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प्रेत योनि में भटकने वालों को यहां मिलती है मुक्ति:स्कंद पुराण में नारायणी शिला का खास महत्व, श्राद्ध के लिए विदेश से पहुंचते हैं लोग




आज से श्राद्ध पक्ष शुरू हो रहा है। इसके साथ ही धर्मनगरी हरिद्वार में गंगा घाटों से लेकर नारायणी शिला तक पितरों के निमित्त होने वाले कर्मकांड शुरू हो जाएंगे। देश-दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले लोग अपने दिवंगत पूर्वजों का स्मरण करने, तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म के लिए हरिद्वार पहुंचते हैं। खासतौर पर नारायणी शिला पर इन दिनों श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है। हिंदू धर्म की मान्यताओं में श्राद्ध पक्ष को पितरों के स्मरण और उनके निमित्त कर्म करने की अवधि माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि इस दौरान किए गए तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध से पितरों की तृप्ति होती है। इसी आस्था के कारण हरिद्वार के गंगा घाटों पर भी पितृ तर्पण करने वालों की संख्या बढ़ती है। हरिद्वार की नारायणी शिला को पितृ कर्म के प्रमुख तीर्थों में माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं में बद्रीनाथ, नारायणी शिला और गया का विशेष महत्व बताया गया है। नारायणी शिला पर पितरों के निमित्त विधि-विधान से कर्म करने से उन्हें मोक्ष मिलने और पितृ लोक की प्राप्ति होने की मान्यता है। इसी विश्वास के चलते श्राद्ध पक्ष में देश के अलग-अलग राज्यों के साथ विदेशों से भी लोग यहां पहुंचते हैं। पितृ पक्ष में सूर्य के कन्या राशि में आने की मान्यता पुराणों में वर्णित मान्यताओं के अनुसार सूर्य के कन्या राशि में प्रवेश करने पर पितृ पक्ष की शुरुआत मानी जाती है। धार्मिक विश्वास है कि इस अवधि में पितृलोक पृथ्वी के सबसे करीब होता है और पितर अपने परिजनों के घर आते हैं। इसी वजह से इन दिनों किए जाने वाले श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान को विशेष महत्व दिया जाता है। नारायणी शिला के प्रबंधक मनोज त्रिपाठी कहते हैं- पूर्वज शरीर छोड़ने के बाद पितृ माने जाते हैं। पितृ पक्ष में उनके प्रति श्रद्धा और स्मरण की भावना से किए जाने वाले कर्म को श्राद्ध कहा जाता है। इस अवधि में पितरों के निमित्त श्रद्धा से किए गए कर्म का धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व माना गया है। गंगा स्नान के बाद पितरों के नाम तर्पण और पिंडदान श्राद्ध पक्ष में हरिद्वार आने वाले श्रद्धालु पहले गंगा स्नान करते हैं। इसके बाद पितरों के निमित्त तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म कराया जाता है। हर की पैड़ी सहित शहर के अलग-अलग गंगा घाटों पर भी तर्पण किया जाता है, जबकि नारायणी शिला पर विशेष रूप से पितृ कर्म कराने वालों की संख्या बढ़ती है। धार्मिक मान्यता है कि पितरों के प्रसन्न रहने से परिवार में सुख-शांति, समृद्धि और खुशहाली बनी रहती है। नारायणी शिला पर सालभर श्रद्धालु आते हैं, लेकिन अमावस्या और श्राद्ध पक्ष के दौरान यहां विशेष भीड़ रहती है। नारायणी शिला को भगवान हरिनारायण का हृदय स्थल मानते हैं नारायणी शिला से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं में इसे भगवान हरिनारायण का हृदय स्थल माना गया है। यहां पितरों के निमित्त श्राद्ध और तर्पण