![]()
कोंडागांव में छत्तीसगढ़ के पारंपरिक कृषि पर्व पोरा तिहार को शासकीय प्राथमिक शाला खुटपारा सोनाबाल के बच्चों ने स्थानीय कला और संस्कृति से जोड़कर मनाया। संकुल सोनाबाल के अंतर्गत खुटपारा की सार्वजनिक हस्तशिल्प कार्यशाला में बेलमेटल (डोकरा) शिल्प निर्माण कार्यशाला आयोजित की गई। इसमें बच्चों ने पारंपरिक शिल्प बनाने की प्रक्रिया को करीब से देखा और उसकी बारीकियों को समझा। कारीगर ने बताई बेलमेटल शिल्प की तकनीक कार्यशाला सुप्रसिद्ध हस्तशिल्पी रामचंद्र नेताम के मार्गदर्शन में आयोजित हुई। इसमें विशाखा नेताम, रमशीला सोड़ी और दिनेश्वरी सोड़ी ने भी सहयोग किया। बच्चों को बेलमेटल शिल्प बनाने में इस्तेमाल होने वाली पारंपरिक तकनीक और निर्माण के अलग-अलग चरणों के बारे में जानकारी दी गई। बच्चों ने उत्साह के साथ कार्यशाला में हिस्सा लिया और कारीगरों से शिल्प निर्माण की प्रक्रिया को समझा। लोककला को पढ़ाई से जोड़ने पर जोर प्रधान अध्यापक हितेंद्र कुमार श्रीवास ने बच्चों को छत्तीसगढ़ की लोककला और पारंपरिक हस्तशिल्प के महत्व के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि स्थानीय कला और संस्कृति को शिक्षा के साथ जोड़ने से बच्चों में अपनी परंपरा और विरासत के प्रति समझ और रुचि विकसित होती है। कृषि और पशुधन से जुड़ा है पोरा तिहार पोरा तिहार छत्तीसगढ़ का पारंपरिक पर्व है, जिसका संबंध मुख्य रूप से कृषि और पशुधन से है। इस अवसर पर ग्रामीण क्षेत्रों में बैलों को सजाया जाता है और कृषि कार्य में उनके योगदान के प्रति आभार व्यक्त किया जाता है। जिन परिवारों के पास पशुधन नहीं होता, वे कई जगहों पर हस्तशिल्प से बनी पशुओं की आकृतियों की पूजा कर पर्व मनाते हैं। नई पीढ़ी को परंपरा और कारीगरों के हुनर से जोड़ने की पहल पोरा तिहार के मौके पर बच्चों को बेलमेटल शिल्प से जोड़ना केवल एक कार्यशाला तक सीमित नहीं रहा। इसके जरिए बच्चों को स्थानीय संस्कृति, कृषि परंपरा और पारंपरिक कारीगरों के हुनर से परिचित कराने का प्रयास किया गया। आयोजकों का मानना है कि इस तरह की गतिविधियों से बच्चों को अपनी सांस्कृतिक विरासत को करीब से जानने और उसे आगे बढ़ाने की प्रेरणा मिलती है।
Source link
पोरा तिहार पर बच्चों ने सीखा डोकरा आर्ट का हुनर:कोंडागांव के खुटपारा में पारंपरिक कला से जुड़ी कार्यशाला, कारीगरों ने समझाई बारीकियां
