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इंदिरा ने अपने ही लोगों पर बम बरसाए:चूहों के चलते देश से अलग होते-होते बचा मिजोरम, एक चूहा मारने पर 20 पैसे इनाम




देश के ऐसे सियासी किस्से, जिनका असर आज भी है। दैनिक भास्कर की सीरीज ‘पावर प्ले’ में पढ़ें एपिसोड-1 रात के 8 बजे हैं। चांद आधा खिला है। मिजोरम के चम्फाई इलाके का पहाड़ी खेत। लालथनसांगा नाम का एक किसान खेत की ओर तेजी से बढ़ रहा है। एक हाथ में मशाल, दूसरे में चूहे पकड़ने वाला बांस का फंदा। वह ढलान उतरकर खेत के करीब पहुंचा ही था कि चारों तरफ से अजीब शोर सुनाई देने लगा। उसने मशाल उठाई, तो देखा धान के खेत में चूहों का सैलाब था। हजारों चूहे बालियां कुतर रहे थे, सैकड़ों जमीन पर दाने खा रहे थे और कुछ जड़ें खोद रहे थे। लालथनसांगा ने डंडा उठाया- धप्प! एक चूहा मरा। फिर दूसरा… फिर तीसरा। थककर किसान चूहे पकड़ने के लिए फंदे लगाने लगा। एक चूहा फंसता, तब तक दर्जनों और आ जाते। चांद ढलता गया। मशाल की लौ कमजोर पड़ती गई, लेकिन चूहे खत्म नहीं हुए। 400-500 चूहे मारने के बाद वह थककर बैठ गया। तभी चिड़ियों की चहचहाहट शुरू हुई। सूरज की पहली किरण पड़ी, तो पूरा खेत उजड़ चुका था। लालथनसांगा की रातभर की लड़ाई काम न आई, चूहे जीत चुके थे। यह सिर्फ एक खेत का नहीं, पूरे मिजोरम का हाल था। हर खेत में जंग चल रही थी। जब खेत उजड़ गए, तो चूहे घरों में रखे अनाज पर टूट पड़े और चट करने लगे। अचानक लाखों चूहों का सैलाब कैसे आया। इससे मिजोरम की सियासत पर क्या असर पड़ा। क्यों वायुसेना को बम गिराने पड़े। पढ़ते हैं आगे की कहानी… अक्टूबर 1958, तब मिजोरम असम का ही एक हिस्सा था। हजारों एकड़ में फैला एक खास किस्म का बांस अचानक फूल-फल से लद गया। रोज अनगिनत फलों के बीज जमीन पर गिरते और चूहे उन पर टूट पड़ते। भरपेट खाना मिलते ही चूहों की तादाद बेतहाशा बढ़ने लगी। इतनी कि- लोग बांस के जंगलों को ‘चूहों का जंगल’ कहने लगे। छह महीने बाद बांस के फल खत्म हुए, लेकिन चूहे नहीं। भूख अब मिजो हिल्स के गांव-गांव फैल चुकी थी। इस अकाल को ‘मौतम’ कहा गया। सरकार ने एक चूहा मारने पर 20 पैसे का इनाम रखा। सबूत के तौर पर पूंछ लानी थी। सी. रोखुमा नाम के एक टीचर ने अभियान शुरू कर दिया। पूरे मिजोरम में लोगों को जोड़ा। कुल मिलाकर 21 लाख पूंछें जमा हुईं, लेकिन चूहों का सैलाब नहीं रुका। मिजोरम के सूचना और जनसंपर्क विभाग के संयुक्त निदेशक खाववेल्थांगा ने बाद में अमेरिकी मैगजीन वैनिटी फेयर को बताया कि सैकड़ों लोग भूख से मर गए। सैकड़ों लोग पेड़ों की पत्तियां खाकर गुजारा करने लगे। मिजोरम की एक पहाड़ी पर रहने वाला 15 साल का जोरामथांगा भी यह सब देख रहा था। वही जोरामथांगा, जो आगे चलकर तीन बार मिजोरम का मुख्यमंत्री बना। जोरामथांगा अपनी