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पानीपत में इलाज छिपाकर बीमा लेने का आरोप:पत्नी की मौत के बाद उपभोक्ता आयोग ने 3 लाख का क्लेम किया खारिज




पानीपत जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एलआईसी से 3 लाख रुपये के बीमा क्लेम से जुड़े मामले में शिकायतकर्ता की याचिका खारिज कर दी। आयोग ने माना कि बीमा पॉलिसी लेते समय बीमित महिला ने अपने पूर्व इलाज और बीमारी से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी प्रस्ताव फॉर्म में नहीं बताई थी। ये फैसला जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के अध्यक्ष डॉ. आरके डोगरा, सदस्य डॉ. रेखा चौधरी और विनीत कौशिक की पीठ ने सुनाया। मामले के अनुसार, पानीपत के जाटल रोड निवासी चिराग ने अपनी पत्नी डिंपी के नाम से एलआईसी की इंडेक्स प्लस-873 योजना के तहत 12 सितंबर 2024 को पॉलिसी ली थी। पॉलिसी की बीमित राशि 3 लाख रुपये थी। पॉलिसी शुरू होने के महज 26 दिन बाद 8 अक्टूबर 2024 को डिंपी की मौत हो गई। इसके बाद चिराग ने एलआईसी को सूचना देकर जरूरी दस्तावेज जमा कराए और बीमा राशि जारी करने की मांग की। कई बार अनुरोध के बाद भी भुगतान नहीं हुआ तो उन्होंने 3 अप्रैल 2025 को कानूनी नोटिस भेजा। इसके बाद उपभोक्ता आयोग में शिकायत दायर कर 3 लाख रुपये की बीमा राशि, 18 प्रतिशत वार्षिक ब्याज, 50 हजार रुपये मुआवजा और 22 हजार रुपये मुकदमा खर्च की मांग की। एलआईसी ने क्लेम क्यों खारिज किया: एलआईसी ने आयोग में बताया कि पॉलिसी लेने के समय डिंपी ने अपने स्वास्थ्य और पूर्व इलाज से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी छिपाई थी। जांच में सामने आया कि वह 28 अगस्त से 31 अगस्त 2024 तक अस्पताल में भर्ती रही थी। रिकॉर्ड के अनुसार उसे उल्टी, सिरदर्द, खांसी, पेट दर्द, तेज बुखार और हेपेटाइटिस जैसी समस्याओं के इलाज के लिए भर्ती किया गया था। इसके बावजूद 12 सितंबर को पॉलिसी लेते समय प्रस्ताव फॉर्म में उसने संबंधित बीमारियों और अस्पताल में भर्ती होने से जुड़े सवालों का जवाब नहीं दिया तथा अपनी स्वास्थ्य स्थिति को अच्छी बताया। छह को कराया भर्ती दो दिन बाद मौत एलआईसी के अनुसार, डिंपी को इसके बाद गंभीर हालत में 6 अक्टूबर 2024 को दोबारा अस्पताल में भर्ती कराया गया और 8 अक्टूबर को उसकी मौत हो गई। बीमा कंपनी ने जांच के आधार पर दावा निरस्त कर दिया और कहा कि पॉलिसी लेते समय बीमारी व पूर्व अस्पताल में भर्ती होने की जानकारी छिपाई गई थी। आयोग ने क्या कहा: आयोग ने दोनों पक्षों के दस्तावेज और दलीलें देखने के बाद माना कि पॉलिसी लेने से महज 12 दिन पहले डिंपी का इलाज हुआ था, लेकिन प्रस्ताव फॉर्म में उसने अस्पताल में भर्ती होने और संबंधित बीमारियों से इनकार किया था। आयोग ने इसे महत्वपूर्ण तथ्य छिपाना माना। आदेश में कहा गया कि एलआईसी ने दस्तावेजी रिकॉर्ड के माध्यम से इस तथ्य को साबित किया है। आयोग ने शिकायतकर्ता के पक्ष में दावा साबित नहीं होने पर शिकायत खारिज कर दी। अंतिम आदेश में कहा गया कि शिकायत मेंटेनेबल नहीं है और इसे बिना किसी लागत के आदेश के साथ खारिज किया जाता है।



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