ज्वाला देवी, अग्नि शक्ति का रूप:यहां देवी रूप में 9 ज्वालाएं, पुजारी का शादीशुदा होना जरूरी; नवरात्रि में 3 दिन 24 घंटे खुला रहेगा मंदिर




हिमाचल के ज्वाला देवी मंदिर में देवी की मूर्ति नहीं है। यहां चट्टानों की दरारों से निकलने वाली नौ ज्वालाओं की पूजा होती है। हर ज्वाला का अलग नाम और धार्मिक महत्व है। इनमें महाकाली से लेकर अन्नपूर्णा, महालक्ष्मी और सरस्वती तक के स्वरूप शामिल हैं। यहां देवताओं के साथ पितरों के लिए भी विशेष पूजा होती है। मंदिर में पीढ़ियों से भोजक परिवार के लोग पूजा कर रहे हैं। इस परिवार में शादी के बाद ही पुजारी बनने का अधिकार मिलता है। नवरात्रि में यहां विशेष हवन, कन्या पूजन और तीन बार मुफ्त लंगर की व्यवस्था रहती है। गर्भगृह में मूर्ति नहीं, चट्टान की दरारों से निकलती हैं नौ प्राकृतिक ज्वालाएं यहां गर्भगृह में देवी की प्रतिमा नहीं है। चट्टानों की दरारों से निकलने वाली आग की लपटों को ही देवी का स्वरूप माना जाता है। इन्हें अखंड ज्योतियां कहते हैं। मंदिर में मुख्य ज्योति महाकाली के नाम से पूजी जाती है। यह गर्भगृह में चट्टान की दरार से निकलती है। आसपास की दूसरी दरारों से भी छोटी-छोटी ज्वालाएं निकलती हैं। सभी को मिलाकर नौ ज्वालाओं की पूजा होती है। इन ज्वालाओं को जलाने के लिए तेल, घी या बाती नहीं लगाई जाती। जमीन के भीतर से निकलने वाली प्राकृतिक गैस से ये जलती हैं। मान्यता है यहां देवी सती की जीभ गिरी थी, इसलिए इन ज्वालाओं को देवी की जिभ का रूप माना जाता है। इसी कारण ज्वाला देवी को अग्नि शक्ति का केंद्र कहते हैं। नौ देवी के रूप में नौ ज्योतियां: चांदी के आले में महाकाली, नीचे अन्नपूर्णा ज्वाला देवी मंदिर के गर्भगृह में चट्टानों की अलग-अलग दरारों से आग की लपटें निकलती हैं। इनकी पूजा नौ देवी स्वरूपों में होती है। मुख्य ज्योति चांदी से जड़े आले में है। इसके नीचे और दूसरी ओर भी लपटें निकलती हैं। गर्भगृह के पवित्र कुंड में चार अन्य देवी रूप की ज्योतियां हैं। इसलिए सभी नौ ज्वालाएं एक कतार में नहीं हैं। ये प्राकृतिक लपटें नीले रंग की दिखती हैं। इनका आकार और तीव्रता एक जैसी नहीं रहती। मंदिर में इनकी पहचान देवी के नाम और पूजा स्थान से जुड़ी है। 1. महाकाली: यह मंदिर की मुख्य ज्योति है। इसका स्थान गर्भगृह के प्रवेश के सामने चांदी से जड़ा आला है। इसे भक्ति और मुक्ति देने वाली शक्ति माना जाता है। 2. अन्नपूर्णा: महाकाली ज्योति के नीचे अन्नपूर्णा का स्थान है। बताया जाता है पहले यहां दो लपटें होती थीं। इस स्वरूप को अन्न और परिवार पोषण की शक्ति मानते हैं। 3. चंडी: महाकाली ज्योति के दूसरी ओर चंडी का स्वरूप है। इसे शत्रुओं और बुरी शक्तियों का नाश करने वाली देवी माना जाता है। 4. हिंगलाज भवानी: यह मंदिर की चौथी देवी ज्योति मानी जाती है। धार्मिक परंपरा में इनकी पूजा संकट और बाधाएं दूर करने की कामना से होती है। 5. विंध्यवासिनी: पांचवीं ज्योति विंध्यवासिनी देवी का स्वरूप है। इसे शोक और दुख दूर करने वाली शक्ति माना जाता है। 