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क्या बिना पशुओं की संख्या बढ़े दूध की नदियां बह सकती हैं? सरकारी आंकड़े तो कुछ ऐसा ही चमत्कार दिखा रहे हैं। मध्य प्रदेश के पशुपालन एवं डेयरी विभाग के रिकॉर्ड बताते हैं कि पिछले पांच सालों में प्रदेश में एक भी दुधारू गाय या भैंस नहीं बढ़ी। लेकिन कागजों पर राज्य का दूध उत्पादन 179.99 लाख मीट्रिक टन से छलांग लगाकर 213.26 लाख मीट्रिक टन पर पहुंच गया। यानी 33.27 लाख मीट्रिक टन अतिरिक्त दूध कहां से आया? इस कागजी चमत्कार के दम पर मध्यप्रदेश 9.12% दुग्ध उत्पादन के साथ देश में तीसरे नंबर पर आ गया है। लेकिन जमीन पर सवाल बड़ा है। यह 33.27 लाख मीट्रिक टन अतिरिक्त दूध असली गाय-भैंसों का है? या फिर हमारे घरों में सिंथेटिक और मिलावटी दूध का जहर घोला जा रहा है? महंगाई की मार, 70% डेयरियां बंद, बढ़ने के बजाय घट गए जानवर सरकारी दावे एक तरफ और जमीन पर पशुपालकों का दर्द एक तरफ। विदिशा की स्वर्णकार कॉलोनी के डेयरी संचालकों की आपबीती बताती है कि जमीनी हकीकत सरकारी दावों के बिल्कुल उलट है।
चंद्रमोहन यादव: 5 साल पहले मेरी डेयरी में 45 भैंसें और 30 गायें थीं, जिससे 350 लीटर दूध होता था। आज खली-चूनी 40 रुपये और भूसा 10 रुपये किलो है। महंगाई के कारण अब सिर्फ 3 भैंसें और 10 गायें बची हैं। जब जानवर ही घट रहे हैं, तो दूध कहां से बढ़ेगा?
महेश यादव: पिछले 5 सालों में विदिशा की 70% दूध डेयरियां बंद हो चुकी हैं। रूप सिंह, गोरेलाल और लल्लुलाल जैसे बड़े डेयरी मालिकों ने काम बंद कर दिया। इस इलाके में पहले 500 से ज्यादा भैंसें थीं, अब 100 भी नहीं बचीं।
राजा यादव और महेंद्र यादव: कांग्रेस नेता राजा यादव बताते हैं कि उनके पिता रमेश यादव के समय 18 भैंसें थीं, आज सिर्फ 2 बची हैं। वहीं महेंद्र यादव के पास भी 10 भैंसों और 5 गायों का कुनबा घटकर मात्र 2 भैंस और 2 गाय पर सिमट गया है। आंकड़ों का खेल: 5 साल से फ्रीज है पशुओं की संख्या विभाग के मुताबिक, साल 2020-21 में प्रदेश में जितने दुधारू पशु थे, साल 2024-25 तक उनमें एक भी अंक का बदलाव नहीं हुआ। हर साल बजट और टारगेट तय करने के लिए अफसर आंख मूंदकर एक ही पुरानी पशुगणना (2019) का डेटा कॉपी-पेस्ट कर रहे हैं। मिलावट का गणित: मांग बढ़ते ही बाजार में यूं घुलता है ‘सफेद ज़हर’ कारोबारी का बड़ा खुलासा: चंबल अंचल में नकली दूध के कारोबार से जुड़े एक व्यक्ति ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि शैंपू, डिटर्जेंट पाउडर, रिफाइंड तेल, यूरिया और ग्लूकोज पाउडर के घोल से नकली दूध तैयार किया जाता है। त्योहारों या अधिक मांग के समय इसकी खपत अचानक बढ़ा दी जाती है।
सप्लाई का पैटर्न: 50% जहर + 50% असली दूध ऐसे बनता है मिश्रण: सबसे पहले 100 लीटर नकली (रसायनों का) दूध तैयार किया जाता है। मिक्सिंग का खेल: इस 100 लीटर नकली दूध में 100 लीटर असली दूध मिलाया जाता है, जिससे जांच में पकड़ना मुश्किल हो जाए। सप्लाई नेटवर्क: यह मिश्रण तैयार होते ही गांव-गांव और शहरों तक पहुंचने वाले वाहनों के जरिए बाजार में सप्लाई कर दिया जाता है। विभाग का दावा- नस्ल सुधर से उत्पादन बढ़ा विभाग का दावा है कि नस्ल सुधार से प्रति पशु उत्पादन बढ़ा है। लेकिन यदि औसतन 1 लीटर प्रति पशु की बढ़ोतरी मान भी ली जाए, तब भी यह गणित 33.27 लाख मीट्रिक टन की भारी बढ़ोतरी को पूरी तरह स्पष्ट नहीं करता। खासकर तब जब महंगाई के चलते 50% डेयरियां बंद हुई हैं और पशुओं की संख्या घटी है। ऐसे में सवाल यही है कि आंकड़ों और मांग के बीच का यह अंतर क्या मिलावटी दूध से पूरा हो रहा है?
नस्ल सुधार से दुग्ध उत्पादन बढ़ा पशुपान विभाग के अतिरिक्त उपसंचालक डॉ. संजय भारती ने बताया- नस्ल सुधार के कारण प्रति पशु दुग्ध उत्पादन बढ़ा है। साहीवाल, गिर, जर्सी और एचएफ गायों के साथ मुर्रा भैंसों की नस्ल सुधार से उत्पादन में वृद्धि हुई है। उन्होंने बताया- वर्तमान में गायों से औसतन 3.30 लीटर और भैंसों से 4.30 लीटर दूध प्रतिदिन मिल रहा है। सिंथेटिक दूध को लेकर विभाग को अब तक कोई शिकायत नहीं मिली है। भास्कर ने 8 जगह कराई दूध की टेस्टिंग, 5 जगह मिलावट मिली
ग्वालियर चंबल अंचल में नकली और मिलावटी दूध की हकीकत जानने के लिए दैनिक भास्कर ने खाद्य सुरक्षा विभाग की टीम के साथ भिंड में सैंपलिंग कराई। खाद्य सुरक्षा अधिकारी की टीम ने रैपिड किट से पांच जगह दूध की जांच की। जांच के दौरान चार जगह के दूध में मिलावट मिली। इसके बाद खाद्य सुरक्षा अधिकारी की टीम ने चारों स्थान पर दूध को संदिग्ध मानते हुए सैंपल लिए हैं, जो अब जांच के लिए भोपाल स्थित लैब भेजे जाएंगे। वहीं भास्कर ने पोरसा, गोरमी और गोहद से दूध लेकर ग्वालियर में प्राइवेट लैब में टेस्टिंग कराई। रिपोर्ट में पोरसा से लिए दूध में रिफाइंड ऑयल की पुष्टि हुई है। इससे साफ है कि मिलावटी दूध का गोरखधंधा जारी है, जो डिमांड बढ़ने पर और ज्यादा बढ़ जाता है।
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