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हम समझते हैं कि किसी भी छात्र के लिए आईआईटी में दाखिला पाना बड़ी उपलब्धि होती है। इसीलिए ऐसे छात्रों को खुश होना चाहिए। या कम-से-कम दु:खी तो नहीं ही होना चाहिए। और अपनी जान लेने का तो सवाल ही नहीं उठता। फिर भी, पिछले ही सप्ताह आईआईटी बॉम्बे के एक और मेधावी छात्र ने आत्महत्या कर ली। वह ऐसा करने वाला पहला छात्र नहीं था। इस साल के पहले सात महीनों में आईआईटी बॉम्बे के तीन छात्रों ने आत्महत्या की है। आरटीआई के आधार पर की गई रिपोर्टिंग से पता चला कि 2025 में पूरे आईआईटी सिस्टम में 15 छात्रों ने आत्महत्या की थी, जबकि 2021 से 2025 के बीच ऐसा कदम उठाने वाले छात्रों की संख्या 65 थी। आईआईटी बॉम्बे ने शुरुआत में कहा था कि छात्र को परीक्षा के दौरान फोन का इस्तेमाल करते हुए पाया गया था और उसने प्रश्नपत्र को एक एआई प्लेटफॉर्म पर अपलोड किया था। इसके कुछ ही घंटे बाद उसका शव उसके कमरे में पंखे से लटका मिला। बाद में छात्र के परिवार ने जाति-आधारित उत्पीड़न का आरोप भी लगाया। जांच पूरी होने के बाद मामले से जुड़े तथ्य सामने आएंगे, लेकिन यह घटना समाज में मौजूद कई व्यापक मुद्दों को सामने लाती है। इनमें जीवन में कुछ कर दिखाने का अत्यधिक दबाव, परीक्षाओं में नकल को लेकर हमारा नजरिया, शिक्षा पर एआई का प्रभाव और मानसिक स्वास्थ्य सभी शामिल हैं। आईआईटी में दाखिला पाने वाला लगभग हर छात्र अपने शहर या इलाके का स्टार होता है। स्कूल में टॉपर रहे ऐसे छात्रों को पड़ोसियों, दोस्तों और रिश्तेदारों के बीच खूब सम्मान मिलता है। लेकिन आईआईटी पहुंचने के बाद वे ऐसे लोगों से भरी कक्षा में होते हैं, जो बिल्कुल उन्हीं जैसे हैं। जब पूरी कक्षा टॉपरों से भरी हो, तो हर कोई टॉपर नहीं हो सकता। बहुतों को बीच में रहना ही होगा। किसी न किसी को सबसे नीचे भी आना होगा। जिस व्यक्ति की पूरी पहचान ही एक मेधावी और शीर्ष प्रदर्शन करने वाले छात्र के रूप में बनी हो, उसके लिए कक्षा में महज औसत छात्र बन जाने की नई वास्तविकता बेहद आघातकारी हो सकती है। शायद यही वजह है कि कुछ छात्र नकल जैसे अनैतिक तरीकों का सहारा लेने लगते हैं। अमेरिका के कई शीर्ष कॉलेजों में नकल को बेहद गंभीरता से लिया जाता है। अकसर इस पर कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई होती है। लेकिन भारत में हम अब भी इस बात को लेकर स्पष्ट नहीं हैं कि परीक्षा में नकल करते पकड़े गए किसी छात्र के साथ क्या किया जाना चाहिए। जिस समाज में भ्रष्टाचार व्यापक है, जहां ‘टेबल के नीचे’ की कमाई को उपलब्धि की तरह दिखाया जाता है, वहां हम यह तय नहीं कर पाए हैं कि नकल को किस नजर से देखा जाए। भारतीय कॉलेजों में नकल आम है और अकसर इसे नजरअंदाज कर दिया जाता है। एआई ने तो इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। हमें नए सिरे से सोचना होगा कि हम परीक्षाएं किस तरह आयोजित करें, ताकि एआई के जरिए नकल करना संभव न हो। आईआईटी में हो रही आत्महत्याएं हमें कुछ बताती हैं। भौतिकी और गणित की समस्याएं हल करने के लिए अच्छी बौद्धिक क्षमता होना एक बात है और मानसिक स्वास्थ्य होना दूसरी बात। शायद इतने सारे आईआईटीयन्स मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से इसलिए जूझते हैं क्योंकि अपने शुरुआती शैक्षणिक वर्षों से ही उन्हें बेहद तीव्र प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा है। अगर आपको कोई व्यक्ति मानसिक रूप से संघर्ष करता हुआ नजर आए, तो उसे नजरअंदाज न करें। उससे बात करें, बिना किसी जजमेंट के उसकी बात सुनें और जरूरत पड़ने पर उसे पेशेवर मदद के लिए प्रोत्साहित करें। कौन जाने, ऐसा करके आप किसी की जान बचा रहे हों।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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चेतन भगत का कॉलम:आईआईटी में आत्महत्या की घटनाएं हमें क्या बताती हैं?
