Virtual Autism Vs Screen Time; Bhopal DEIC Therapist Staff Shortage Exposed


बच्चा रोया, तो मोबाइल दे दिया। खाना नहीं खा रहा, तो वीडियो चला दिया। माता-पिता व्यस्त हुए तो बच्चे को फोन थमा दिया। कोविड के दौरान और बाद में ऐसा लाखों घरों में होता रहा। अब कुछ परिवार उन्हीं बच्चों को लेकर थेरेपी सेंटर में उनकी बारी का इंतजार कर रहे

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बच्चों में देर से बोलने, कम आई कॉन्टैक्ट, मेलजोल नहीं रखने, हाइपर एक्टिव होने जैसी दिक्कतें सामने आ रही हैं। डॉक्टर और थेरेपिस्ट इन्हें ‘वर्चुअल ऑटिज्म’ कह रहे हैं, यानी ज्यादा स्क्रीन टाइम की वजह से बच्चों में ऑटिज्म से जुड़े लक्षण दिख रहे हैं।

7 राज्यों में पड़ताल, हर जगह लगभग एक जैसी तस्वीर..

हमने जानने की कोशिश की कि सरकारी अस्पतालों में वर्चुअल ऑटिज्म के इलाज की क्या व्यवस्था है। पता चला, ऑटिज्म के ट्रीटमेंट के लिए बनाए गए डिस्ट्रिक्ट अर्ली इंटरवेंशन सेंटर, यानी DEIC में ही बच्चों की शुरुआती जांच, असेसमेंट और थेरेपी होती है।

स्वास्थ्य मंत्रालय के 2025 के आंकड़ों के मुताबिक, देश में 451 DEIC हैं। इन सेंटरों में 32 हेल्थ कंडीशन की थेरेपी होती है। इसमें वर्चुअल ऑटिज्म शामिल नहीं है।

दैनिक भास्कर की टीम ने दिल्ली के अलावा छह राज्यों की राजधानियों में पड़ताल की। सबसे पहले मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के DEIC पहुंचे। यहां थेरेपी से जुड़े ज्यादातर कमरों में ताले लगे हैं क्योंकि स्टाफ की नियुक्ति ही नहीं हुई।

उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र की राजधानियों में भी तस्वीर कुछ अलग नहीं है। राजस्थान में तो DEIC कागजों में मौजूद है, लेकिन जमीन पर नहीं। बिहार में DEIC दो कमरों में चल रहा है। देश की राजधानी दिल्ली के DEIC में भी थेरेपिस्ट की कमी है। सिलसिलेवार पढ़िए, राज्यों की राजधानियों से पड़ताल…

शुरुआत मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से… भोपाल के शासकीय जयप्रकाश जिला चिकित्सालय में बने DEIC में 2026 में अप्रैल से अगस्त के बीच ऑटिज्म पीड़ित 31 बच्चे आए, लेकिन सिर्फ एक केस वर्चुअल ऑटिज्म का माना गया। सेंटर में इसकी पहचान का अलग असेसमेंट टूल भी नहीं है। सवाल है कि फिर केस डायग्नोस कैसे हुआ।

सेंटर में ऑक्युपेशनल थेरेपिस्ट, स्पेशल एजुकेटर, पीडियाट्रिक और ऑप्थैल्मिक असिस्टेंट का पद एक साल से खाली है। थेरेपिस्ट न होने से सेंसर इंटीग्रेशन एरिया में ताला लगा है। ये एरिया खास तरह से डिजाइन किया थेरेपी स्पेस होता है।

सेंटर के मैनेजर उज्जवल सिंह के मुताबिक, खाली पदों की जानकारी राज्य सरकार को दी गई है, लेकिन पिछले एक साल में कोई नियुक्ति नहीं हुई।

भोपाल के सरकारी जयप्रकाश जिला अस्पताल में बने DEIC सेंटर के कमरों में ताला लगा हुआ है।

भोपाल के सरकारी जयप्रकाश जिला अस्पताल में बने DEIC सेंटर के कमरों में ताला लगा हुआ है।

जिस समस्या की गिनती ही नहींं, उसके लिए पॉलिसी-गाइडलाइन कैसे बनेगी

उज्जवल सिंह बताते हैं, ‘हमारे पास ऑटिज्म और वर्चुअल ऑटिज्म को अलग करने का टूल नहीं है। इसके लिए स्पष्ट गाइडलाइन की जरूरत है।’