करने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। मान्यता है कि इस सिद्ध क्षेत्र में किए गए पितृ कर्म से पितरों की तृप्ति और मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। धार्मिक विश्वास यह भी है कि अगर कोई पितृ अधोगति में चला गया हो तो नारायणी शिला पर उसके निमित्त विधि-विधान से कर्म करने से उसे पितृ लोक की प्राप्ति होती है। इसी कारण नारायणी शिला को पितृ कर्म के प्रमुख सिद्ध क्षेत्रों में गिना जाता है। पौराणिक ग्रंथों में भी मिलता है महत्व नारायणी शिला से जुड़ी मान्यताओं का उल्लेख प्राचीन धार्मिक ग्रंथों से भी जोड़ा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार स्कंद पुराण के केदार खंड में नारायणी शिला के महत्व का वर्णन है। यहां श्रद्धा से पितृ कर्म करने पर कई पीढ़ियों के पितरों के उद्धार की मान्यता बताई जाती है। वहीं वायु पुराण से जुड़ी मान्यताओं में नारायणी शिला को भगवान विष्णु के स्वरूप से जोड़ा गया है। धार्मिक विश्वास है कि यहां भगवान विष्णु का वास है। इसी वजह से यहां पितरों के निमित्त किए जाने वाले कर्म को विशेष फलदायी माना जाता है। गयाजी के बाद नारायणी शिला में कर्म की पूर्णता की मान्यता पितृ कर्म के लिए बिहार के गया जी का भी विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु वहां पिंडदान करते हैं। वहीं नारायणी शिला को लेकर मान्यता है कि यहां पितरों के निमित्त किए जाने वाले कर्म से उनकी पूर्णता होती है। धार्मिक मान्यता में पितरों के लिए केवल मोक्ष ही नहीं, बल्कि पितृ लोक में स्थान मिलना भी महत्वपूर्ण माना गया है। इसलिए नारायणी शिला को पितृ कर्म के प्रमुख सिद्ध क्षेत्रों में शामिल किया जाता है। अपनी-अपनी तिथि पर पितरों का श्राद्ध श्राद्ध पक्ष का हर दिन पितरों के निमित्त कर्म के लिए फलदायी माना जाता है। लोग अपनी सुविधा और परिवार की परंपरा के अनुसार अलग-अलग तिथियों पर यहां पहुंचते हैं। पितरों के लिए तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म कराया जाता है। अमावस्या के दिन भी नारायणी शिला पर विशेष भीड़ रहती है। इस दौरान देश के विभिन्न हिस्सों से लोग अपने पूर्वजों के निमित्त कर्म कराने हरिद्वार पहुंचते हैं। देश से लेकर विदेश तक फैली है आस्था नारायणी शिला की धार्मिक मान्यता केवल देश तक सीमित नहीं है। विदेशों में रहने वाले भारतीय परिवार भी अपने पूर्वजों के निमित्त यहां श्राद्ध कर्म कराने पहुंचते हैं। कई परिवार खुद हरिद्वार आते हैं, जबकि कुछ स्थानीय पुरोहितों के माध्यम से धार्मिक कर्मकांड करवाते हैं। इसलिए पितृ पक्ष के दौरान नारायणी शिला पर होने वाली गतिविधियां हरिद्वार की धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाती हैं। पितृ दोष की मान्यता में भी कराते हैं पिंडदान नारायणी शिला के प्रबंधक मनोज त्रिपाठी के अनुसार, जिन लोगों को पितृ दोष से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं के कारण परेशानी महसूस होती है, वे भी श्राद्ध पक्ष में यहां पिंडदान और पितृ कर्म कराने पहुंचते हैं। धार्मिक विश्वास के अनुसार नारायणी शिला पर पितरों के निमित्त किए गए कर्म से पितृ दोष से मुक्ति मिलती है। मनोज त्रिपाठी के अनुसार, पितृ पक्ष में श्रद्धा और विधि-विधान से अपने पूर्वजों का स्मरण करना ही श्राद्ध का मूल भाव है।



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