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पंजाब CM और मुलाजिम यूनियन की मीटिंग कैंसल क्यों हुई:16 नेता पहुंचे, चाय परोसी; CM की कुर्सी खाली रही, एक VIDEO की शर्त पर बिगड़ा मामला




पंजाब की आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार का बुलावा आया। 16 कर्मचारी नेता तय समय से पहले जालंधर में PAP पहुंच चुके थे। सिक्योरिटी चेकिंग के बाद सभी को स्पेशल रूम में बैठाया गया। टेबल पर चाय भी आ चुकी थी। इंतजार था तो सिर्फ मुख्यमंत्री भगवंत मान का। लेकिन गुरूवार दोपहर 1 बजे यानी मीटिंग के वक्त बीतता चला गया और CM की कुर्सी खाली रही और कुछ ही देर में पूरी बैठक कैंसल हो गई। यह मामला पंजाब के 7 लाख मुलाजिमों व पेंशनर्स का बकाया DA समेत 8 मांगों से जुड़ा था। ऐसा क्या हुआ कि मीटिंग शुरू होने से ठीक पहले पूरा माहौल बदल गया? किस बात पर सरकार और कर्मचारी नेता आमने-सामने आ गए? और VIDEO की वह कौन-सी शर्त थी, जिसे मानने से नेताओं ने इनकार कर दिया? मीटिंग कैंसल होने से पहले क्या-क्या हुआ, पढ़िए पूरी इनसाइड स्टोरी… चंडीगढ़ की जगह जालंधर बुलाया
सांझा मुलाजिम मंच के कनवीनर जरमनजीत सिंह ने बताया कि चंडीगढ़ रैली के बाद सरकार ने सीएम के साथ बैठक का समय 27 अगस्त को पंजाब भवन, चंडीगढ़ तय किया था। कर्मचारी नेता चंडीगढ़ जाने की तैयारी में थे, लेकिन ऐन वक्त पर सरकार ने लेटर जारी कर मीटिंग की जगह बदलकर जालंधर PAP कर दी। एक घंटा पहले पहुंचे कर्मचारी नेता, टेबल पर आई चाय
सरकारी निर्देश के बाद 16 प्रमुख कर्मचारी नेता जालंधर पहुंचे। चीफ सेक्रेटरी दफ्तर की ओर से एंट्री पास जारी किए गए। दोपहर 12 बजे नेताओं को PAP के अंदर एक स्पेशल रूम में बैठाया गया। चाय-पानी का दौर चला। कर्मचारी नेताओं को उम्मीद थी कि मुख्यमंत्री के साथ बैठक में उनकी मांगों का कोई समाधान निकलेगा। मीटिंग से 10 मिनट पहले CM का सख्त ट्वीट
मीटिंग का समय दोपहर 1 बजे तय था। दोपहर 12 बजे तक सब सामान्य था। इसके बाद अचानक मुख्यमंत्री भगवंत मान का एक सख्त ट्वीट आया। इसमें कहा गया कि हड़ताल और मीटिंग एक साथ नहीं हो सकती। पहले हड़ताल खत्म करो। ट्वीट सामने आते ही कमरे में बैठे कर्मचारी नेता हैरान रह गए। नेताओं का कहना था कि अगर यही शर्त थी तो पहले क्यों नहीं बताई गई? उन्हें अंदर बैठाने के बाद इस तरह की शर्त रखने का क्या मतलब था?। अफसर ने रखा वीडियो रिकॉर्ड करने का ऑफर
सीएम के ट्वीट के तुरंत बाद एक सीनियर अफसर कमरे में पहुंचे। उन्होंने कर्मचारी नेताओं के सामने प्रस्ताव रखा कि मुख्यमंत्री मीटिंग के लिए पूरी तरह तैयार हैं। बस कर्मचारी नेता सोशल मीडिया के लिए एक छोटा सा वीडियो रिकॉर्ड कर जारी कर दें कि हड़ताल खत्म है। इसके बाद मुख्यमंत्री तुरंत कमरे में आ जाएंगे। कर्मचारी नेताओं ने इस पर साफ मना कर दिया। उनका कहना था कि बिना मांगें माने या बिना किसी लिखित आश्वासन के वीडियो जारी करने का कोई मतलब नहीं है। नेताओं ने यह भी तर्क दिया कि हड़ताल वैसे भी शाम 4 बजे खत्म हो रही है, ऐसे में उससे पहले हड़ताल खत्म होने का वीडियो जारी करना उचित नहीं है। वीडियो पर बात नहीं बनी, CM ने मीटिंग कैंसल कर दी
अफसर ने कर्मचारी नेताओं का जवाब मुख्यमंत्री तक पहुंचाया। इसके बाद मुख्यमंत्री ने बैठक आधिकारिक तौर पर रद्द कर दी। कर्मचारी नेताओं का आरोप है कि सरकार पब्लिक में अपनी सख्त छवि दिखाना चाहती थी। उनका कहना है कि जब यह दांव उल्टा पड़ा तो सरकार ने हड़ताली कर्मचारियों पर कार्रवाई का लेटर जारी कर दिया। सरकार के रुख पर मुलाजिम नेताओं की 2 अहम बातें… एक्सपर्ट बोले- 25-30 लाख वोटों पर असर, विपक्ष को मुद्दा मिला सरकार के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी को हवा
पॉलिटिकल एक्सपर्ट पवनदीप शर्मा का कहना है कि 7 लाख कर्मचारी अपने परिवारों के साथ मिलकर 25 से 30 लाख वोटों का मजबूत ‘माउथ-टू-माउथ’ इन्फ्लुएंसिंग वोट बैंक बनाते हैं। कर्मचारियों में असंतोष का सीधा असर चुनाव परिणामों पर पड़ता है, क्योंकि सरकारी कर्मचारी गांव और शहरों में ओपिनियन बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं। जब कर्मचारी महाहड़ताल पर जाते हैं तो तहसील, अस्पताल, बिजली और परिवहन जैसी सार्वजनिक सेवाएं ठप हो जाती हैं। इससे आम नागरिक परेशान होते हैं। जनता की यह नाराजगी सीधे तौर पर सत्तारूढ़ दल के खिलाफ एंटी-इंकंबेंसी को हवा देती है। सरकार के कन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट पर सवाल
पॉलिटिकल एक्सपर्ट प्रमोद बातिश का कहना है कि सरकार और कर्मचारियों का यह टकराव विपक्षी दलों—कांग्रेस, बीजेपी और अकाली दल—को बैठे-बिठाए एक बड़ा मुद्दा दे देता है। विपक्ष कर्मचारियों की मांगों जैसे ओल्ड पेंशन स्कीम, पे-कमीशन और पक्के करने के मुद्दे को अपने चुनावी एजेंडे में शामिल कर सरकार को ‘जन-विरोधी’ साबित करने की पूरी कोशिश करेगा। बार-बार हड़ताल होना और वार्ता रद्द होना सरकार की ‘गवर्नेंस डिलीवरी’ और ‘कन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट’ पर सवालिया निशान लगाता है। इससे यह संदेश जाता है कि सरकार अपने ही प्रशासनिक तंत्र को संभालने में असमर्थ है, जिससे पार्टी का राजनीतिक नैरेटिव कमजोर होता है।



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