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ब्लैकबोर्ड-फर्जी रेप केस और SC-ST एक्ट भी झूठा:20 साल बाद बरी, मां-बाप और दो भाइयों की मौत, तीसरा पागल हुआ




उत्तरप्रदेश के ललितपुर का सिलावन गांव। शाम का वक्त। करीब 44-45 साल का एक शख्स लंगड़ाते हुए चला जा रहा था। वो इधर-उधर देख रहा था, जैसे किसी को पहचानने को कोशिश कर रहा हो। तभी उसे साइकिल से आता हुआ एक शख्स दिखा। उसने उसे रोककर कहा- ‘मेरा नाम विष्णु तिवारी है। क्या मुझे जानते हैं? मेरे घर का पता बता दो।’ उस शख्स ने हैरानी भरी नजरों से देखा और बोला- ‘भइया पागल हो क्या, तुम्हारा घर है और, मुझसे पूछ रहे हो।’ विष्णु ने एक के बाद एक, कई लोगों से अपने घर का पता पूछा, लेकिन सभी ने उन्हें पागल कहा। अब तक अंधेरा हो गया था। विष्णु थककर एक पेड़ के नीचे बैठ गए। तभी एक और शख्स वहां से गुजरा और विष्णु को देखते ही ठिठक गया। बोला- तुम विष्णु तिवारी हो न? पहचाना मुझे? तुम्हारा दोस्त सुरेश। विष्णु फौरन बोल पड़े- ‘मेरे भाई तुमने तो मुझे पहचान लिया’ दोस्त बोला-‘तुम तो जेल में थे ना।’ विष्णु ने जवाब दिया- ‘झूठा मुकदमा था। 20 साल बाद हाईकोर्ट ने रिहा कर दिया। मेरे घर का पता तुम्हें याद हो तो घर पहुंचा दो।’ दोस्त ने कहा- ‘तुम्हारा घर तो रहने लायक बचा नहीं, चलकर देख लो।’ विष्णु, दोस्त के साथ अपने घर की ओर चल दिए। कुछ कदम चलने के बाद बोले- ‘घर में तो मेरी राह देखने वाला कोई जिंदा ही नहीं बचा।’ दोस्त बोला- ‘चाचा जिंदा हैं। उन्हीं के घर चले जाना।’ कुछ ही देर में विष्णु अपने घर पहुंचे। दोस्त ने मोबाइल का टॉर्च जलाया तो देखा टूटे दरवाजे में जंग लगा ताला लटक रहा था। दीवारें भी गिर चुकी थीं। विष्णु ने पास ही पड़ा हुआ एक पत्थर उठाया और ताला तोड़ दिया। अंदर जाकर देखा तो कचरे का ढेर लगा था। उसी ढेर में मां-पिताजी के वोटर आईडी मिले। कहीं दीवार गिर गई, तो कहीं मोटी-मोटी दरारें। विष्णु जमीन पर बैठकर फूट-फूटकर रोने लगे। दोस्त ने उन्हें संभाला और चाचा के घर ले गए। चाचा को देखते ही विष्णु बोले-‘सब खत्म हो गया चाचा। न घर बचा, न मां-बाप।’ चाचा ने पूछा जेल से कैसे छूटे। विष्णु बोले- ‘रेप का केस भी झूठा था और SC-ST का मुकदमा भी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बाइज्जत बरी कर दिया।’ दैनिक भास्कर की सीरीज ब्लैकबोर्ड में आज विष्णु तिवारी की कहानी के लिए मैं नीरज झा पहुंचा हूं उनके गांव सिलावन… ललितपुर से 50 किलोमीटर दूर है सिलावन। लोगों से पूछते हुए मैं विष्णु तिवारी के खेत पहुंचा, वो वहीं मेरा इंतजार कर रहे थे। 