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बिलासपुर की गलियों में वर्षों से ‘बाल के बदले बर्तन’ देकर रोजी-रोटी कमाने वाले फेरीवालों के लिए 4 सितंबर की शाम एक खौफनाक मोड़ लेकर आई। दशकों से शहर में हर साल पुलिस वेरिफिकेशन कराने के बावजूद, संदेह के आधार पर 23 फेरीवालों को हिरासत में लेकर रायपुर स्थित डिटेंशन सेंटर भेज दिया गया। उन पर अवैध बांग्लादेशी होने का संदेह था। वहां से बिलासपुर पुलिस की विशेष जांच टीम पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद और जंगीपुर पहुंची। टीम ने वहां स्थानीय प्रशासन और पुलिस के सहयोग से संबंधित व्यक्तियों के मूल निवास, पारिवारिक पृष्ठभूमि, जमीन और पुश्तैनी रिकॉर्ड की गहन जांच की। उसमें भारतीय नागरिकता की पुष्टि होने के बाद 14 दिनों तक चले डर, अनिश्चितता और कानूनी पड़ताल के बाद आखिरकार 19 लोगों को भारतीय नागरिक मान लिया गया। वहां से रिहा कर सीधे उनके गृह जिले मुर्शिदाबाद भेज दिया गया। जब ये लोग पश्चिम बंगाल स्थित अपने पैतृक गांव पहुंचे, तो परिजनों की आंखें छलक पड़ीं। हालांकि, मुर्शिदाबाद के हीरानंदपुर गांव के शब्बीर शेख, लालटू शेख, नसीर शेख और सफीकुल शेख अब भी डिटेंशन सेंटर में हैं। इनके परिवारों का इंतजार अब भी जारी है। परिजनों का कहना है कि रोजी-रोटी के लिए लंबे समय तक राज्य से बाहर रहने के कारण पश्चिम बंगाल में एसआईआर सूची में इनके नाम नहीं मिल रहे हैं। अब परिवार स्थानीय पुलिस और कोर्ट से पुराने पारिवारिक रिकॉर्ड, वंशावली और अन्य दस्तावेज जुटाकर प्रशासन के सामने पेश करने में लगा है। बाल के बदले बर्तन… इसी से चलती है रोजी-रोटी
ये फेरीवाले घर-घर जाकर कटे और टूटे बाल इकट्ठा करते हैं और बदले में स्टील या प्लास्टिक के बर्तन देते हैं। उनके मुताबिक इकट्ठा किए गए बाल मुर्शिदाबाद के कारोबारियों तक पहुंचते हैं और वहां से आगे अंतरराष्ट्रीय बाजार में भेजे जाते हैं। प्रोसेसिंग के बाद इनसे विग, हेयर एक्सटेंशन और ब्यूटी इंडस्ट्री से जुड़े दूसरे उत्पाद तैयार होते हैं। अच्छी गुणवत्ता वाले लंबे और सीधे बालों की कीमत ज्यादा मिलती है।
वेरिफिकेशन और कार्रवाई दोनों अलग
अप्रवासी लोगों के लिए जारी एसओपी के तहत सभी 23 लोग संदिग्ध पाए गए थे, इसलिए उन्हें डिटेंशन सेंटर भेजा गया। जिनके मूल पते, गांव और स्थानीय लोगों से संबंध की पुष्टि हुई, उन्हें रिहा कर दिया गया। चार लोगों के दस्तावेजों में अभी कमी है, इसलिए उन्हें डिटेंशन सेंटर में रखा गया है। अन्य संदिग्ध लोगों की भी जांच चल रही है और कार्रवाई आगे भी जारी रहेगी।
-रजनेश सिंह, एसएसपी, बिलासपुर पीड़ा: बच्चे राह देखते रहे, परिवार कागज तलाशता रहा… 29 साल का ठिकाना: ठेकेदार जमीर हक पिछले 29 वर्षों से बिलासपुर के तोरवा और सिरगिट्टी इलाके में रहकर यह कारोबार चला रहे हैं। जमीर के मुताबिक, मुर्शिदाबाद के हीरानंदपुर, कुमारपाड़ा और रघुनाथगंज के लगभग 500 लोग समय-समय पर यहां फेरी लगाने आते हैं। हर साल थानों में वेरिफिकेशन कराने के बावजूद उनके बेटे जोसिन समेत 23 लोगों को संदिग्ध मान लिया गया। 100 साल पुराने रिकॉर्ड के बावजूद हिरासत: 17 साल से बिलासपुर में रह रहे असगर शेख के पास करीब 100 साल पुराने पारिवारिक दस्तावेज मौजूद थे। इसके बावजूद उन्हें डिटेंशन सेंटर के 14 दिन काटने पड़े, जहां से वे दस्तावेज सत्यापन के बाद ही छूट सके। दामाद को काम सिखाने लाए थे, अब रिहाई के लिए कोर्ट के चक्कर: मातिन शेख 18 साल से यहां फेरी लगा रहे हैं। हाल ही में उन्होंने अपनी बेटी की शादी के बाद दामाद लालटू शेख को काम सिखाने के लिए बिलासपुर बुलाया था ताकि वह परिवार का हाथ बंटा सके। पुलिस ने दोनों को हिरासत में लिया। मातिन के दस्तावेज पुख्ता निकले और वे रिहा हो गए, लेकिन लालटू अब भी डिटेंशन सेंटर में कैद हैं। लालटू के अलावा शब्बीर शेख, नसीर शेख और सफीकुल की रिहाई अटकी हुई है। अब तक परिवार पूरे दस्तावेज जुटा नहीं पाया हैं। 500 लोगों का सत्यापन कर रही पुलिस एसएसपी रजनेश सिंह के निर्देश पर एएसपी रश्मित कौर चावला के नेतृत्व में सात इंस्पेक्टरों की स्पेशल टास्क फोर्स सत्यापन अभियान चला रही है। पुलिस के मुताबिक शहर में करीब 500 लोगों की पहचान, दस्तावेज और मूल निवास का सत्यापन किया जा रहा है।
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घर में ही विदेशी होने के शक ने दिया दर्द…:14 दिन में पहचान साबित, घर लौटे तो छलक पड़े आंसू