वर्चुअल ऑटिज्म और ऑटिज्म के लक्षण मिलते-जुलते हैं। दोनो के असेसमेंट का टूल भी एक ही है। ऐसे में वर्चुअल ऑटिज्म के बच्चों को भी ऑटिज्म के मामलों में गिना जा रहा है। ये चिंता की बात है, क्योंकि एक्सपर्ट मानते हैँ कि वर्चुअल ऑटिज्म ठीक होने की संभावना होती है, जबकि ऑटिज्म कभी पूरी तरह ठीक नहीं होता।

बढ़ते केस और स्टाफ कम होने से थेरेपी में देरी

DEIC की साइकोलॉजिस्ट डॉ. नीम्रता दुबे बताती हैं, ‘ओपीडी और फॉलोअप के ज्यादा मामले और कम स्टाफ की वजह से बच्चे को हफ्ते में कई बार बुलाना मुमकिन नहीं होता। इसलिए 15 दिन या एक महीने बाद फॉलोअप होता है। अगर सारा स्टाफ हो और बच्चे को समय पर सही थेरेपी मिल जाए, तो उनमें जल्दी सुधार हो सकता है।’

लॉकडाउन के बाद हर महीने 30-40 नए केस

सरकारी सेंटर के बाद हमने प्राइवेट डायग्नोस और थेरेपी सेंटर के काम का तरीका समझा। इसके लिए भोपाल के RAVI सेंटर पहुंचे। ये सेंटर तृप्ति मंगल चलाती हैं। वे 15 साल से ऑटिज्म पर काम कर रही हैं। उनकी बेटी भी ऑटिस्टिक है।

तृप्ति बताती हैं, ‘लॉकडाउन से पहले वर्चुअल ऑटिज्म के सालभर में 8 से 15 नए केस मिलते थे। लॉकडाउन के बाद हर महीने 30-40 केस आने लगे। कुछ मामले बेहद गंभीर भी रहे। कुछ बच्चे खुद को मारने, नोंचने या काटने के साथ दूसरों को नुकसान पहुंचाने लगे थे। एक बच्चे ने फोन छीने जाने पर थेरेपिस्ट का ही सिर फोड़ दिया।’

भोपाल के रहने वाले हारिश वर्चुअल ऑटिज्म से पीड़ित हैं और उनकी थेरेपी चल रही है। वो एक ही बात कई बार दोहराते हैं।

भोपाल के रहने वाले हारिश वर्चुअल ऑटिज्म से पीड़ित हैं और उनकी थेरेपी चल रही है। वो एक ही बात कई बार दोहराते हैं।

इसी सेंटर पर 8 साल की मायरा मिली। जन्म के अगले दिन मां की मौत हो गई थी। बुआ ने परवरिश की। मायरा रोती, तो उसे मोबाइल दे दिया जाता। वह चुप हो जाती। दो साल की होने तक कुछ नहीं बोलती थी। 6 साल की उम्र में उसकी थेरेपी शुरू कराई गई। जिस मोबाइल ने कभी मायरा को चुप कराया था, आज उसी से दूर करना परिवार के लिए सबसे मुश्किल काम है।

ऐसी ही कहानी सोना की है। उसकी मां बताती हैं, ‘वो 2 साल तक बिल्कुल ठीक थी। हम जो शब्द सिखाते, बोलती थी। फिर उसे फोन देखना अच्छा लगने लगा। उसे कोई रोकता भी नहीं था। 2 साल 7 महीने की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते सोना ने बोलना बंद कर दिया। 3 साल की हुई, तब उसे डॉक्टर के पास ले गए। अब रोज थेरेपी के लिए सेंटर आती हैं। अभी वो फोन से सीखे हुए कुछ शब्द ही दोहराती है।

राजस्थान: राजधानी जयपुर में DEIC कागजों में, जमीन पर नामोनिशान नहीं

स्वास्थ्य विभाग के रिकॉर्ड में जेके लोन अस्पताल में DEIC है। हम इसकी पड़ताल के लिए वहां पहुंचे तो पता चला कि यहां सेंटर चल ही नहीं रहा। अस्पताल प्रशासन के मुताबिक, सरकार से DEIC शुरू करने का लेटर मिला है।

जेके लोन हॉस्पिटल देश का सबसे बड़ा सरकारी बाल चिकित्सा अस्पताल माना जाता है। यहां 900 से ज्यादा बेड हैं। राजस्थान समेत आसपास के बच्चे गंभीर बीमारी होने पर यहीं रेफर किए जाते हैं।

जेके लोन हॉस्पिटल देश का सबसे बड़ा सरकारी बाल चिकित्सा अस्पताल माना जाता है। यहां 900 से ज्यादा बेड हैं। राजस्थान समेत आसपास के बच्चे गंभीर बीमारी होने पर यहीं रेफर किए जाते हैं।