49 साल के विष्णु खेत में इधर से उधर टहल रहे हैं। चेहरे पर झुर्रियां, लाल-लाल आंखें, लड़खड़ाते हुए पैर। मुझसे मिलते ही बोले- ‘सारा विवाद इसी खेत की वजह से हुआ है। साल 2000 की बात है। परिवार में 8 लोग थे। मां-पिताजी, पांच भाई और एक बहन। दो कमरे का कच्चा मकान था। इसी 5 एकड़ के खेत में पिताजी खेती करते थे। तब मैं करीब 22 साल का था। बगल में जिनका खेत है, एक रोज उनसे झगड़ा हो गया। मारपीट होने लगी। वहां उस आदमी की बहू भी थी। खबर मिली, तो हम लोग भागकर गए। समझा-बुझाकर मामला शांत किया। लेकिन अगले दिन उन लोगों ने मुझ पर SC/ST एक्ट के तहत मारपीट और उनकी बहू से रेप का मुकदमा कर दिया। मैं कई दिनों तक घर से गायब रहा। लोगों के कहने पर पिताजी उस आदमी को 50 हजार रुपए देने को भी राजी हो गए, लेकिन मुकदमा वापस नहीं हुआ। उन लोगों ने हमें परेशान करने के लिए पुलिस को पैसा दिया। हर रोज पुलिस घर आकर पूछताछ करने लगी। पुलिस कहती- ‘विष्णु ने सरेंडर नहीं किया, तो घर की कुर्की जब्ती हो जाएगी। पानी का एक ग्लास तक नहीं बचेगा। भाइयों को भी जेल में डालेंगे।’ आखिर मुझे सरेंडर करना पड़ा। ललितपुर सेशन कोर्ट में मुकदमा शुरू हुआ। पिताजी ने वकील की फीस के लिए अनाज और 10 मवेशी बेच दिए। करीब दो साल मुकदमा चला। साल 2003 में कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा सुना दी। आखिर सबकी उम्मीदें टूट गईं। मुझे आगरा सेंट्रल जेल भेज दिया गया। रात का वक्त था। जेल के भीतर घुसते ही लगा, अब तो जिंदगी खत्म। हर बैरक से मारने-पीटने की आवाज आ रही थी। कैदी पागल की तरह चीख रहे थे। एक हफ्ते तक तो मैंने खाना नहीं खाया। आठवें दिन दूसरा कैदी गाली देते हुए मुझे बोला- @#*$% खाओगे नहीं, तो यहीं मर जाओगे। रेप किए नहीं थे, तो आजीवन जेल कैसे हो गई? मैंने बिलखते हुए कहा- बेवजह फंसा दिया। तभी दो सिपाही लाठी लेकर बैरख में घुस गए। हाथ-पैर बांधकर तलवों पर जोर-जोर से लाठियां बरसाने लगे। जब बेहोश हो गया तो जमीन पर पटककर चले गए। होश आने के बाद से जो मिलता था, खा लेता था। ऐसी पिटाई न जाने कितनी बार हुई। अभी भी पैर में सूजन है। एड़ी की कुछ हड्डियां भी टूट गई। इसलिए लंगड़ाकर चलता हूं। विष्णु आगे कहते हैं- केवल 5वीं तक पढ़ा हूं, इसलिए जेल में खाना बनाने का काम करने लगा। हर दिन हजारों रोटियां बेलनी पड़ती थी। यही जिंदगी थी। एक बार मां ने पिताजी से कहा- विष्णु का मुंह देखे बरसों हो गए। उससे मिलना है। पिताजी, मां को लेकर जेल आए। मुझे जाली के पीछे देखते ही वो फूट-फूटकर रोने लगी। बेहोश होकर वहीं गिर गईं। बगल में खड़ा पुलिसवाला बोला- जब मां इतनी कमजोर है, तो उन्हें यहां क्यों बुलाया। यहीं मर जाती तो…। उसके बाद से मां की तबीयत खराब रहने लगी। वो कभी बिस्तर से उठ नहीं पाईं। और पिताजी कभी नहीं आए। ललीतपुर से आगरा आने-जाने में भी दो दिन लगते थे। केस लड़ने में 5 एकड़ जमीन भी बिक गई। पूरा घर तितर-बितर हो गया। पिताजी की तबीयत भी बहुत खराब रहने लगी 2013 की बात है। अचानक मेरे पास एक चिट्ठी आई। उसमें पिताजी की बीमारी, घर की स्थिति का जिक्र था। आखिर में लिखा था- अब तुम्हारे पिताजी इस दुनिया में नहीं रहे। तुम्हारी चिंता में उन्हें हार्ट-अटैक आ गया। चिट्ठी पढ़ते ही मैं फूट-फूटकर रोने लगा। खुद को कोसने लगा कि कैसी किस्मत है, अपने बाप की अर्थी को कंधा नहीं दे पाया। आखिरी बार चेहरा भी नहीं देख पाया। भरी जवानी में जेल आ गया और अब…। 