आत्मकथा ‘फ्रॉम गुरिल्ला फाइटर टू चीफ मिनिस्टर’ में लिखते हैं कि लोकल नेताओं ने असम सरकार को चेताया- तुरंत राहत न मिली तो हालात बेकाबू हो जाएंगे। राहत पहुंची, पर उतनी तेजी से नहीं, जितनी तेजी से भुखमरी फैल रही थी। धीरे-धीरे मिजो लोगों को लगने लगा- इस मुसीबत में उनकी सुनने वाला कोई नहीं। अब गांवों में लोग एक-दूसरे का सहारा बनने लगे, जिसके घर थोड़ा चावल बचा होता वह बांटकर खाने लगा, पर यह मदद कब तक चलती। आखिरकार आइजोल के जालेन केबिन में कुछ नौजवान गुप्त बैठक के लिए जुटे- न मंच, न झंडा, न भाषणबाजी। सवाल बस एक- भूख से मर रहे लोगों को कैसे बचाया जाए? लंबी चर्चा के बाद मिजो नेशनल फेमिन फ्रंट (MNFF) बनाने का फैसला हुआ- पहला मकसद था राहत पहुंचाना, बाद में इसे राजनीतिक संगठन में बदल देना। मिजो लोगों के जाने-माने नेता पू डेन्थुआमा इसके अध्यक्ष बने और नौकरी छोड़कर संगठन में शामिल हुए लालडेंगा सचिव बने। अब MNFF के कार्यकर्ता भूखे लोगों तक राशन पहुंचाने लगे, अनाज लूटे जाने से रोकते। धीरे-धीरे लोगों को भरोसा हुआ- कोई तो है जो उनके साथ खड़ा है। यही भरोसा आगे चलकर MNFF की सबसे बड़ी ताकत बना। 1960 तक आते-आते मिजो लोगों में असम और केंद्र सरकार के खिलाफ नाराजगी गहरी हो चुकी थी- संकट में किसी ने साथ नहीं दिया, यह एहसास मिजो लोगों के मन में बैठ गया था। उनका भरोसा MNFF पर बढ़ चुका था। 22 अक्टूबर 1961 को MNFF ने नाम से ‘फेमिन’ शब्द हटा दिया। नया नाम हुआ- मिजो नेशनल फ्रंट (MNF)। नाम बदलते ही मकसद भी बदल गया MNF ने सरकार के खिलाफ लोगों की नाराजगी को अलग देश की मांग में बदलना शुरू कर दिया। भूख से शुरू हुई लड़ाई अब बगावत पर आ गई। अगले 5 साल में MNF मजबूत राजनीतिक संगठन बन गया। 30 अक्टूबर 1965 को लालडेंगा ने प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री को पत्र लिखकर अलग मिजो देश की मांग रखी। दिल्ली से जवाब नहीं मिला, तो MNF ने हथियार उठाने का फैसला कर लिया। तब पूर्वी पाकिस्तान यानी आज के बांग्लादेश की मदद से हथियार जुटाए। कैडरों को ट्रेनिंग दी गई। एक साल में लड़ाकू कैडर तैयार हो गया। इसके बाद संगठन ने ‘ऑपरेशन जेरिको’ की योजना बनाई- यानी हथियारबंद विद्रोह। 28 फरवरी 1966 की रात, ज्यादातर लोग सो चुके थे। अंधेरे में हथियारबंद दस्ते निकल पड़े- कुछ देर बाद गोलियों की आवाज गूंजने लगी। आइजोल समेत मिजोरम के कई कस्बों में MNF ने थानों-दफ्तरों पर हमले कर दिए, फोन लाइनें काट दीं, चौकियां घेर लीं। रातोंरात आइजोल का बड़ा हिस्सा उनके कब्जे में आ गया और 1 मार्च को संगठन ने स्वतंत्र मिजोरम की घोषणा भी कर दी। अब भारतीय सेना को सीधे चुनौती दे दी गई थी। इस दौरान MNF ने पहाड़ियों में ठिकाने बना रखे थे। रास्ते बंद थे, पुल तोड़ दिए गए थे। घने जंगल और