रिप्रोडक्टिव एंड चाइल्ड हेल्थ की डायरेक्टर डॉ. मधु रितेश्वर बताती हैं कि राजस्थान में करीब 23 जगह DEIC को किसी न किसी रूप में फंक्शनल करने की कोशिश चल रही है। करीब 8 जगह बिल्डिंग तैयार हैं और हैंडओवर की प्रक्रिया बाकी है।

अस्पताल में ऑटिज्म पर काम कर रहीं ऑडियोलॉजिस्ट-स्पीच थेरेपिस्ट ट्विंकल कहती हैं, ‘हमारे पास पूरे राजस्थान से वर्चुअल ऑटिज्म के बहुत से बच्चे आते हैं। बच्चों की सबसे पहले ऑक्युपेशनल थेरेपी होती है, ताकि उनकी हाइपर एक्टिवनेस कम हो।’

DEIC में पूरे राजस्थान से बच्चे इलाज के लिए आते हैं, लेकिन यहां ऑक्युपेशनल थेरेपिस्ट समेत लगभग सभी पद खाली है। सिर्फ ऑडियोलॉजिस्ट ट्विन और फिजियोथेरेपिस्ट की नियुक्ति करीब तीन महीने पहले हुई है।

DEIC में पूरे राजस्थान से बच्चे इलाज के लिए आते हैं, लेकिन यहां ऑक्युपेशनल थेरेपिस्ट समेत लगभग सभी पद खाली है। सिर्फ ऑडियोलॉजिस्ट ट्विन और फिजियोथेरेपिस्ट की नियुक्ति करीब तीन महीने पहले हुई है।

बिहार: दो कमरों में चल रहा सेंटर, न जगह, न सुविधाएं

पटना के गुरु गोविंद सिंह अस्पताल में दो कमरों में DEIC है, यानी पर्याप्त जगह और जरूरी सुविधाएं हीं नहीं हैं। सेंटर के मैनेजर डॉ. रविशंकर सिन्हा कहते हैं कि यहां 2024 से ऑक्युपेशनल थेरेपिस्ट और स्पेशल एजुकेटर की नियुक्ति नहीं हुई। हमारे पास थेरेपी के लिए सबसे जरूरी चीजें ही नहीं हैं। सेंसरी गार्डन और ऑडियोलॉजी रूम नहीं होने से थेरेपी नहीं हो पा रही है। हमने इस बारे में विभाग को बताया है।

पटना में ही नालंदा मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में DEIC के लिए जगह बनाई गई थी, लेकिन यहां फिलहाल कैंसर के मरीजों का इलाज होता है।

उत्तरप्रदेश: लखनऊ DEIC में हर रोज 5-10 केस

ये सेंटर किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) में है। मैनेजर गौरव सक्सेना के मुताबिक, यहां सात स्टाफ हैं और ज्यादातर जरूरी सेवाएं मिल रही हैं। साइकोलॉजिस्ट डॉ. अमित आर्य के मुताबिक, चाइल्ड OPD में रोजाना 70 से 80 बच्चे आते हैं। इनमें करीब 20 बच्चों में ऑटिज्म के लक्षण दिखाई देते हैं, जिनमें 5 से 10 मामलों में वर्चुअल ऑटिज्म के लक्षण होते हैं।

KGMU में बने DEIC में बच्चों से फिजिकल एक्टिविटी कराई जाती हैं। पेरेमेंट की भी काउंसलिंग की जाती है, ताकि वे घर पर बच्चों से अभ्यास करा सकें।

KGMU में बने DEIC में बच्चों से फिजिकल एक्टिविटी कराई जाती हैं। पेरेमेंट की भी काउंसलिंग की जाती है, ताकि वे घर पर बच्चों से अभ्यास करा सकें।

गुजरात: गांधीनगर DEIC में 2 साल से वर्चुअल ऑटिज्म के केस बढ़े

गांधीनगर के DEIC में 8 साल की बच्ची मिली। उसके पिता तुषार भारतीय हैं और मां यूक्रेन की हैं। तुषार बताते है कि बेटी 2019 में पैदा हुई थी। तब कोरोना चल रहा था। लॉकडाउन में हम बाहर नहीं जा पा रहे थे। बेटी घर पर बैठे-बैठे मोबाइल देखती थी। इससे उसमें वर्चुअल ऑटिज्म की समस्या बढ़ी।

