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किसी दोस्त को डिनर पर बुलाया। जवाब मिला- ‘यार! अभी व्यस्त हूं।’ पर, उसने कोई दूसरी तारीख नहीं सुझाई। आपने दो दोस्तों की पहचान करवाई और कुछ समय बाद वे आपके बिना मिलने लगे। या, हर बार मिलने का प्लान, फोन और मैसेज आप ही करते हैं। दोस्ती में अक्सर ऐसी बातें चुभती हैं। सवाल उठता है- क्या हम दोस्ती से ज्यादा उम्मीद कर रहे हैं? जवाब इतना सीधा नहीं। आज ‘जल्द मिलते हैं’ कहना और फिर प्लान न बनाना आम है। टेक्नोलॉजी ने हमें संपर्क में तो रखा, पर दोस्ती निभाने की जिम्मेदारियां धुंधली कर दीं। सिल्वर हिल अस्पताल के मनोचिकित्सक डॉ. जेफ कैट्जमैन कहते हैं, किसी को मिलने के लिए बुलाना सिर्फ तारीख और जगह तय करना नहीं है। इसके पीछे सवाल होता है- ‘मैं तुम्हारे साथ समय बिताना चाहता हूं, क्या तुम भी चाहते हो?’ जवाब अस्पष्ट हो तो खाली जगह को दिमाग खुद भरता है- ‘उसे मेरी परवाह नहीं’। जवाब न मिलना सबको एक जैसा नहीं चुभता – जिन लोगों ने पहले अस्वीकृति या उपेक्षा झेली है, वे अनुत्तरित निमंत्रण को ज्यादा नकारात्मक तरीके से देख सकते हैं। कैट्जमैन कहते हैं, हम दूसरों के मन की बात उनके बहुत छोटे व्यवहार से समझने की कोशिश करते हैं। वे दोस्ती की तुलना इम्प्रोवाइजेशन थिएटर से करते हैं। एक व्यक्ति पहल करता है, दूसरा जवाब देता है। कोई ज्यादा बार मिलने का प्लान बना सकता है, दूसरा आपकी जिंदगी में ज्यादा रुचि दिखा सकता है। बच्चों, बीमारी, दुख या काम के दबाव में एक दोस्त कुछ ज्यादा कोशिश कर सकता है। लंबे समय में किसी न किसी रूप में दोनों तरफ से रिश्ता निभाने का संकेत मिलना चाहिए। कोशिश रोक दें तो क्या होगा? – कैट्जमैन कहते हैं, खुद से पूछें- ‘मैं सारी मेहनत बंद कर दूं तो क्या दोस्ती बचेगी?’ मजबूत दोस्ती टेनिस जैसी है- गेंद कभी एक से छूट सकती है, लेकिन दूसरा उठाकर खेल फिर शुरू कर देता है। पूर्व अमेरिकी सर्जन जनरल डॉ. विवेक मूर्ति कहते हैं कि हर दोस्त को समान समय देना संभव नहीं। रिश्तों के अलग-अलग घेरे होते हैं- सबसे भीतर करीबी दोस्त, फिर दोस्त-सहयोगी और बाहर परिचित-सहकर्मी। संभव है कि कोई आपको महत्व देता हो, लेकिन उस दौर में उसके पास आपको सबसे करीबी घेरे में रखने की गुंजाइश न हो। अच्छी दोस्ती का अर्थ हर निमंत्रण पर ‘हां’ नहीं, बल्कि समय के साथ रिश्ते को ‘हां’ कहते रहना है। करीबी दोस्त बनने में 200 घंटे से ज्यादा लग सकते हैं ‘जर्नल ऑफ सोशल एंड पर्सनल रिलेशनशिप्स’ में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक किसी परिचित से सामान्य दोस्त बनने तक करीब 50 घंटे साथ बिताने पड़ते हैं। अगले स्तर की दोस्ती के लिए करीब 90 घंटे और करीबी दोस्त बनने के लिए 200 घंटे से ज्यादा समय का साथ चाहिए। यानी वयस्क जीवन में दोस्ती अपने आप नहीं बनती। इसे तैयार करने के लिए समय लगाना पड़ता है।
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डिजिटल दौर में दोस्ती का संकट; मैसेज होते हैं,मुलाकात नहीं:एक्सपर्ट बोले- दोस्ती में हिसाब नहीं, पर दोनों तरफ से कोशिश जरूरी
