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Tara Tarini Temple Odisha | Durga Puja Rituals & Shakti Peeth Significance


5 मिनट पहले

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ओडिशा के तारा तारिणी मंदिर में एक नहीं, दो देवियों की पूजा होती है। इनके नाम तारा और तारिणी हैं, लेकिन दोनों को एक ही शक्ति का रूप माना जाता है। गर्भगृह में दो पत्थरों को सोने-चांदी के आभूषणों से चेहरे का स्वरूप दिया गया है।

मान्यता है कि इसी जगह देवी सती के दोनों स्तन गिरे थे। इसलिए इसे मातृत्व और पोषण शक्ति का केंद्र माना जाता है। यहां बच्चों की रक्षा की कामना से उनके पहले बाल देवी को अर्पित करने की परंपरा है।

तारा तारिणी को समुद्री यात्रियों की रक्षक देवी भी माना जाता है। भारतीय नौसेना ने इन्हीं के नाम से प्रेरित होकर अपनी पाल नौका का नाम INSV तारिणी रखा था। इस नाव से छह महिला अधिकारियों ने 2018 में दुनिया की समुद्री परिक्रमा पूरी की। मई 2025 में दो महिला अधिकारियों ने भी इसी नाव से विश्व परिक्रमा की।

दो देवियों के चेहरे पत्थरों पर बने, बीच में पीतल की दो चलंत प्रतिमाएं

तारा तारिणी मंदिर ओडिशा के गंजाम जिले में ऋषिकुल्या नदी के किनारे कुमारी पहाड़ी पर है। यहां देवी के दो स्वरूप एक साथ पूजे जाते हैं। एक का नाम तारा और दूसरे का तारिणी है। दोनों को आदि शक्ति का स्वरूप माना जाता है। मंदिर के गर्भगृह में दो प्राकृतिक पत्थर हैं। इन पर सोने-चांदी के आभूषण और दूसरी श्रृंगार सामग्री लगाकर मानवीय चेहरे बनाए जाते हैं। यही दोनों देवियों के मूल स्वरूप हैं।

इनके बीच में पीतल के दो मुख भी रखे जाते हैं। इन्हें चलंत प्रतिमा कहते हैं। चलंत प्रतिमा का अर्थ देवी का वह स्वरूप है, जिसे मूल स्थान से अलग धार्मिक अनुष्ठानों में इस्तेमाल किया जा सकता है। इस मंदिर में दो नाम और दो स्वरूप हैं, लेकिन आराधना एक ही शक्ति की होती है। तारा और तारिणी को दक्षिण ओडिशा, खासकर गंजाम क्षेत्र की आराध्य देवियां माना जाता है।

बच्चों का पहला मुंडन: देवी की रक्षा पाने की कामना से बाल चढ़ाते हैं

तारा तारिणी मंदिर की सबसे खास परंपराओं में बच्चों के पहले बाल देवी को अर्पित करना शामिल है। इसे मुंडन संस्कार कहते हैं। माता-पिता अपने छोटे बच्चों को लेकर मंदिर पहुंचते हैं। यहां बच्चों के सिर के बाल मुंडवाए जाते हैं। फिर ये बाल देवी को समर्पित किए जाते हैं। धार्मिक मान्यता है कि ऐसा करने से बच्चे को देवी का संरक्षण और आशीर्वाद मिलता है। बच्चों के पहले बाल चढ़ाने की यह परंपरा सालभर निभाई जाती है, लेकिन चैत्र महीने में इसका महत्व सबसे ज्यादा होता है।

नवरात्रि से 8 दिन पहले ही शुरू हो जाती है दुर्गा पूजा, 16 दिन तक चलता है उत्सव

तारा तारिणी मंदिर में शारदीय दुर्गा पूजा नौ दिन से पहले शुरू हो जाती है। ओडिशा की परंपरा में इसे षोडश पूजा कहा जाता है। इसमें आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी से शुक्ल पक्ष की नवमी तक देवी की विशेष आराधना का विधान है। इस दौरान देवी की पूजा के साथ चंडी पाठ और चंडी यज्ञ होते हैं। नवरात्रि के नौ दिन इसी लंबे पूजा क्रम का हिस्सा होते हैं। इन दिनों देवी के अलग-अलग रूपों की आराधना की जाती है।