6 महीने बाद छोटा भाई मुझसे मिलने जेल आया। जाली के दूसरी ओर मुझे देखते ही फफक-फफककर रोने लगा। कहने लगा- तुम्हारे जेल जाने के बाद से ही पिताजी बीमार हो गए थे। जमानत के लिए कितनी अर्जियां हाईकोर्ट में लगवाई, लेकिन कहीं सुनवाई नहीं हुई। जब पिताजी की मौत हुई, तो हम लोगों ने पैरोल के लिए आवेदन दिया था, लेकिन वकील पैसा खाकर बैठ गया। कुछ किया ही नहीं वह रोते हुए वापस लौट गया। मेरी हालत देखकर उसको ऐसा सदमा लगा कि कुछ महीने बाद 2014 में उसने भी दम तोड़ दिया। पहले पिता जी और फिर भाई, एक साल बाद 2015 में मां की भी मौत हो गई। घर में तीन मौत हुईं तो एक और भाई को सदमा लग गया। 2017 में उसने भी दम तोड़ दिया। लेकिन मैं इन चारों में से किसी का न तो आखिरी चेहरा देख पाया और न अर्थी को कंधे दे पाया। दूसरी भाई की मौत के बाद तीसरा भाई मरनी की मिठाई लेकर जेल आया। ये हमारे यहां एक रिवाज होता है, लेकिन वो मिठाई भी मुझे नसीब नहीं हुई। गेट पर ही पुलिस वाले खा गए। जो भाई मिठाई लेकर आया था वो भी सदमें में पागल हो गया। एक भाई महाराष्ट्र में चाय की दुकान चलाता है। मैंने जेल में कई बार आत्महत्या करने की कोशिश की, लेकिन मौका ही नहीं मिला। 2017 में कैदियों की स्थिति देखने के लिए एक NGO की टीम आई। वो लोग मेरे बारे में जानकर हैरान हो गए। उसके बाद एक एडवोकेट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में मेरा मुकदमा लड़ा। 28 जनवरी 2021 की बात है। इलाहाबाद हाईकोर्ट में दो जजों की बेंच के सामने सुनवाई चल रही थी। एडवोकेट श्वेता राणा बोलीं- मेरे मुवक्किल 20 साल से झूठे मुकदमे में जेल में बंद हैं। बूढ़े हो गए हैं, उनके मां-बाप, भाई पूरा परिवार खत्म हो गया, लेकिन न्याय नहीं मिला। उनपर लगा बालात्कार का आरोप निराधार है। जिस महिला से रेप का आरोप है, उसकी मेडिकल रिपोर्ट्स में न तो आंतरिक चोट का जिक्र है और न बाहरी। महिला के प्राइवेट पार्ट पर आरोपी का सीमन भी नहीं मिला था। माय लॉर्ड! निजी जमीन को लेकर विवाद हुआ, जिसमें फर्जी बलात्कार और SC-ST एक्ट का मुकदमा दर्ज किया गया।’ हाईकोर्ट ने फैसले में कहा-‘घटना के 3 दिन बाद FIR होने से लेकर, पीड़िता के परिवार और गवाहों के बयान एक-दूसरे से मेल नहीं खाते हैं। कोर्ट आरोपी को निर्दोष मानते हुए जल्द से जल्द रिहा करने का फैसला सुनाती है।’ मुझे इस जजमेंट के बारे में दो महीने बाद पता चला। तारीख-2 मार्च, 2021। रात करीब 8 बजे का वक्त था। आगरा जेल का बैरक नंबर 3C। मैं एक कोने में बैठा था। तभी बूट की आवाज आई। मैं सोचने लगा- ‘इस वक्त पुलिस वाला मेरे बैरक की तरफ क्यों आ रहा है, पिछली बार आया था तो भाई के मरने की खबर लाया था। फिर कोई बुरी खबर ही लाया होगा।’ कुछ ही देर में जेल के डिप्टी-सुपरिटेंडेंट बैरक के सामने खड़े थे। एक कागज दिखाते हुए बोले- ‘विष्णु तिवारी, आज की रात जेल में तुम्हारी आखिरी रात है। कल सुबह तुम्हें रिहा कर दिया जाएगा।’ ये सुनते ही मैं जमीन पर बैठ गया। रोते हुए बोला- ‘अब मैं कहां जाऊंगा साहब, बाहर तो मेरा कोई बचा ही नहीं। मां-बाप, भाई… सब मर चुके हैं। मुझे यहीं रहने दीजिए। यहां कम से कम कोई हालचाल पूछने वाला तो है।’ डिप्टी-सुपरिटेंडेंट ने कहा- ‘इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तुम्हे बाइज्जत बरी किया है। अब यहां से जाना होगा।’ रिहाई की खबर सुनते ही बैरक के दूसरे कैदी कहने लगे- कल सुबह तुम चले जाओगे तिवारी। गांव से कोई लेने भी आएगा क्या? विष्णु बोला- ‘कोई जिंदा बचा हो, तब तो आएगा।’ अगली सुबह यानी 3 मार्च को जेलर ने 500 रुपए देकर रिहा कर दिया। मैं बेमन वहां से चला आया। आज जेल से छूटे लगभग पांच साल हो गए हैं, अपना पेट कैसे पाल रहा हूं, मैं ही जानता हूं। लोगों को जैसे ही पता चलता है 20 साल जेल काटकर आया हूं, वे मुझे काम से निकाल देते हैं। इन दिनों लखनऊ में किसी के घर में खाना बनाता हूं।’ लगता है किसी का मर्डर कर दूं। या कोई ऐसा अपराध करूं, जिससे फिर जेल चला जाऊं या फांसी हो जाए। मैं तो सरकार से हाथ जोड़कर गुजारिश करता हूं कि मुझे फांसी दे दे। जो जिंदगी जी रहा हूं, वह तो नरक से भी बदतर है। कई-कई रात नींद नहीं आती। लगता है पागल हो जाऊंगा। अब जो भी मेरे अपने हैं वो सब जेल में बंद हैं। जो मुझे पहचानते हैं, मुझे समझते हैं। अब ये आजादी मेरे किसी काम की नहीं। जिंदा लाश बनकर रह गया हूं। ——————————————— ब्लैकबोर्ड की ये कहानियां भी पढ़ें… 1-ब्लैकबोर्ड-नाचने से ज्यादा किसी के साथ सोकर कमा लेगी:बेटी को देखकर बोला- इसे भी साथ लाना; वो डांसर जो बिन शादी के मां बन गईं रात करीब डेढ़ बजे का वक्त था। तेज आवाज में गाने बज रहे थे। मैं घाघरा-चोली पहने स्टेज पर थी। 100 मर्दों के बीच नाच रही थी। तीन घंटे से नाचते-नाचते शरीर थक चुका था। भीड़ से एक मर्द स्टेज पर चढ़ आया। दुपट्टा खींचा और कमर में हाथ डाल दिया। मैं घबरा गई। पूरी खबर पढ़ें…
2-ब्लैकबोर्ड- चुस्त कपड़ों के ऊपर बुर्का पहनकर बार जाती हूं:रात तीन बजे घर पहुंची तो भाई बोला- किसके साथ करवाचौथ मनाकर आई है 2007-08 की बात है। दिसंबर का महीना था। कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी। मैं नाइट ड्यूटी पर थी। रात के करीब एक बज रहे थे। सारे गेस्ट नशे में झूम रहे थे। तभी लेडीज वॉशरूम से एक लड़की के चीखने की आवाज आई। पूरी खबर पढ़ें…



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