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एन. रघुरामन का कॉलम:क्यों बच्चे ‘थैंक यू’ और ‘प्लीज’ कहने से इनकार कर रहे हैं?




ज्यादातर पैरेंट्स, चाहे उच्च शिक्षित हों या नहीं, अकसर बच्चों को समझाते हैं कि ‘अच्छे संस्कारों में कुछ खर्च नहीं होता।’ लेकिन हाल ही में जेन-जी ने मुझे सिखाया कि ‘ये विनम्र शब्द इस्तेमाल करने की कीमत शायद धरती को चुकानी पड़ती है।’ सोच रहे हैं इसका क्या मतलब है? तो आगे पढ़िए। यह सबक मैंने मुश्किल से सीखा। एक सार्वजनिक जगह पर खड़े हुए मैंने ऑटो किराया चुकाने में एक जेन-जी युवक की मदद की। उसके पास चेंज नहीं थे तो मैंने दिए, क्योंकि ऑटो ड्राइवर के पास डिजिटल सुविधा नहीं थी। पेमेंट करने के बाद युवक ने ‘थैंक यू’ तक नहीं कहा और चला गया। उसे सुनाने के लिए मैं थोड़ी ऊंची आवाज में अपने दोस्त से बोला कि ‘देखो, आज की पीढ़ी बुनियादी शिष्टाचार भी भूल गई है। क्या वह थैंक यू भी नहीं कह सकता था?’ वह युवक तुरंत मुड़ा और लौटकर बोला, ‘थैंक यू अंकल। बात इरादे की नहीं है। धीरे-धीरे हमारी आदत ‘थैंक यू’ या ‘प्लीज’ न कहने की हो रही है, क्योंकि सच में मैं भूल गया था कि मैं किसी एआई से नहीं बल्कि इंसान से बात कर रहा हूं।’ जब मैंने कहा, ‘सॉरी, मैं समझा नहीं’ तो उसने एक दिलचस्प स्पष्टीकरण दिया। उसने कहा कि उनकी पीढ़ी के लिए उन आदतों को छोड़ना मुश्किल हो रहा है, जिन्हें सिखाने में पैरेंट्स ने वर्षों लगाए थे। वह मुस्कुरा कर बोला, ‘आपकी पीढ़ी ने हमें सफलतापूर्वक सिखाया कि अपने पालतू डॉग को खाने के लिए कहते वक्त भी ‘प्लीज’ कहो। हाउसहोल्ड हैल्पर पानी का गिलास दे तो उसे भी ‘थैंक यू’ कहो। लेकिन अब यही आदतें चैटजीपीटी, जेमिनी और दूसरे एआई चैटबॉट्स में भी हमारे साथ चल रही हैं। लेकिन हर अतिरिक्त शब्द का मतलब है ज्यादा प्रोसेसिंग, यानी ज्यादा बिजली खपत और पर्यावरण पर अधिक बड़ा असर।’ हैरानी की बात है कि उसकी बात में पॉइंट था। यूनाइटेड नेशंस की एक हालिया रिपोर्ट ने भी यही चिंता जताई है। इसके अनुसार, व्यक्तिगत तौर पर एआई प्रॉम्प्ट में ‘प्लीज’ या ‘थैंक यू’ जोड़ने का असर मामूली होता है। लेकिन जब यही हर दिन अरबों एआई इंटरैक्शन में दोहराया जाता है तो उसका पर्यावरणीय प्रभाव उल्लेखनीय हो जाता है। चैटजीपीटी के उपयोग के आंकड़ों के आधारित रिपोर्ट का अनुमान है कि यदि प्रॉम्प्ट से केवल ‘प्लीज’ हटा दें तो सालाना करीब 1.8 गीगावॉट-घंटे बिजली बचाई जा सकती है। अभी तक यह सार्वजनिक आंकड़ा नहीं है कि एआई कंपनियां सवालों को प्रोसेस करने में कितनी बिजली खर्च करती हैं या कितने प्रॉम्प्ट ‘प्लीज’ से शुरू होते हैं। हालांकि, यूनाइटेड नेशंस की रिपोर्ट का अनुमान है कि एक सामान्य चैटजीपीटी रिक्वेस्ट लगभग 0.42 वॉट-घंटे बिजली खपत करता है, जो 10 वॉट के एलईडी बल्ब को लगभग ढाई मिनट तक जलाने के लिए पर्याप्त है। वैश्विक स्तर पर देखें तो यह पैमाना चौंकाने वाला है। अकेला चैटजीपीटी हर दिन अनुमानित 2.5 अरब से अधिक प्रॉम्प्ट प्रोसेस करता है। इसमें जेमिनी, क्लॉड, कोपायलट और अन्य एआई सिस्टमों की रिक्वेस्ट भी जोडें तो संख्या कहीं ज्यादा बड़ी हो जाती है। ऐसे में हर प्रॉम्प्ट पर बहुत छोटी बचत भी एकसाथ मिलकर बेहद फायदेमंद हो सकती है। कहानी यहां एक और दिलचस्प मोड़ लेती है। टेकराडार द्वारा अमेरिका और ब्रिटेन के एक हजार लोगों पर किए सर्वे में पाया गया कि 71% ब्रिटिश यूजर्स एआई चैटबॉट्स के साथ विनम्र रहते हैं। जबकि अमेरिकियों में यह आंकड़ा 67% था। जब उनसे पूछा कि वे ऐसी मशीनों के साथ शिष्टाचार क्यों दिखाते हैं, जो न इसकी सराहना करती हैं और न अपेक्षा रखती हैं तो कई लोगों ने मजाक में कहा कि वे भविष्य के ‘रोबोट अपराइजिंग’ की तैयारी कर रहे हैं। यह बहस तब मुख्यधारा में आ गई जब सोशल मीडिया पर ओपनएआई के सीईओ सैम ऑल्टमैन से पूछा गया कि यूजर्स द्वारा बार-बार ‘प्लीज’ और ‘थैंक यू’ लिखने के कारण उनकी कंपनी को कितना नुकसान हुआ? उनका यादगार जवाब था कि ‘क्या पता करोड़ों डॉलर अच्छी जगह खर्च हुए हों।’ फंडा यह है कि जिस शिष्टाचार को सिखाने में हमने कड़ी मेहनत की, उसे कभी-कभार हमारे बच्चे भूल भी जाएं तो चिंता न करें। हो सकता है वे एआई की दुनिया में खुद को ढाल रहे हों। और शायद किसी दिन वे छोटे विनम्र शब्द भी बना लें, जो बिजली और धरती- दोनों को बचाएं।



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