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सीलिंग जमीन को लेकर चल रहे विवाद में इंदौर जिला प्रशासन को हाई कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। हातोद तहसील के सोनगीर क्षेत्र की कुछ जमीनों को सरकारी सीलिंग जमीन बताकर कॉलोनियों की विकास मंजूरी रोकने के प्रशासनिक फैसले को हाई कोर्ट ने गलत और मनमाना माना है। मामला करीब 1500 करोड़ रुपए की प्रस्तावित कॉलोनियों से जुड़ा बताया जा रहा है। विवाद के चलते भाजपा नेता नीलेश चौधरी और उनके परिवार की स्वास्तिक ग्रांड कॉलोनी की पहले से दी गई विकास मंजूरी निरस्त कर दी गई थी। वहीं मेहुल पिता नवीन मेहता की ल्यूमिनियस कॉरिडोर कॉलोनी को भी विकास मंजूरी देने से इनकार कर दिया गया था। स्वास्तिक ग्रांड मामले में चौधरी ने संभागायुक्त न्यायालय से स्टे लिया, जबकि ल्यूमिनियस कॉरिडोर ने हाईकोर्ट का रुख किया। जून 2026 में विकास मंजूरी के आवेदन से खुला मामला ल्यूमिनियस कॉरिडोर की ओर से जून 2026 में कॉलोनी की विकास मंजूरी के लिए आवेदन किया गया था। जांच के दौरान सामने आया कि आवेदन में शामिल कुछ सर्वे नंबर वर्ष 2006 से 2010 के बीच सीलिंग में दर्ज होकर सरकारी जमीन के रूप में दर्ज थे। कॉलोनाइजर और जमीन मालिकों का कहना था कि इन जमीनों को 8 दिसंबर 2010 के आदेश से सीलिंग से मुक्त कर निजी भूमि के रूप में दर्ज किया जा चुका है। इसके समर्थन में एसडीओ के आदेश का भी हवाला दिया गया। हालांकि जिला प्रशासन की जांच में 8 दिसंबर 2010 का यह आदेश रिकॉर्ड में नहीं मिला। अधिकारियों को न तो संबंधित आदेश मिला और न ही रजिस्टर में उसकी एंट्री मिली। इसके बाद ल्यूमिनियस कॉरिडोर की विकास मंजूरी का आवेदन निरस्त कर दिया गया। इसी सर्वे नंबर के आधार पर पहले से स्वीकृत स्वास्तिक ग्रांड कॉलोनी की विकास मंजूरी भी निरस्त कर दी गई। ल्यूमिनियस कॉरिडोर की ओर से हाईकोर्ट में दायर याचिका में मध्यप्रदेश सरकार, अपर कलेक्टर कॉलोनी सेल और संयुक्त कलेक्टर कॉलोनी सेल को पक्षकार बनाया गया। कॉलोनाइजर की ओर से तर्क दिया गया कि जमीन से जुड़ी सीलिंग कार्रवाई को बोर्ड ऑफ रेवेन्यू ने जून 2004 में ही रद्द कर दिया था। इसके बाद प्रशासन ने इस फैसले के खिलाफ कोई अपील नहीं की। याचिकाकर्ता ने कहा कि जमीन वैध तरीके से खरीदी गई। इसके बाद नामांतरण, डायवर्सन और टीएंडसीपी से संबंधित मंजूरियां भी ली गईं। इन प्रक्रियाओं के दौरान किसी अधिकारी ने जमीन को सरकारी या सीलिंग जमीन बताते हुए आपत्ति नहीं की। याचिका में कहा गया कि अब वर्ष 2010 के ऐसे आदेश का रिकॉर्ड नहीं मिलने के आधार पर विकास मंजूरी रोकना उचित नहीं है। प्रशासन ने कहा- 151 एकड़ जमीन सीलिंग में गई थी जिला प्रशासन की ओर से कोर्ट में बताया गया कि जमीन पर सीलिंग एक्ट के तहत 1976 में कार्रवाई की गई थी। उस समय जमीन के मालिक हिंदू सिंह थे। प्रशासन के अनुसार उन्हें 81 एकड़ जमीन रखने की पात्रता थी, जबकि करीब 151 एकड़ जमीन सीलिंग में घोषित की गई थी। प्रशासन ने वर्ष 1982, 1984 और 1988 में हुई कार्रवाई का भी हवाला दिया। उसके अनुसार बोर्ड ऑफ रेवेन्यू ने वर्ष 2003 में हिंदू सिंह की याचिका खारिज कर दी थी। हालांकि जून 2004 में बोर्ड ऑफ रेवेन्यू ने उनके उत्तराधिकारियों की याचिका स्वीकार करते हुए सीलिंग कार्रवाई रद्द कर दी थी। प्रशासन का तर्क था कि इस आदेश से 151 एकड़ जमीन को राहत नहीं मिली थी, इसलिए बाद की कार्रवाई सही थी। हाईकोर्ट ने कहा- 2004 के बाद प्रशासन ने कोई अपील नहीं की मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने प्रशासन की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि वर्ष 2004 के फैसले के बाद प्रशासन ने उसके खिलाफ कोई अपील नहीं की और न ही सीलिंग की कार्रवाई आगे बढ़ाई। कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल वर्ष 2006 से 2010 के राजस्व रिकॉर्ड और उसमें दर्ज एक एंट्री के आधार पर बाद में मनमाना फैसला नहीं लिया जा सकता। कोर्ट के सामने यह तथ्य भी रखा गया कि सितंबर 2025 में नामांतरण के आदेश में तहसीलदार ने स्वयं रिकॉर्ड के आधार पर जमीन को सरकारी नहीं पाया था। भारी निवेश के बाद मंजूरी रोकना उचित नहीं 8 सितंबर को जारी आदेश में हाई कोर्ट ने माना कि जब जमीन की खरीद वैध तरीके से हुई, नामांतरण और डायवर्सन सहित अन्य प्रक्रियाएं पूरी हुईं और संबंधित अधिकारियों ने उस समय कोई आपत्ति नहीं उठाई, तो बाद में पुराने आदेश के रिकॉर्ड में नहीं मिलने के आधार पर विकास मंजूरी रोकना उचित नहीं है। कोर्ट ने प्रशासन की कार्रवाई को मनमाना, गैर-कानूनी और अनुचित माना और याचिकाकर्ता की मांगों को स्वीकार करते हुए रिट याचिकाओं का निराकरण किया।
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प्रशासन को 1500 करोड़ की कॉलोनियों के मामले में झटका:सीलिंग जमीन के आधार पर विकास मंजूरी रोकी थी, हाईकोर्ट ने कार्रवाई को बताया मनमाना
