मजिस्ट्रेट ने संज्ञान नहीं लिया, आदेश रद्द:हाईकोर्ट ने पुनः आदेश पारित करने का निर्देश दिया




इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना ने कन्नौज की तत्कालीन मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट श्रद्धा भारती के 20 सितंबर 2025 के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें उन्होंने नवाब सिंह यादव व अन्य के खिलाफ पुलिस द्वारा दाखिल आरोप-पत्र पर संज्ञान लेने से इन्कार कर दिया था। कन्नौज का मामला यह मामला कन्नौज कोतवाली थाने में दर्ज केस से जुड़ा है, जिसमें भारतीय न्याय संहिता की धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज हुआ था। दरअसल यह घटना एक पॉक्सो मामले की सुनवाई के दौरान सामने आई थी, जब गवाह डॉ. स्वास्तिका शालिनी को सत्र न्यायालय में गवाही देने के दौरान धमकाया गया और आरोपी के पक्ष में बयान देने के लिए दबाव बनाया गया। अपर महाधिवक्ता ने दलील दी कि मजिस्ट्रेट ने 31 पन्नों का आदेश लिखते हुए सबूतों की विस्तृत समीक्षा की, मानो कोई “मिनी ट्रायल” चल रहा हो, जबकि संज्ञान लेने के चरण में मजिस्ट्रेट को केवल प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं, यह देखना होता है, सबूतों की गुणवत्ता परखना नहीं। हाईकोर्ट ने कमल शिवाजी पोकरनेकर बनाम महाराष्ट्र राज्य , रश्मि कुमार बनाम महेश कुमार भाड़ा और भगवंत सिंह बनाम पुलिस आयुक्त जैसे सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट को संज्ञान के चरण पर साक्ष्यों की सत्यता परखने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने यह भी माना कि मजिस्ट्रेट ने आरोपियों को सुना, लेकिन पीड़िता को नोटिस दिए बिना ही संज्ञान से इन्कार कर दिया, जो कि विधिक रूप से अनिवार्य है। हाईकोर्ट ने 20 सितंबर 2025 के आदेश को रद्द करते हुए मामला पुनः मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, कन्नौज की अदालत को भेज दिया है, ताकि पुलिस रिपोर्ट पर नए सिरे से, इस फैसले में दी गई टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए, आदेश पारित किया जा सके।



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