![]()
राजस्थान के 309 निकायों में पार्षदों की जीत-हार तय होने के बाद जोड़-तोड़ का ‘खेला’ शुरू हो चुका है। बोर्ड किसका बनेगा और मेयर या चेयरमैन की कुर्सी पर कौन बैठेगा- इसकी रणनीति बेंगलुरु, हिमाचल या किसी अनजान फाइव-स्टार रिसॉर्ट में तय हो रही है। सियासी भाषा में इसे ‘बाड़ेबंदी’ या ‘रिसॉर्ट पॉलिटिक्स’ कहते हैं। जीते हुए पार्षदों को रातों-रात लग्जरी बसों में भरकर किसी दूसरे जिलों या राज्य के महंगे रिसॉर्ट में ‘कैद’ कर दिया जाए, तो आम जनता के मन में सवाल उठना लाजमी है। बाड़ेबंदी क्या सिर्फ घूमने-फिरने का प्रोग्राम है या इसके पीछे कोई बड़ा सियासी खेल चलता है? आखिर निकाय चुनाव में भी पार्षदों को लेकर इतनी सतर्कता-शक क्यों? ऐसे ही सवालों के जवाब जानेंगे आज के राजस्थान एक्सप्लेनर में… सबसे पहले- बाड़ेबंदी की एक तस्वीर सवाल-1: जब जनता ने पार्षद चुन दिए, फिर बाड़ेबंदी की जरूरत क्यों पड़ रही है? जवाब: इसका जवाब बिल्कुल सीधा है- क्योंकि पार्षदों का चुनाव खत्म हुआ है, लेकिन निकाय की सत्ता का पूरा फैसला अभी बाकी है। किस पार्टी के पास कितने पार्षद हैं, इससे बोर्ड बनने की तस्वीर बनती है। लेकिन जहां किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, वहां कुछ सीटों का अंतर पूरा राजनीतिक समीकरण बदल सकता है। 309 निकायों के 10,244 पार्षद पदों के लिए चुनाव हुए। उपलब्ध परिणामों में भाजपा सबसे ज्यादा निकायों में सबसे बड़ी पार्टी रही। कांग्रेस भी बड़ी संख्या में निकायों में आगे रही और निर्दलीय भी अच्छी-खासी सीटें हासिल करने में कामयाब रहे। यही वजह है कि अब पार्टियों का ध्यान अब सिर्फ अपने जीते हुए पार्षदों पर नहीं, बल्कि निर्दलीय, अपनी ही पार्टी के ‘बागी’ और दूसरे दलों के उन पार्षदों पर है, जिनकी जरूरत बोर्ड बनाने के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है। सवाल-2: बाड़ेबंदी के पीछे असली डर क्या है- क्रॉस वोटिंग या पाला बदलना?
जवाब: दोनों बातें अलग-अलग हैं। क्रॉस वोटिंग में पार्षद पार्टी के उम्मीदवार के बजाय किसी दूसरे उम्मीदवार को वोट कर सकता है। पाला बदलने की स्थिति तब बनती है, जब कोई निर्दलीय या अन्य दल का पार्षद किसी दूसरे खेमे को समर्थन दे देता है। इसीलिए चुनाव के बाद पार्टियां अपने जीते हुए पार्षदों को एकजुट रखने की कोशिश करती हैं। यानी बाड़ेबंदी का मूल गणित है- बहुमत के लिए जरूरी पार्षदों का वोटिंग तक साथ, जिनके भरोसे बोर्ड बनेगा। वरिष्ठ पत्रकार महेश शर्मा का कहना है कि- बाड़ेबंदी लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर कर रही है। मौजूदा राजनैतिक परिस्थितियों में अवसरवाद हावी हो रहा है। पार्टियों के प्रति निष्ठा का भाव कम हो रहा है। राजनैतिक दलों को भी चाहिए कि वे इस अविश्वास को कम करे और अपने कर्मठ, योग्य व उसकी छवि और काम के आधार पर कार्यकर्ता को आगे बढ़ाएं। सवाल-3: अजमेर के 37 पार्षदों को बेंगलुरु क्यों भेजा गया?
