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छोटी मुश्किलों को ट्रॉमा बताकर हॉस्टल छोड़ रहे जेन जी:बिना लड़े हार मान रहे कॉलेज स्टूडेंट; तर्क – कॉलेज लाइफ नहीं, डिग्री अहम




सतरंगी सूटकेसों में बंद उम्मीदें, नई जिंदगी की शुरुआत और आंखों में बड़े सपने लेकर लास वेगास की दाइयाना फ्लेमिंग (17) लुइसियाना सदर्न यूनिवर्सिटी पहुंची थीं। उन्होंने हॉस्टल का कमरा सजाया, पढ़ाई का सामान व्यवस्थित किया और खाली वक्त में मेकअप आर्टिस्ट के रूप में काम शुरू करने की योजना बनाई। सब कुछ सामान्य छात्र जीवन की उत्साहभरी शुरुआत जैसा लग रहा था। पर महज 14 दिन बाद हालात पूरी तरह बदल गए। उनका हॉस्टल कमरा खाली था और दाइयाना घर लौटने वाली फ्लाइट में बैठी थीं। दाइयाना अकेली नहीं हैं, अमेरिकी विश्वविद्यालयों में ऐसे दर्जनों छात्र हैं जो पहला सेमेस्टर शुरू होने के दो से तीन हफ्तों के भीतर सामान समेटकर घर लौट रहे हैं। कॉलेज के शुरुआती दिनों में ही इस अजीबोगरीब विदाई पर बहस छिड़ गई है। दाइयाना ने यह फैसला अचानक नहीं लिया था। कैंपस में पैदल चलने से उनकी सेहत से जुड़ी पुरानी समस्याएं बढ़ने लगीं। पार्ट-टाइम नौकरी तक आने-जाने में भी उन्हें सुरक्षा की चिंता सताती थी। दोस्तों के साथ पार्टी में जाने के बाद उन्हें लगा कि यह जीवनशैली उनके लिए नहीं है। उसी रात उन्होंने मां को मैसेज भेजा,‘मैं घर लौट रही हूं।’ हॉस्टल छोड़ते हुए कहा,‘मैं मुझे तथाकथित ‘कॉलेज लाइफ’ से नहीं, डिग्री से मतलब है।’ संघर्ष से भागने की कमजोर मानसिकता – एक्सपर्ट छात्र व्यवहार विशेषज्ञ डॉ. माइकल विलियम्स कहते हैं,‘यह ट्रेंड नई पीढ़ी में जुझारूपन व मेहनत करने के माद्दे की भारी कमी को उजागर करता है। किसी भी नए माहौल में शुरुआती दिन कठिन होते ही हैं, पर जेन जी बिना लड़े ही हार मान रहे हैं। हॉस्टल की छोटी-मोटी दिक्कतों और पढ़ाई के बोझ को ‘मानसिक आघात’ का नाम देकर घर लौट जाना असल में संघर्ष से भागने की कमजोर मानसिकता है। यह पीढ़ी कम्फर्ट जोन से बाहर कदम रखने की इच्छाशक्ति खो चुकी है। एक अन्य छात्रा की मां एबोनी सिम्पसन कहती हैं,‘हर मूल्यवान चीज आसानी से नहीं मिलती। छात्रों को खुद पहल करके मेलजोल बढ़ाना पड़ता है।’ दैनिक भास्कर से विशेष अनुबंध के तहत खाली पड़े हॉस्टल रूम।



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