कोंडागांव| सावन की फुहारों के बीच बस्तर में हरेली पर्व की रौनक दिखने लगी है। खेतों में हरियाली है। बारिश की बूंदें हैं। गांवों में पारंपरिक खुशियां गूंज रही हैं। किसानों में पर्व को लेकर उत्साह है। बस्तर की लोक संस्कृति में हरेली केवल त्योहार नहीं है। यह खेती-किसानी, प्रकृति, पशुधन, ग्रामीण जीवन से जुड़ी आस्था का पर्व है। हरेली आते ही गांवों के खेत-खलिहानों, गोठानों में चहल-पहल बढ़ गई है। हरेली के दिन किसानों ने हल, कुदाल, फावड़ा, हंसिया सहित अन्य कृषि औजारों की साफ-सफाई की। पूजा-अर्चना की। खेती में इन औजारों की भूमिका को देखते हुए सम्मान प्रकट किया जाता है। किसानों का मानना है कि कृषि उपकरणों, प्रकृति की पूजा से कृषि वर्ष की शुरुआत शुभ होती है। खेतों में अच्छी पैदावार का रास्ता खुलता है। कई किसानों ने खेतों, कृषि उपकरणों की पूजा की। फसल को कीटों, अन्य प्राकृतिक संकटों से सुरक्षित रखने की कामना की। हरेली में पशुधन का भी विशेष महत्व है। किसानों ने बैल, अन्य मवेशियों को नहलाया। सजाया। पूजा की। खेती-किसानी में पशुधन की भूमिका को देखते हुए उनके स्वस्थ, सुरक्षित रहने की कामना की जाती है।
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मवेशियों को नहलाकर खिलाई जड़ी-बूटी कृषि औजारों की पूजा, मांगी अच्छी फसल