तारा तारिणी में देवी के स्नान की भी खास परंपरा है। इसके लिए पहाड़ी के नीचे बहने वाली ऋषिकुल्या नदी से जल लाया जाता है। इस स्नान को स्थानीय पूजा व्यवस्था में ‘मजना’ कहते हैं। सामान्य दिनों में सुबह और शाम, दोनों समय यह अनुष्ठान होता है। पहले सेवायत देवियों के मूल स्वरूप को साफ करते हैं। फिर नदी से लाए पवित्र जल से स्नान कराते हैं।

इसके बाद देवियों को साड़ी और दूसरे वस्त्र पहनाए जाते हैं। सोने-चांदी के आभूषणों से श्रृंगार किया जाता है। हल्दी और चंदन का लेप लगाया जाता है। फिर फूल, धूप और दीपक से पूजा होती है। स्नान और श्रृंगार के बाद मंगल आरती तथा भोग का क्रम शुरू होता है। सुबह देवी को खिचड़ी, फल और मिठाई अर्पित की जाती है। दोपहर और रात के भोग में खिचड़ी, दाल, सब्जी और मिठाइयां भी शामिल होती हैं।

नाविकों की रक्षक देवी: नौसेना ने इन्हीं के नाम पर पाल नौका का नाम तारिणी रखा

तारा तारिणी की आराधना केवल मातृत्व शक्ति से नहीं जुड़ी है। कलिंग की पुरानी समुद्री व्यापार परंपरा में भी इन देवियों का महत्व रहा है। ऋषिकुल्या नदी के आसपास के क्षेत्र से व्यापारियों की समुद्री यात्राओं का संबंध रहा है। मान्यता है कि यात्रा शुरू करने से पहले नाविक देवी तारा की पूजा करते थे। देवी को समुद्र में रक्षा और सुरक्षित यात्रा का आशीर्वाद देने वाली शक्ति माना जाता था।

इसी परंपरा के कारण भारतीय नौसेना ने अपनी समुद्री पाल नौका का नाम INSV Tarini रखा। 17 फरवरी 2017 को रक्षा मंत्रालय ने इस नाव के बारे में जारी प्रेस नोट में बताया था कि इसका नाम गंजाम के तारा तारिणी मंदिर से प्रेरित है। उसमें तारिणी का अर्थ नाव और रक्षक बताया गया है।

इस नाव को गोवा में बनाया गया था। 18 फरवरी 2017 को इसे नौसेना में शामिल किया गया। इसी नाव से भारतीय नौसेना की छह महिला अधिकारियों ने दुनिया की समुद्री परिक्रमा की। इस अभियान का नाम ‘नाविका सागर परिक्रमा’ था।

तारा तारिणी में बौद्ध और आदिवासी परंपराओं का भी प्रभाव

देवी तारा का नाम महायान बौद्ध परंपरा में भी मिलता है। बौद्ध धर्म में तारा को करुणा और रक्षा से जुड़ी देवी माना जाता है। इस समानता को इतिहासकार तारा तारिणी की पूजा पर बौद्ध प्रभाव की एक संभावना मानते हैं। मंदिर विकास बोर्ड के अनुसार गर्भगृह में बुद्ध की एक छोटी ध्यानमग्न प्रतिमा भी है। इसे यहां बौद्ध परंपरा से जोड़कर देखा गया है।

हालांकि, तारा तारिणी की पूजा कब शुरू हुई, इसकी कोई निश्चित प्राचीन निर्माण तिथि उपलब्ध नहीं है। यहां की आराधना परंपरा पुरानी है, लेकिन वर्तमान मंदिर में समय-समय पर निर्माण और बदलाव हुए हैं।



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