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इस सोमवार को सुबह 7:30 बजे मेरे एक स्कूलमेट का फोन आया। चूंकि मैं अपना कॉलम लिखने में व्यस्त था तो मैंने फोन स्पीकर पर रखकर कहा, ‘बोल।’ तभी घबराई हुई महिला की आवाज सुनकर मैंने फोन कान से लगा लिया। उनकी पत्नी बोलीं, ‘भाई साहब, क्या आप जल्दी से घर आ सकते हैं? इन्हें बहुत दर्द हो रहा है। अपनी कार लेकर आना, ताकि हमें अस्पताल ले जा सकें।’ मैंने पूछा, ‘क्या हुआ?’ तब उन्होंने ऐसी दुर्घटना के बारे में बताया, जिसे दोस्त ने उनसे भी छिपाकर रखा था। मैंने कहा, ‘दस मिनट में पहुंचता हूं’ और फोन काट दिया। एक्स-रे टेक्नीशियन ने देखकर लिखा- ‘ओलेक्रानोन में 1 सेमी का डिस्प्लेस्ड फ्रैक्चर, एक्शन रिक्वायर्ड।’ दोस्त के चेहरे पर आई आशंकाओं का जबाव मैंने गूगल से खोजा और उसे बताया कि ‘तुम्हारी बाईं कोहनी टूट गई है। डॉक्टर तय करेंगे कि सर्जरी होगी या फिजियोथेरेपी।’ वह 58 की उम्र में नौ साल पहले रिटायर हो चुके थे। लेकिन आज 67 साल की उम्र में भी उनकी खुद को लेकर यह धारणा नहीं बदली कि वह पूरी तरह आत्मनिर्भर, एक्टिव और शारीरिक रूप से मजबूत हैं। हमारे ग्रुप में वह सात बाइक राइडर्स में से एक हैं। पांच दोस्तों को तो उनके बच्चों ने बाइक को हाथ तक न लगाने का आदेश दे रखा है। एक दोस्त कभी-कभार बाइक चलाता है, ताकि वह चालू स्थिति में रहे। लेकिन अकेले वही हैं, जिनके लिए बाइक दूसरी पत्नी जैसी है। पत्नी को किचन का सामान चाहिए तो भी वह महज चार ब्लॉक दूर हेलमेट पहन कर बाइक से जाते हैं। उन्होंने पत्नी को भी नहीं बताया कि एक संकरी गली में गुजरते समय सामने से आए 20 साल के बाइकर ने स्टंटमैन की तरह गाड़ी चलाई तो वह गिर गए थे। दो हफ्ते तक पेनकिलर्स खाकर खुद इलाज करना और ‘कुछ नहीं होगा’ वाला उसका यह रवैया अब डॉक्टर के चैम्बर के बाहर इंतजार करते हुए मुझे गुस्सा दिला रहा था। ऑर्थोपेडिक सर्जन ने सॉफ्ट प्लास्टर लगाकर आदेश दिए कि न कोई वजन उठाना है, न धक्का देना है और न कुछ खींचना है- बस, पूर्णत: आराम करें। इसी सलाह से अब यह तय होने लगा कि वह घर में कैसे चलेंगे-फिरेंगे। उन्हें कहा गया कि पहली मंजिल पर बने बेडरूम तक जाते समय वह सीढ़ियों की रेलिंग पकड़कर चलें, ताकि उनकी उम्र के लोगों में बढ़ते गिरने के खतरे से बचा जा सके। लेकिन उनके यहां रेलिंग बाईं तरफ थी और उनके बाएं हाथ में ही प्लास्टर था तो वे सीढ़ी चढ़ते हुए दाएं हाथ से दीवार को धक्का-सा देकर चढ़ते थे। चूंकि अब उन्हें कुछ समय बदली परिस्थिति में रहना था तो हमने उनका बेडरूम ग्राउंड फ्लोर के गेस्ट रूम में शिफ्ट कर दिया। तभी से उनकी चलने-फिरने की क्षमता, यानी उनकी मोबिलिटी को लेकर चर्चा हो रही है। इस उम्र में हम मोबिलिटी को हल्के में लेते हैं, लेकिन अधिकतर इसी से हमारे जीवन की गुणवत्ता तय होगी। अगर आप सोचते हैं कि वाहन का इस्तेमाल करने के बजाय आप पैदल ही चल लेंगे, तो मैं इतना कहूंगा कि उसमें भी खतरा है। अब फुटपाथों का इस्तेमाल भी ऐसे अधीर दोपहिया चालक करने लगे हैं, जिनका लक्ष्य सिर्फ स्पीड होता है। मेरी सलाह है कि पहले रास्ते को ऊपर-नीचे हर तरफ से देखें और मानकर चलें कि ड्राइवर आपको नहीं देख रहे हैं। रिटायर लोगों के लिए हर काम में भागदौड़ वाला ‘गो-गो’ जीवन अब पीछे छूट गया। या तो ‘स्लो-गो’ जीवन अपनाइए, जिसमें आपके पास काफी समय हो और सभी को रास्ता देने में आपको कोई तकलीफ न हो, या फिर ‘नो-गो’ तरीका चुनिए जिसमें बेहद जरूरी होने पर ही बाहर निकलें। 60 साल के बाद इंजरी-फ्री जीवन बहुत जरूरी है। फंडा यह है कि कोई चोट रिटायर लोगों को भविष्य की मोबिलिटी को लेकर सोचने पर मजबूर करे, इससे पहले ही उन्हें ‘स्लो-गो’ तरीका अपना लेना चाहिए, ताकि जिंदगी पूरी तरह ‘नो-गो’ में न बदल जाए। कृपया, हर समय भागदौड़ वाले ‘गो-गो’ दिनों को अब भूलिए, क्योंकि आप 30 या 40 की उम्र में नहीं हैं।
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एन. रघुरामन का कॉलम:इंजरी-फ्री लाइफ, ‘गो-गो’ नहीं ‘स्लो-गो’ या ‘नो-गो’ तरीके से आती है
