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साधन-निधि से संपन्न साधक परमात्मा की कृपा सरलता से पा जाते हैं। इनको विरला माना गया है। वैसे तो ईश्वर की कृपा वर्षा की तरह सबके लिए समान रूप से बरसती है, लेकिन यदि कोई पात्र में ठीक-से वर्षा का जल भर ले तो संकलन हो जाता है। ऐसे ही ईश्वर की जो कृपा बरस रही है, उसे हम अपने समर्पण रूपी पात्र में इकट्ठा कर सकते हैं, अन्यथा उसे बह जाना है। काकभुशुंडिजी ने गरुड़ जी को श्रीराम जी से हुई बातचीत बताते हुए कहा था- जेहि खोजत जोगीस मुनि प्रभु प्रसाद कोउ पाव। जिस भक्ति को योगीश्वर मुनि खोजते हैं, प्रभु की कृपा से कोई विरला ही उसे पाता है। इसलिए हम ईश्वर से जो भी मांगें, कृपा जरूर मांगें। आजकल हर बात की ब्रांडिंग का जमाना है। पिछले दिनों कनाडा यात्रा के दौरान वहां के एक सज्जन ने मुझे बताया कि कनाडा ने इन्वेंशन तो खूब किए, लेकिन अपने किए हुए की ब्रांडिंग नहीं कर पाया। तो हम कम से कम अपने धर्म की दुनिया में सत्प्रयासों की ब्रांडिंग अवश्य करें।
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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:ईश्वर की कृपा को समर्पण रूपी पात्र में ही इकट्ठा कर सकते हैं
