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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि काउंसलिंग के दौरान गठित मेडिकल बोर्ड का काम अभ्यर्थी की मेडिकल शिक्षा हासिल करने की कार्यात्मक क्षमता का आकलन करना है।
वह सक्षम प्राधिकारी की ओर से जारी वैध दिव्यांगता प्रमाणपत्र में दर्ज दिव्यांगता प्रतिशत को बदल नहीं सकता। यह आदेश न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह की खंडपीठ ने सोम्या पाल की याचिका पर दिया है।
क्या है मामला जानिये
याची के पास छह मार्च 2026 को जारी प्रमाणपत्र था, जिसमें 47 प्रतिशत स्थायी दिव्यांगता दर्ज थी। नीट-यूजी 2026 की काउंसलिंग में मेडिकल बोर्ड ने इसे 22 प्रतिशत और अपीलीय बोर्ड ने 28 प्रतिशत माना। कोर्ट ने कहा कि दोनों आकलनों में विरोधाभास है, जबकि कार्यात्मक जांच में स्पष्ट था कि याची सीबीएमई पाठ्यक्रम की आवश्यक दक्षताएं पूरी कर सकती है। कोर्ट ने अपीलीय बोर्ड की राय रद्द करते हुए याची को दिव्यांग श्रेणी में सीट का दावा करने की अनुमति दी।
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मेडिकल बोर्ड दिव्यांगता प्रमाणपत्र का प्रतिशत नहीं बदल सकता: हाईकोर्ट:दिव्यांग श्रेणी में सीट का दावा करने की अनुमति दी
