मध्यप्रदेश में सीधी भर्ती से नियुक्त तृतीय और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को प्रोबेशन पीरियड में 70%, 80% और 90% वेतन देने की व्यवस्था को लेकर राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
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हाईकोर्ट की डबल बेंच ने 8 सितंबर को इस व्यवस्था को रद्द करते हुए कर्मचारियों को नियुक्ति की तारीख से 100% वेतन देने का आदेश दिया था।
राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने की मांग की है। सरकार ने इसके लिए 13 प्रमुख आधार बताए हैं।
उसका कहना है कि 2019 से अब तक प्रोबेशन पर रहे कर्मचारियों को 100% वेतन के हिसाब से अंतर की राशि एक साथ देने पर राज्य के खजाने पर बड़ा अतिरिक्त भार पड़ेगा।
सरकार का तर्क- एरियर देने से बजट पर पड़ेगा असर
सरकार के मुताबिक पुराने कर्मचारियों के एरियर के भुगतान के साथ बढ़े हुए वेतन का असर भविष्य की भर्तियों के बजट प्रबंधन पर भी पड़ सकता है। याचिका में पुलिस, पटवारी और शिक्षक भर्ती जैसी बड़ी नियुक्तियों का उल्लेख किया गया है। राज्य का कहना है कि पुराने एरियर के भुगतान और नई भर्तियों के वित्तीय प्रबंधन का असर पूंजीगत कार्यों और जनकल्याणकारी योजनाओं के बजट पर भी पड़ सकता है।

अनुच्छेद 309 का हवाला- सेवा शर्तें तय करने का अधिकार
राज्य सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 309 का हवाला देते हुए कहा है कि सरकारी कर्मचारियों की नियुक्ति और सेवा शर्तों से जुड़े नियम बनाने का अधिकार राज्य सरकार के पास है।
सरकार के मुताबिक 70-80-90% वेतन की व्यवस्था मनमाने तरीके से लागू नहीं की गई थी। इसे वित्त विभाग और सामान्य प्रशासन विभाग में प्रक्रिया, परीक्षण और विचार-विमर्श के बाद सक्षम स्तर की मंजूरी से लागू किया गया था।

प्रोबेशन को प्रशिक्षण और दक्षता के आकलन से जोड़ा सरकार ने 1966 के सेवा नियमों और वित्तीय नियमों का हवाला देते हुए कहा है कि नियुक्ति के शुरुआती समय में कर्मचारियों को प्रशिक्षण और दक्षता के आकलन से गुजरना होता है।
इसी आधार पर चरणबद्ध भुगतान की व्यवस्था की गई थी। राज्य ने यह भी तर्क दिया है कि सेवा शर्तों से जुड़े नीतिगत फैसलों में न्यायिक हस्तक्षेप का दायरा सीमित होना चाहिए, जब तक कोई स्पष्ट कानूनी उल्लंघन न हो।

दूसरे राज्यों की व्यवस्था का भी दिया उदाहरण
सरकार ने छत्तीसगढ़ समेत कुछ राज्यों में प्रोबेशन के दौरान स्टाइपेंड या कम वेतन की व्यवस्था का उल्लेख किया है। हालांकि छत्तीसगढ़ ने 2023 में यह व्यवस्था समाप्त कर 100% वेतन लागू कर दिया था, लेकिन पुराने समय का एरियर नहीं दिया गया।

हाई कोर्ट ने दो बार कर्मचारियों के पक्ष में दिया फैसला
प्रोबेशन के दौरान कम वेतन देने का मामला पहले भी हाई कोर्ट में कर्मचारियों के पक्ष में जा चुका है। 6 जनवरी 2026 को हाई कोर्ट ने सीधी भर्ती से नियुक्त कर्मचारियों को नियुक्ति की तारीख से पूरा वेतन देने और बकाया राशि का 6% सालाना ब्याज के साथ भुगतान करने का आदेश दिया था।
इसके बाद 9 सितंबर को डबल बेंच ने 12 दिसंबर 2019 से लागू 70-80-90% वेतन व्यवस्था को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने नियुक्ति की तारीख से कर्मचारियों को 100% वेतन देने का निर्देश दिया।
अब राज्य सरकार ने इसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। मामले में अगली सुनवाई की तारीख अभी तय नहीं हुई है।

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जबलपुर हाईकोर्ट ने प्रोबेशन पीरियड में कर्मचारियों को 70%, 80% और 90% न्यूनतम वेतनमान देने की व्यवस्था निरस्त कर दी है। इससे मध्य प्रदेश के हजारों सरकारी कर्मचारियों को राहत मिली है। कोर्ट ने कहा- जब कर्मचारी से पद के अनुरूप पूरा काम लिया जा रहा है, तो केवल प्रोबेशन पर होने के आधार पर उसे कम वेतन नहीं दिया जा सकता।पूरी खबर पढ़ें
