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- Rajdeep Sardesai Column | Why BJP Defies Anti Incumbency & Election Myths
4 घंटे पहले
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राजदीप सरदेसाई वरिष्ठ पत्रकार
हाल ही में राहुल गांधी ने पूछा था कि एक दशक से अधिक समय तक सत्ता में रहने के बाद भी भाजपा सत्ता-विरोधी लहर से इतनी अप्रभावित क्यों दिखाई देती है? उन्होंने कहा, मेरी दादी तक 1977 में सत्ता-विरोधी लहर में हार गई थीं। इसके बाद उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसा चुनावी प्रक्रिया में छेड़छाड़ से ही सम्भव है। यह एक बेहद गम्भीर आरोप है।
राहुल की यह बात तो मानी जा सकती है कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता को इधर झटका लगा है। एसआईआर के तहत मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने और अपीलों पर फैसले में हो रही देरी से पारदर्शिता को लेकर सवाल उठे हैं। बंगाल में अब तक 22 लाख नागरिक अपील कर चुके हैं। जिन अपीलों पर सुनवाई हुई, उनमें से 93% वैध मतदाता पाए गए हैं।
यह भी नहीं भूलना चाहिए कि बिहार में मतदान जारी रहने के दौरान सरकार को नकद राशि हस्तांतरित करने की अनुमति दी गई, असम में खुलेआम हेट-स्पीच पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, मान्यता-प्राप्त दलों से चुनाव चिह्न छीनकर दलबदल को वैध ठहराने की कोशिशें हुईं और चुनाव कार्यक्रम को सत्तारूढ़ दल के अनुकूल ‘समायोजित’ किया गया। इसलिए आयोग अपने कामकाज को लेकर उठ रही चिंताओं को महज राजनीतिक आरोप कहकर खारिज नहीं कर सकता।
लेकिन यहीं राहुल गांधी से गलती होने का भी खतरा है। यह कहना कि भाजपा का चुनावी वर्चस्व मुख्यतः किसी धांधली का नतीजा है, राजनीतिक घटनाक्रम से जुड़े असुविधाजनक तथ्यों को नजरअंदाज करना होगा। इससे कांग्रेस और विपक्ष को अपनी राजनीतिक कमजोरियों से बच निकलने का अवसर भी मिलता है।
सबसे सीधा सवाल ही लीजिए : क्या भारत की चुनावी सर्वेक्षण एजेंसियां भी इस साजिश का हिस्सा हैं? 2014 के बाद से हुए एक के बाद एक चुनावों ने दिखाया है कि नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता अब भी काफी मजबूत है, खासकर हिंदी पट्टी और पश्चिमी भारत के बड़े हिस्सों में। चुनावी सर्वेक्षण कभी-कभी बुरी तरह गलत भी साबित होते हैं, लेकिन इसके पीछे मौजूद वास्तविक परिघटना को ही खारिज कर देना पिछले एक दशक में भारतीय राजनीति में आए बदलाव को न समझ पाने के बराबर है।
भाजपा ने एक बेहद मजबूत राजनीतिक और संगठनात्मक मशीन खड़ी की है, जिसकी बराबरी करने में कांग्रेस संघर्ष करती रही है। उसके पास विशाल कैडर नेटवर्क है, आरएसएस का तंत्र है, गहरे वित्तीय संसाधन हैं, आक्रामक संचार तंत्र है, स्पष्ट वैचारिक आधार है और राष्ट्रीय विमर्श को चुनावी अभियानों में बदलने का पर्याप्त अनुभव है।
एक ताकतवर चुनावी मशीन के प्रभाव को समझाने के लिए किसी साजिश के सिद्धांत की जरूरत नहीं है। असली सवाल यह है कि उसका प्रतिद्वंद्वी दशकों तक सत्ता में रहने के बावजूद वैसी ही चुनावी मशीन खड़ी करने में क्यों नाकाम रहा।
कांग्रेस की सारी समस्याओं की जिम्मेदारी चुनाव आयोग पर नहीं डाली जा सकती। नेतृत्व को लेकर खींचतान, संगठन का कमजोर होना, गुटबाजी, दलबदल, राज्यों में कमजोर संगठनात्मक ढांचा और कोई प्रभावी वैकल्पिक राजनीतिक नैरेटिव पेश न कर पाना- इन सबने कांग्रेस के पतन में भूमिका निभाई है।
एक के बाद एक कई राज्यों के चुनावों में कांग्रेस भाजपा से मुकाबला करने से पहले ही खुद से लड़ती हुई नजर आई है। ऐसे में आज सवाल यह नहीं है कि मोदी के खिलाफ सत्ता-विरोधी लहर क्यों काम नहीं करती? बल्कि यह है कि विपक्ष सत्ता-विरोधी लहर को एक टिकाऊ राष्ट्रीय विकल्प में क्यों नहीं बदल पाया है? हर हार का ठीकरा अम्पायर पर नहीं फोड़ा जा सकता। आंकड़े हर बात का जवाब नहीं हैं, लेकिन वे राजनीतिक बदलाव की एक झांकी जरूर देते हैं।
इसे ‘मोदीत्व’ कहें, हिंदुत्व कहें, संगठनात्मक श्रेष्ठता कहें या चुनाव जीतने की क्षमता- भाजपा की सफलता को केवल चुनाव आयोग के खाते में नहीं डाला जा सकता। कांग्रेस को भी अपनी कमियों का जवाब देना होगा। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