यहां की मैनेजर डॉ. पूजा पटेल के मुताबिक, सेंटर में सभी जरूरी स्टाफ हैं। वहीं, साइकोलॉजिस्ट शिखा शुक्ला बताती हैं कि बीते 2 साल से बहुत ज्यादा वर्चुअल ऑटिज्म के पेशेंट आए हैं। हमने पेरेंट्स को साइको-एजुकेट किया है कि अगर हम अर्ली इंटरवेंशन स्टार्ट कर दें, तो बच्चे के बिहेवियर में काफी हद तक सुधार हो सकता है।

GMERS मेडिकल कॉलेज एंड जनरल (सिविल) हॉस्पिटल में बने DEIC में 50 से 100 बच्चों के रोज सेशन कराने की व्यवस्था है।

GMERS मेडिकल कॉलेज एंड जनरल (सिविल) हॉस्पिटल में बने DEIC में 50 से 100 बच्चों के रोज सेशन कराने की व्यवस्था है।

दिल्ली: कोविड के बाद वर्चुअल ऑटिज्म के केस 40 से 50% बढ़े

दिल्ली में कुल तीन DEIC हैं। इनमें से एक गुरु गोविंद सिंह गवर्नमेंट हॉस्पिटल में है। मैनेजर डॉ. अनिता पंडित हैं। DEIC में सोशल वर्कर ट्विंकल के मुताबिक, कोविड के बाद वर्चुअल ऑटिज्म के केस 40 से 50% बढ़े हैं। रोजाना 6 से 7 ऐसे बच्चे आते हैं। माता-पिता अक्सर सोचते हैं कि बच्चा बाद में बोलने लगेगा, लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता।

DEIC में फिलहाल 7 कर्मचारी हैं। जरूरत 10 लोगों की है। ट्विंकल के मुताबिक, स्पीच थेरेपिस्ट, स्पेशल एजुकेटर, पीडियाट्रिक की कमी है।

महाराष्ट्र: मुंबई में DEIC नहीं, BMC का अर्ली इंटरवेंशन सेंटर

मुंबई शहर में डिस्ट्रिक्ट अर्ली इंटरवेंशन सेंटर नहीं है, लेकिन BMC की तरफ से मुंबई के नायर अस्पताल में अर्ली इंटरवेंशन सेंटर चल रहा है। इसके अलावा साउथ मुंबई के नागपाड़ा में अर्ली इंटरवेंशन एंड रिहैबिलिटेशन सेंटर फॉर चिल्ड्रन है। इसकी प्रमुख डॉ. सुरभि राठी ने बताया कि सेंटर में रोज करीब 120 बच्चे आते हैं।

वे आगे बताती हैं, ‘वर्चुअल ऑटिज्म नया कॉन्सेप्ट है, इसलिए अभी इसके मामले कम दर्ज होते हैं। 10 में से एक बच्चा वर्चुअल ऑटिज्म से जुड़ा हो सकता है। इसकी अलग से रिकॉर्डिंग अभी नहीं होती, लेकिन आगे अलग रिकॉर्ड रखने की योजना है।’

छोटे बच्चों के स्क्रीन टाइम पर 31 देशों की गाइडलाइन

इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स की गाइडलाइन के मुताबिक, दो साल तक बच्चों को स्क्रीन से दूर रखना चाहिए। भारत समेत 31 देशों में बच्चों का स्क्रीन टाइम सीमित करने की गाइडलाइन है।

उम्मीद चाइल्ड डेवपलमेंट सेंटर्स, भोपाल के डायरेक्टर डॉ. जफर मीनाई कहते है, पेरेंट्स शुरुआती पहचान के लिए चार बातों पर नजर रखें।

1. क्या बोलना शुरू करने के 3-4 महीने बाद ही बच्चे ने बोलना बंद कर दिया? 2. बच्चा बोलने की बजाय इशारों में कम्युनिकेशन कर रहा है? 3. वह अपनी ही दुनिया में खोया रहता है? 4. 18 महीने के बाद रुको, बैठो, मत करो जैसे आसान निर्देश समझता है?

मेदांता मेडिसिटी की डायरेक्टर डॉ. नीलम मोहन इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स की प्रेसिडेंट है। सालों से वर्चुअल ऑटिज्म पर काम कर रही हैं। उनका मानना है कि जागरूकता को लेकर पॉलिसी बननी चाहिए। वे नीति आयोग की बैठकों में इसके संबंध में बात करेंगी।

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स्टोरी में सहयोग: यूपी से विकास श्रीवास्तव, राजस्थान से सौरव, बिहार से रणजीत, दिल्ली से राजीव नयन चतुर्वेदी, गुजरात से दीपक, महाराष्ट्र से संतोष गायकवाड़



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