जवाब: अजमेर नगर निगम में 80 वार्ड हैं। परिणाम में कांग्रेस के 37, भाजपा के 32 और 11 निर्दलीय पार्षद जीते हैं। इसी बीच कांग्रेस के 37 पार्षदों को बेंगलुरु भेजे जाने की जानकारी सामने आई है। कांग्रेस के साथ दो निर्दलीय पार्षदों के भी जाने की बात सामने आ रही है। भाजपा ने भी अपने पार्षदों को सीकर में पास एक रिसॉर्ट में रखा है। यहां एक दिलचस्प बात है- 32 भाजपा और 37 कांग्रेस के बीच सिर्फ 5 पार्षदों का अंतर है। जबकि 11 निर्दलीय हैं। इसलिए मेयर के चुनाव में सिर्फ दो प्रमुख दलों की संख्या देखना पर्याप्त नहीं होगा। सवाल-4: क्या निर्दलीय पार्षदों की बड़ी संख्या की वजह से बाड़ेबंदी और महत्वपूर्ण हुई?
जवाब: कई निकायों में हां, क्योंकि परिणामों में निर्दलीयों की संख्या काफी बड़ी है। 2026 के निकाय परिणाम के आंकड़ों के अनुसार 10,244 वार्डों में भाजपा ने 4,182, कांग्रेस ने 3,619 और निर्दलीयों ने 2,273 सीटें जीती हैं। जहां किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत है, वहां निर्दलीयों की भूमिका सीमित हो सकती है। लेकिन त्रिशंकु बोर्ड में एक-दो या कुछ निर्दलीय पार्षद ही बहुमत का अंतर पूरा कर सकते हैं। इसीलिए अब सिर्फ ‘किस पार्टी ने कितने वार्ड जीते?’ सवाल नहीं है। किसके पास बोर्ड बनाने लायक संख्या है और वह संख्या मतदान तक एकजुट रहती है या नहीं? सवाल-5: क्या बाड़ेबंदी सिर्फ मेयर-सभापति के चुनाव तक रहेगी?
जवाब: हां। इसका मकसद मेयर-सभापति चुनाव तक पार्षदों को साथ रखना है। वोटिंग 21 सितंबर को होनी है। जयपुर, जोधपुर और कोटा नगर निगम में मेयर-डिप्टी मेयर चुनाव की तारीख भी तय हो चुकी है। यहां 25 सितंबर को मेयर और 26 सितंबर को डिप्टी मेयर का चुनाव होगा। कोटा की सुकेत नगर पालिका में भी अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव इन्हीं तारीखों पर होंगे। सवाल-6: क्या हारा हुआ पार्षद भी निकाय प्रमुख बन सकता है?
जवाब: हां, मौजूदा नियमों के तहत मेयर/सभापति/अध्यक्ष पद के लिए निर्वाचित पार्षद होना अनिवार्य नहीं है। इसलिए कोई व्यक्ति पार्षद चुनाव हारने के बावजूद संबंधित पद के लिए चुनाव लड़ सकता है, यदि वह बाकी कानूनी पात्रताएं पूरी करता है। यानी एक तरफ जीते हुए पार्षदों की बाड़ेबंदी चल रही है और दूसरी तरफ कुछ जगह हारे हुए उम्मीदवार या बिना पार्षद का चुनाव लड़े भी हाइब्रिड उम्मीदवार के रूप में अध्यक्ष/सभापति की रेस में लौट आए हैं। इससे पूरा समीकरण दो स्तरों पर बन रहा है- वार्ड का चुनाव जनता ने तय किया, लेकिन मेयर/चेयरमैन की कुर्सी का फैसला निर्वाचित पार्षद करेंगे। सवाल – 7: पार्षदों की जीत का जश्न फीका क्यों पड़ गया?
जवाब: आमतौर पर चुनाव जीतते ही पार्षदों के घर-गली में ढोल-नगाड़े बजते हैं, समर्थक जुलूस निकालते हैं और जीत का जश्न शुरू हो जाता है। लेकिन इस बार पहली बात तो जुलूस पर रोक थी। दूसरा- जीत का जश्न शुरू होने से पहले ही पार्टियों ने अपने पार्षदों को बाड़ेबंदी में ‘कवर’ कर लिया। नतीजे आते ही होटल-रिसॉर्ट की राजनीति शुरू हो गई।
Source link
जीतते ही 'लापता' हुए आपके पार्षद!:चुनाव निकाय के और बाड़ेबंदी कर्नाटक-हरियाणा में, 7 सवालों में जानिए- क्या है रिसॉर्ट पॉलिटिक्स
