![]()
‘हमारे जमाने में ऐसा नहीं होता था ’ या ‘पुराने दिन भी क्या दिन थे!’ ये जुमले आपने बुजुर्गों से या शायद खुद अपने मुंह से कई बार सुने होंगे। वर्तमान से असंतोष और बीते वक्त को सुनहरे दौर के रूप में देखना इंसानी स्वभाव की आदत रही है। सदियों पहले यूनानी कवि होमर के लेखन में भी इसका जिक्र मिलता है कि इंसान हमेशा अतीत को महान बताता आया है। लेकिन क्या सचमुच अतीत आज से बेहतर था, या यह सिर्फ हमारे दिमाग का एक छलावा है? मनोवैज्ञानिकों और वैज्ञानिकों ने इसके पीछे छिपे बेहद दिलचस्प कारणों का खुलासा किया है। मकाऊ यूनिवर्सिटी के व्यवहार वैज्ञानिक जे होंग के अनुसार, मानव समाजों में अतीत को ‘स्वर्ण युग’ मानने की परंपरा बहुत पुरानी है। इसके पीछे ‘गुलाबी अतीत का भ्रम’ नामक मनोवैज्ञानिक कारण काम करता है। हमारा दिमाग अतीत को याद करते समय फिल्टर की तरह व्यवहार करता है। वह पुरानी परेशानियों, संघर्षों व कड़वी यादों को धीरे-धीरे धुंधला कर देता है, जबकि सुखद और सकारात्मक अनुभवों को ज्यादा स्पष्ट रूप से संजोकर रखता है। दूसरी ओर, वर्तमान में हमारा सामना रोजमर्रा की चुनौतियों, तनाव व नकारात्मकता से होता है। इसलिए बीता हुआ समय बेहतर व सुखद दिखाई देता है, जबकि वर्तमान अपेक्षाकृत खराब लगता है। क्लेरमोंट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के अनुसार, समाज अनिश्चितता, संकट या बड़े बदलावों के दौर से गुजरता है, तो लोग मानसिक सुकून व स्थिरता की तलाश में अतीत की ओर देखने लगते हैं। अनिश्चितता के दौर को उम्मीद के स्रोत के रूप में देखें मनोवैज्ञानिक टिम वाइल्डशट कहते हैं, अतीत दो तरीके से याद कर सकते हैं- पहला, नॉस्टैल्जिया, जो सुखद यादों से जुड़ा होता है। यह हमें प्रिय लोगों और अच्छे अनुभवों से भावनात्मक रूप से जोड़ता है, आत्मविश्वास बढ़ाता है और उम्मीद जगाता है। दूसरा, डिक्लाइनिज्म या पतनवाद है, जिसमें व्यक्ति मान लेता है कि अतीत हर तरह से बेहतर था और समाज गिरावट की ओर जा रहा है। यह सोच निराशा, शिकायत और बदलावों के विरोध को बढ़ावा देती है। बेहतर होगा कि अनिश्चितता के इस दौर में अतीत को उम्मीद के स्रोत के रूप में देखें, न कि निराशा के कुएं (डिक्लाइनिज्म) के रूप में। तभी आगे बढ़ पाएंगे।
Source link
यादों से सुकून लें, पर बदलाव भी अपनाएं- एक्सपर्ट:बीते कल की चाहत में आज न खोने दें; यादों से ऊर्जा लेकर आगे बढ़ें