टेढ़े-मेढ़े पहाड़ सेना की कार्रवाई में बड़ी बाधा बन गए। जब भी सैनिक किसी गांव में लड़ाकों को तलाशते तो लोकल लोग उनके सामने खड़े हो जाते- लड़ाकों को घरों में छिपा लेते, उनके रहने का इंतजाम करते। नतीजा- असम राइफल्स की फोर्स के लिए गांवों में घुसना मुश्किल हो गया। आइजोल में अब उसकी सिर्फ एक बटालियन बची थी। यह लड़ाई अब गुरिल्लों की नहीं, पूरे मिजोरम और सेना के बीच जंग बन चुकी थी। स्वतंत्र मिजोरम की घोषणा के बाद दिल्ली को समझ आ गया- यह अब सिर्फ कानून-व्यवस्था का मामला नहीं। इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं। उन्होंने कड़ा जवाब देने का फैसला कर लिया। और फिर आया 5 मार्च 1966 का दिन आइजोल के लोगों ने पहली बार आसमान में लड़ाकू विमान मंडराते देखे। 5 मार्च, सुबह करीब 10 बजे, वायुसेना के चार जेट पहुंचे- पहला निशाना था पहाड़ी इलाका- तुइखुआहत्लांग, जहां शहर की पानी सप्लाई को MNF ने अपने कब्जे में ले लिया था। फिर विमानों ने गोता लगाया। मशीनगनें गरजीं, रॉकेट दागे गए- पानी की सप्लाई छुड़ा ली गई। इसके बाद शहर के कई और मोहल्लों पर भी गोलाबारी हुई। मकानों में आग लगी, धुआं छा गया- लोग बच्चों को गोद में उठाए जंगल की ओर भागने लगे। 7 मार्च, दोपहर 2 बजे- हनाहलान के आसमान में दो और विमान उतरे। गोलियों की बौछार, फिर आग-धुआं। 270 में से 200 घर तबाह हो गए। घरों में रखा अनाज और पशु भी जल गए। दो और गांव इसी आग में झुलसे। करीब 13 जानें गईं। आइजोल पर एक बार फिर सेना का कब्जा हो गया। अब MNF के लड़ाके शहर छोड़कर, जंगलों में फैल गए। ऑपरेशन जेरिको तो खत्म हो गया, लेकिन लड़ाई नहीं। उधर, आइजोल का धुआं छंटा भी नहीं था कि सवाल उठने लगा- क्या भारत ने अपने ही नागरिकों के खिलाफ वायुसेना का इस्तेमाल कर दिया। 9 मार्च 1966 को इंदिरा गांधी ने मीडिया से कहा- वायुसेना का इस्तेमाल लोगों पर बमबारी के लिए नहीं, बल्कि सैनिकों तक रसद पहुंचाने के लिए हुआ था। लेकिन जिनके घर खाक हुए थे, उनके लिए यह सफाई काम न आई। मिजो लोगों ने इंदिरा के बयान पर यकीन नहीं किया। 5 मार्च की बमबारी को याद करते हुए जोरामथांगा लिखते हैं- ‘उस दिन आइजोल हमेशा के लिए जख्मी हो गया।’ सरकार समझ गई कि लड़ाकों की ताकत गांवों से मिलने वाला खाना, मुखबिरी और पनाह ही है। उसने पहाड़ी गांवों को खाली कराया और लोगों को सड़क किनारे नई बस्तियों में बसाया। सोच थी- अगर गांव खाली होंगे, तो लड़ाकों को मदद नहीं मिलेगी। वे कमजोर पड़ जाएंगे। सरकार की रणनीति काम कर गई। अब MNF के सामने नई चुनौती थी- जंगल में छिपे अपने लड़ाकों को जिंदा कैसे रखा जाए। 1,000 से ज्यादा लड़ाकों के लिए रोज राशन और पैसे जुटाना था। यहीं से MNF मदद के लिए भारत की सीमा के बाहर गया। 