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भास्कर संवाददाता| सीहोर सामाजिक न्याय एवं दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग तथा संकल्प वृद्धाश्रम के तत्वावधान में सैकड़ाखेड़ी स्थित संकल्प वृद्धाश्रम में चल रहे सात दिवसीय ‘संकल्प पीढ़ी संवाद-अनुभव से भविष्य की ओर’ कार्यक्रम में आध्यात्मिक चिंतन और संस्कारों पर संवाद हुआ। संत पं. दुर्गा प्रसाद कटारे बाबा ने कहा कि संत ज्ञान का भंडार होते हैं और साधक के जीवन में प्रकाश व ऊर्जा का संचार करते हैं। भगवान का ज्ञान कराने वाले माता-पिता और गुरु होते हैं। मानव का शरीर अमूल्य है, इसलिए इसे नशे जैसी बुराइयों में नष्ट नहीं करना चाहिए। संस्कार व्यक्ति को सही दिशा देते हैं और परिवार व समाज के प्रति दायित्वों का बोध कराते हैं। उन्होंने कहा कि प्रेम बुद्धि और तर्क से परे होता है। जीवन में प्रेम, संस्कार और सेवा का भाव व्यक्ति को भीतर से समृद्ध बनाता है। उन्होंने कहा कि भगवान शिव का वर्णन शब्दों में संभव नहीं है। वे भोलेनाथ के रूप में पूजे जाते हैं तो महाकाल के स्वरूप में भी आराध्य हैं। संत साधना का दूसरा रूप हैं और वे मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप व जीवन का बोध कराते हैं। संस्कारों का अभाव परिवारों के लिए चुनौती: अग्रवाल पेंशनर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष एवं नवज्योति संगठन के मुख्य संरक्षक हरीश अग्रवाल ने कहा कि वर्तमान पीढ़ी में संस्कारों का अभाव परिवारों के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। कई बच्चे माता-पिता की उपेक्षा करते हैं, जबकि परिवार की मजबूती आपसी सम्मान और संस्कारों से बनती है। उन्होंने अपने परिवार का उदाहरण देते हुए कहा कि उनका परिवार वर्षों से संयुक्त रूप से सुख-समृद्धि के साथ जीवन व्यतीत कर रहा है। छोटे से लेकर बड़े तक एक-दूसरे का सम्मान करते हैं। यही एकता परिवार को मजबूती देती है। कार्यक्रम में पेंशनर्स एसोसिएशन के सचिव रघुनाथ सिंह वर्मा ने संकल्प वृद्धाश्रम परिवार को अपनी ओर से 11 हजार रुपए की सहयोग राशि प्रदान की। उन्होंने कहा कि नर सेवा ही नारायण सेवा है। संकल्प वृद्धाश्रम के संचालक राहुल सिंह के मार्गदर्शन में हुए कार्यक्रम में संत पं. दुर्गा प्रसाद कटारे बाबा, हरीश अग्रवाल तथा खाती समाज के अध्यक्ष एवं पेंशनर्स एसोसिएशन के सचिव रघुनाथ सिंह वर्मा का पुष्पमाला से स्वागत किया गया। संस्कार मंच के प्रभारी मनोज दीक्षित मामा, आकाश शर्मा, अजय मीना और आयुष गुप्ता सहित अन्य सदस्यों ने अतिथियों का अभिनंदन किया।
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संत को उसकी वेशभूषा से नहीं परखना चाहिए वह साधना का दूसरा रूप होता है : संत कटारे