6. महालक्ष्मी: इस ज्योति का स्थान गर्भगृह के पवित्र कुंड में है। महालक्ष्मी को धन, वैभव और समृद्धि की देवी माना जाता है। 7. सरस्वती: ये ज्योति भी उसी कुंड में है। देवी सरस्वती की पूजा विद्या और ज्ञान प्राप्ति के लिए होती है। 8. अंबिका: कुंड में मौजूद एक अन्य ज्योति को अंबिका का स्वरूप माना जाता है। इसकी पूजा संतान प्राप्ति और बच्चों के कल्याण की कामना के लिए होती है। 9. अंजना देवी: ये ज्योति भी इसी पवित्र कुंड में है। इसे आयु और सुख देने वाली देवी माना जाता है। नवरात्रि में झंडा चढ़ाकर उत्सव शुरू, पहले दिन कन्या पूजन और नौ ज्योतियों की विशेष पूजा ज्वाला देवी मंदिर में 11 अक्टूबर को पारंपरिक झंडा चढ़ाने की रस्म से शारदीय नवरात्रि शुरू हुई। पहले झंडे की पूजा हुई, फिर उसे मंदिर की छत पर लगाया गया। इसके बाद देवी की विशेष पूजा और कन्या पूजन हुआ। इस मौके पर मंदिर को 51 क्विंटल देशी-विदेशी फूलों से सजाया गया। नवरात्रि में नौ प्राकृतिक ज्योतियों की विशेष आराधना होती है। देवी के मंत्रों के साथ हवन और यज्ञ किए जाते हैं। कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर उनकी पूजा की जाती है। देवताओं को स्वाहा, पितरों को स्वधा से आहुति; योगिनी कुंड में खप्पर पूजा यहां देवी के साथ देवताओं और पितरों के लिए भी विशेष अनुष्ठान होते हैं। यहां स्वाहा और स्वधा, दोनों पद्धतियों से हवन होता है। अग्नि में देवताओं के नाम से दी जाने वाली आहुति के साथ स्वाहा बोला जाता है। पितरों के लिए दी जाने वाली आहुति में स्वधा बोला जाता है। यहां हवन के अलावा खप्पर पूजा भी होती है। यह पूजा मंदिर के मुख्य द्वार पर बने योगिनी कुंड में होती है। इस पूजा से पितृ दोष और वास्तु दोष से मुक्ति मिलती है। पूजा का अधिकार सिर्फ शादीशुदा पुजारियों को, पिता से मिलती है दीक्षा मंदिर की कथा राजा भूमिचंद से जुड़ी है। मान्यता है कि राजा की एक गाय रोज जंगल में चरने जाती थी। वहां छोटी कन्या उसका दूध पी लेती थी। इसलिए गाय शाम को दूध नहीं देती थी। राजा को पता चला तो उस स्थान की खोज कराई। वहां चट्टानों से निकलती ज्वालाएं मिलीं। इसके बाद राजा भूमिचंद ने देवी का मंदिर बनवाया। राजा ने देवी की पूजा के लिए शाकद्वीप से भोजक वंश के दो ब्राह्मणों को बुलाया था। उन्हीं परिवारों के वंशज आज भी मंदिर में पूजा कर रहे हैं। ज्वाला देवी मंदिर की पूजा व्यवस्था सैकड़ों साल से भोजक वंश के परिवार संभाल रहे हैं। यहां पुजारी बनने के लिए केवल परिवार में जन्म लेना काफी नहीं है। मंदिर की परंपरा के अनुसार, शादी के बाद दीक्षा लेने पर ही मुख्य पूजा करने का अधिकार मिलता है। यह दीक्षा पिता से मिलती है। इसके बाद मंदिर के परंपरागत धार्मिक अनुष्ठान कर सकते हैं। इस व्यवस्था में पूजा करने का अधिकार पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता है। इसे वंशानुगत गुरु परंपरा कहा जाता है।



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