टाइम. न्यूयॉर्क40 मिनट पहले
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मनोवैज्ञानिक रेचल नीडल के मुताबिक चुप्पी का असर सामने वाले पर अस्वीकार किए जाने जैसा हो सकता है।- प्रतीकात्मक फोटो
झगड़े के बाद पार्टनर अचानक बात करना बंद कर दे तो दिमाग में कई सवाल उठने लगते हैं-आखिर हुआ क्या, गलती किसकी थी और अब रिश्ता किस दिशा में जाएगा? विशेषज्ञों के मुताबिक हर चुप्पी ‘साइलेंट ट्रीटमेंट’ यानी दबाव बढ़ाने की रणनीति नहीं होती। कई बार व्यक्ति भावनाओं से इतना भर जाता है कि तुरंत बात करने की स्थिति में नहीं होता। कुछ लोग इस डर से भी पीछे हटते हैं कि गुस्से में ऐसी बात न कह दें जिसका बाद में पछतावा हो। इसलिए सबसे पहले यह देखना जरूरी है कि सामने वाला अपनी जरूरत बता रहा है या बिना बताए गायब हो रहा है।
दरअसल, बिना बताए लंबे समय तक चुप रहना समस्या बनता है, क्योंकि इससे दूसरे व्यक्ति को यह समझ ही नहीं आता कि सामने वाला नाराज है, दुखी है या रिश्ता खत्म करना चाहता है। यही अनिश्चितता बेचैनी, असुरक्षा और अकेलेपन का एहसास बढ़ाती है। मनोवैज्ञानिक रेचल नीडल के मुताबिक चुप्पी का असर सामने वाले पर अस्वीकार किए जाने जैसा हो सकता है। खासकर मैसेज में यह स्थिति और उलझती है, क्योंकि आवाज का उतार-चढ़ाव, चेहरे के भाव और तुरंत मिलने वाले संकेत गायब होते हैं। इससे छोटी बात भी बड़ी गलतफहमी में बदल सकती है और दोनों के बीच दूरी बढ़ सकती है।
यही स्थिति एक-दूसरे के पीछे भागने के चक्र को जन्म देती है। एक व्यक्ति झगड़े को तुरंत सुलझाना चाहता है और बार-बार फोन या मैसेज करता है, जबकि दूसरा तनाव से बचने के लिए और दूर चला जाता है। जितना पहला व्यक्ति जवाब पाने की कोशिश करता है, उतना दूसरा दबाव महसूस कर सकता है। इस तरह दोनों अनजाने में एक ऐसा चक्र बना देते हैं जिसमें बातचीत की जगह दूरी बढ़ती जाती है। इसलिए एक साफ संदेश के बाद लगातार संपर्क करने या बदले में खुद भी चुप हो जाने से बचना चाहिए। इस दौरान टहलना, किसी भरोसेमंद दोस्त से बात करना या अपना ध्यान किसी दूसरे काम में लगाना बेचैनी को संभालने में मदद करता है। वहीं, बात दोबारा शुरू हो तो पुराने विवाद का हिसाब लगाने के बजाय यह समझें कि सामने वाले को उस समय किस चीज की जरूरत थी।
सलाह – सीमा तय करने का मतलब रिश्ता खत्म नहीं… शांति का मौका
एक बार की चुप्पी से पूरे रिश्ते को खराब नहीं माना जा सकता। असली समस्या तब है जब बिना बताए बात बंद करना बार-बार दोहराया जाए और बातचीत के बाद भी व्यवहार न बदले। ऐसे में साफ कहें-‘अगर तुम्हें समय चाहिए तो मैं दूंगा, लेकिन अनिश्चित समय तक बात बंद रहना मेरे लिए ठीक नहीं है।’ सीमा का मतलब रिश्ता खत्म करना नहीं, बल्कि यह स्पष्ट करना है कि दोनों किस तरह संवाद बनाए रखेंगे। स्वस्थ रिश्ते में व्यक्ति को शांत होने की जगह मिलती है, लेकिन दूसरे को अनिश्चितता में छोड़ने की आदत नहीं बनती।

