिकी वैज्ञानिकों ने उस उपकरण के कंटेनरों का लॉक खोला। अंदर, एक जनरेटर और सात रेडियोएक्टिव प्लूटोनियम कैप्सूल अलग-अलग कांच के सांचों में रखे थे।

जनरेटर तीन फीट लंबा और मशरूम के आकार का था। उसके साथ ट्रांसमिशन के लिए एक छाता-नुमा एंटीना और सिग्नल पकड़ने वाले खुफिया राडार जुड़े हुए थे।

सातों कैप्सूल को निकालकर जनरेटर में भरा गया। इनमें 4.5 किलो प्लूटोनियम- 238 भरा हुआ था।

इन कैप्सूलों का काम था- डिवाइस को सालों तक बिजली सप्लाई करना, यानी बैटरी का काम करना। इस उपकरण को नाम दिया गया- ‘स्पेस न्यूक्लियर ऑक्सिलरी पावर’ यानी SNAP-19.

8 अक्टूबर की सुबह, टीम चढ़ाई के लिए निकल पड़ी। उस रोज टीम का जोश देखते ही बन रहा था। टीम तेजी से ऊपर चढ़ रही थी, लेकिन तभी पर्वत ने अपना रंग दिखाया।

बर्फीली हवाएं दीवार बनकर खड़ी हो गईं। लोग गिरने लगे। फिसलने लगे। कुछ बीमार भी पड़ गए। शाम ढली तो चढ़ाई रोक दी गई।

रात 8 बजे का वक्त। एक अफसर तंबू का पर्दा उठाकर अंदर आया। उसके चेहरे की हवाइयां उड़ी हुई थीं।

‘क्या हुआ वांग्याल?’ कोहली ने पूछा।

उसने अपना भारी-भरकम बैकपैक पटका और घुटनों के बल बैठ गया। हांफते हुए बोला- ‘कैप्टन, मैंने ऋषि गंगा के उस पार एक जीव देखा। वह दो पैरों पर सीधा खड़ा था। कम से कम 15 फीट लंबा। काले-भूरे बालों से ढका हुआ।’

‘तुमने कैमरा निकाला?’ CIA के एक अफसर ने पूछा।

उसने हांफते हुए कहा- ‘जैसे ही मैंने बैकपैक उतारना चाहा, वह लंबी छलांग मारकर गायब हो गया।’

तंबू में खामोशी छा गई। कोने में बैठे लद्दाखी और तिब्बती शेरपा फुसफुसाने लगे- ‘ये तो पहाड़ी राक्षस है। अगर हमारे रास्ते में आ गया, तो किसी की हड्डी भी नीचे नहीं पहुंचेगी।’

‘क्या तुमने सच में ऐसा जानवर देखा?’ कोहली ने पूछा।

‘कैप्टन, मेरी आंखों में कोई धुंध नहीं थी। वह जो भी था, बेहद खौफनाक था।’

अब कोहली ने CIA के अफसरों की तरफ देखा। वे थोड़ा डरे हुए थे। कोहली ने गहरी सांस ली और वांग्याल के कंधे पर हाथ रखा।

‘सुनो सब, वांग्याल जो कह रहे हैं, उस पर शक नहीं है, लेकिन इतनी ऊंचाई पर दूर से किसी आकार का अंदाजा लगाना मुमकिन नहीं है। ये परछाइयों का खेल हो सकता है। पहाड़ी भालू होगा।’

‘क्या भालू 15 फीट लंबा हो सकता है?’ एक शेरपा ने डरते-डरते सवाल किया।

‘पहाड़ में हर साया बड़ा ही दिखता है। हमें अपने मिशन पर डटे रहना है। रात को पहरा बढ़ा दो।’ कोहली ने ये कहकर टीम को हौसला दिया, लेकिन उस रात बेस कैंप में कोई सो नहीं सका।

9 अक्टूबर को टीम और ऊपर बढ़ी। कैंप-3 पर पहुंचते-पहुंचते चट्टानें दिखना बंद हो गईं। सामने 23 हजार 750 फीट ऊंची सूखी बर्फ की दीवार खड़ी थी। खतरा हिमस्खलन का था। बर्फ की एक परत भी खिसकती, तो टीम हजारों फीट गहरी खाई में जा गिरती।

शाम के 4 बज रहे थे। तापमान माइनस 30 डिग्री पहुंच चुका था। कोई शेरपा थूकता भी था, तो वह फर्श पर गिरने से पहले बर्फ बन जा रहा था। टीम बर्फ को कुल्हाड़ी से काटकर और चट्टानों में रस्सियां बांधते हुए ऊपर बढ़ रही थी।

तभी बर्फीला तूफान आ गया। 100 किमी. प्रति घंटे की रफ्तार से चलती हवाएं तंबुओं को उखाड़ने लगीं। कुछ अफसर नीचे की तरफ भाग गए, तो कुछ वहीं डटे रहे।

तूफान जारी रहा। दिन-रात गुजरने लगे। भूख खत्म हो चुकी थी, गले सूख गए थे। ऑक्सीजन की कमी से हर सांस के साथ छाती दर्द से फटी जा रही थी।

पांचवें दिन 14 अक्टूबर की सुबह तूफान धीमा पड़ा। टीम ने फिर से जोर लगाया और दोपहर होने से पहले कैंप-4 तक पहुंच गई।

यहां से नंदा देवी की टॉप चोटी 1895 फीट ऊंचाई पर थी। तभी 16 अक्टूबर को फिर से भयानक तूफान आ गया। बर्फ अफसरों के जांघों तक जमा हो गई। तूफान इतना तेज था कि पास खड़ा आदमी तक दिखाई नहीं दे रहा था। हिमस्खलन का खतरा था।

तभी बेस कैंप से कोहली की आवाज गूंजी- ‘उपकरण को वहीं सुरक्षित बांध दो और तुरंत नीचे आ जाओ।’

अफसरों ने उपकरण को बर्फ की एक चट्टान से बांधा और नीचे उतर आए। तय हुआ कि अगले साल गर्मियों में आकर इसे फिर से इंस्टॉल करेंगे।

वे एक ऐसा उपकरण छोड़ आए थे, जिसमें 4.5 किलो प्लूटोनियम- 238 भरा था। जो नागासाकी पर गिराए गए परमाणु बम में इस्तेमाल किए गए प्लूटोनियम का एक-तिहाई हिस्से के बराबर था।

आगे जो हुआ, वो एक खतरनाक रहस्य बन गया। पूरी कहानी कल यानी रविवार को पार्ट-2 में पढ़िए…

रफेरेंस :

1. Nanda Devi: A Journey to the Last Sanctuary : By Hugh Thomson.

2. Spies in the Himalayas: By M.S. Kohli and Kenneth J. Conboy.

3. Nuclear Bomb in Ganga : By RK Yadav



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