- Hindi News
- Opinion
- Prof. Avinash Kumar Agarwal Column | AI Wont Replace Learning Methods
5 घंटे पहले
- कॉपी लिंक

प्रो. अविनाश कुमार अग्रवाल आईआईटी जोधपुर के निदेशक
जेन-जी और जेन-अल्फा ऐसी शैक्षणिक दुनिया में प्रवेश कर रहे हैं, जो पिछली पीढ़ियों से बिल्कुल अलग है। इनके पास इंटरनेट, डिजिटल प्लेटफॉर्म, स्मार्टफोन, एआई तक अभूतपूर्व पहुंच है। आज एक छात्र दुनिया के बेहतरीन संसाधनों से सीख सकता है, एआई को लर्निंग असिस्टेंट की तरह इस्तेमाल कर सकता है, जटिल प्रणालियों का सिमुलेशन कर सकता है, बड़े डेटासेट का विश्लेषण कर सकता है और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बैठे लोगों से सहयोग कर सकता है।
लेकिन जानकारी तक पहुंच को ज्ञान और एआई तक पहुंच को बुद्धिमत्ता नहीं समझना चाहिए। आज की शिक्षा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि छात्र सिर्फ जानकारी और जवाब हासिल करना न सीखें, बल्कि आलोचनात्मक ढंग से सोचें, सही सवाल पूछें, तर्क करें, रचनात्मक तरीके से काम करें और अपने फैसलों की जिम्मेदारी भी लें। शिक्षा व्यवस्था को अब सूचना-केंद्रित मॉडल से दक्षता, जिज्ञासा और प्रॉब्लम-सॉल्विंग-सेंट्रिक मॉडल की ओर बढ़ना होगा।
एआई शिक्षा में सीखने की जगह तो नहीं लेगा, लेकिन उसे बढ़ाने वाला माध्यम जरूर बनेगा। छात्र इसका इस्तेमाल जानकारी पाने, वैकल्पिक व्याख्याएं समझने, तत्काल फीडबैक लेने और अलग-अलग परिस्थितियों का सिमुलेशन करने के लिए कर सकते हैं। लेकिन जरूरी है कि उनकी बुनियादी समझ इतनी मजबूत हो कि वे एआई के जवाब पर सवाल उठा सकें, उसकी गलती पहचान सकें और जानकारी को वेरिफाई कर सकें।
सबसे विकसित एआई मॉडल भी गलती कर सकते हैं, इसलिए छात्रों को एआई के जवाब को आंख मूंदकर स्वीकार करने की बजाय उसे परखने और तकनीक का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करने की क्षमता विकसित करनी होगी। लक्ष्य सिर्फ एआई यूजर नहीं, बल्कि स्किल्ड, इनोवेटिव और जिम्मेदार मनुष्य तैयार करना होना चाहिए।
जब जानकारी हर जगह उपलब्ध है तो शिक्षक को भी अपनी भूमिका बदलनी होगी। टीचर अब सिर्फ जानकारी पहुंचाने वाला व्यक्ति नहीं हो सकता। उसे मेंटर, फैसिलिटेटर, चिंतक और मार्गदर्शक की भूमिका निभानी होगी। छात्रों को यह समझने में मार्गदर्शन देना होगा कि कौन-सी जानकारी विश्वसनीय है, ज्ञान कैसे निर्मित होता है और उसे मानवता के लिए सार्थक समाधान में कैसे बदला जा सकता है।
जेन-जी और जेन-अल्फा के डिजिटल रूप से सक्षम होने का मतलब यह नहीं है कि उन्हें अनुशासन की कम जरूरत है। बल्कि उन्हें अलग तरह के अनुशासन की जरूरत है। उन्हें अपना ध्यान नियंत्रित करना, तकनीक का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करना, लगातार काम करना, नैतिक फैसले लेना और अपने काम के परिणामों के प्रति जवाबदेह रहना सीखना होगा।
अब शिक्षक-छात्र सम्बंध भी शिक्षा के केंद्र में रहेंगे और एआई के दौर में इसकी भूमिका और महत्वपूर्ण होगी। शिक्षा में तकनीक को मानवीय पक्ष का विकल्प नहीं, बल्कि उसका सहायक बनाना होगा। मौजूदा शिक्षा व्यवस्था की बुनियाद आज भी प्रासंगिक है।
बदलाव का मतलब पुराने सिस्टम को खत्म करना नहीं, बल्कि उसे अगले चरण तक ले जाना है। गणित, विज्ञान, इंजीनियरिंग, ह्यूमैनिटीज, कम्युनिकेशन, नैतिकता और आलोचनात्मक-चिंतन जैसे बुनियादी विषयों को बनाए रखते हुए इन्हें एआई, डेटा साइंस, रोबोटिक्स, उन्नत मैन्युफैक्चरिंग, बायोटेक्नोलॉजी, सेमीकंडक्टर्स, ऊर्जा, स्वास्थ्य-सेवा और जलवायु तकनीकी जैसे उभरते क्षेत्रों से जोड़ना होगा।
हमें अब शिक्षा को ज्यादा लचीला और बहुआयामी बनाना होगा। एनर्जी, हेल्थकेयर, मोबिलिटी, जलवायु परिवर्तन, कृषि, जल, शहरीकरण सम्बंधी 21वीं सदी की समस्याओं का समाधान किसी एक विषय के जरिए नहीं हो सकता। इसके लिए इंजीनियरों, वैज्ञानिकों, डिजाइनरों, समाज-विज्ञानियों और नीति-निर्माताओं को अपने-अपने दायरों से बाहर निकलकर साथ काम करना होगा।
जेन-जी और जेन-अल्फा टेक्नोलॉजी के साथ सहज हैं। यह उनकी बड़ी ताकत है। चुनौती तब आती है जब तेजी से सूचनाओं को कंज्यूम करने की आदत गहराई से सीखने और समझने के लिए जरूरी धैर्य की जगह ले लेती है। इसलिए क्लासरूम में सीखने का ऐसा माहौल भी हमें बनाना होगा, जहां छात्र गहराई से एक्सप्लोर करना भी सीखें।
एआई का इस्तेमाल सीखें, लेकिन यह भी जानें कि कब इस्तेमाल नहीं करना है। तकनीक एक टूल है, जो समय के साथ बदलती रहेगी। वह इंसानी क्षमता को बढ़ा सकती है, लेकिन यह तय नहीं कर सकती कि उस क्षमता का सार्थक और जिम्मेदार इस्तेमाल क्या होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