1970 में उसके नेता ढाका पहुंचे, जो तब पूर्वी पाकिस्तान का हिस्सा था। वहां चीनी वाणिज्य दूतावास में उनका आना-जाना पहले से ही था। संगठन ने चीन से हथियार, ट्रेनिंग और आर्थिक मदद मांगी। ‘द इकोनॉमिक टाइम्स’ से जोरामथांगा ने कहा कि सितंबर 1970 की शुरुआत में चीनी दूतावास ने उनके वीजा का इंतजाम भी कर दिया। बीजिंग रवाना होते समय चीनी दूतावास के कर्मचारी और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI अधिकारी उन्हें ढाका एयरपोर्ट छोड़ने आए। वह लालडेंगा के साथ पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस (PIA) के विमान से बीजिंग पहुंचे। चीन में प्रधानमंत्री झोउ एनलाई से मुलाकात हुई। चीन हथियार देने को तैयार था- AK-47, रॉकेट लॉन्चर, LMG, ग्रेनेड, 3,000 राउंड गोला-बारूद। लेकिन इन्हें मिजोरम लाना आसान नहीं था- हवाई रास्ते पर भारत का पहरा था, समुद्री रास्ते में मलक्का स्ट्रेट पर अमेरिकी नौसेना का डेरा था। जोरामथांगा लिखते हैं- ‘आखिरकार हम हथियार नहीं ला सके। उधर, भारतीय सेना ने हमारे लड़ाकों के खिलाफ अभियान और तेज कर दिया।’ एक बड़ी घटना घटी। 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध शुरू हो गया। इंदिरा की मदद से पूर्वी पाकिस्तान बांग्लादेश बन गया। जोरामथांगा आगे लिखते हैं- ‘अब हमें ठिकाना बदलकर इस्लामाबाद जाना पड़ा, लेकिन वहां से आंदोलन को चलाना मुश्किल हो गया। लड़ाकों से हमारा संपर्क टूटने लगा।’ यहीं से रास्ता बदलना पड़ा आखिरकार भारत सरकार से शांति और बातचीत का रास्ता तलाशा गया। 30 अक्टूबर 1984 को लालडेंगा समेत MNF नेता दिल्ली पहुंचे। अगले दिन इंदिरा गांधी से मुलाकात होनी थी, पर उसी दिन उनकी हत्या हो गई। राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने, तो बातचीत आगे बढ़ी। 30 जून 1986 को दिल्ली में मिजो शांति समझौता हुआ, लड़ाकों ने हथियार डाल दिए। 20 फरवरी 1987 को मिजोरम पूर्ण राज्य बन गया। आखिरकार इस पूरे आंदोलन का हासिल यही निकला- मिजो लोगों को अलग देश तो नहीं मिला, पर कुछ और मिला जो शायद उतना ही कीमती था: अपनी जमीन, परंपरा और पहचान पर आखिरी फैसले का हक। संविधान में अनुच्छेद 371G जोड़ा गया, जिसने यह तय कर दिया- मिजो समाज से जुड़ा कोई फैसला अब दिल्ली की मर्जी से नहीं, आइजोल की मंजूरी से ही होगा। जब तक कि मिजोरम विधानसभा उसे मंजूर न कर दे। मिजोरम की उस बमबारी ने एक ऐसा सबक दिया, जो आज तक कायम है- आगे पंजाब, कश्मीर, नगालैंड, मणिपुर जैसी जगहों पर ऐसे ही संघर्ष हुए, लेकिन भारत सरकार ने दोबारा कभी अपने नागरिकों पर वायुसेना का इस्तेमाल नहीं किया। ***** रेफरेंस: 1. From Guerrilla Fighter to Chief Minister: A Memoir 2. Vanity Fair- Magazine 3. Indian Council of Agricultural Research



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