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भाजपा का वफादार वोटबैंक आज पेट्रोल में एथेनॉल की मिलावट को लेकर गुस्से में है। पिछले महीनों में एयरपोर्ट पर, शादियों में, होटल की लॉबी में, मेहमानों और टैक्सी ड्राइवरों के रूप में मुझे कई लोग मिले, जो नाराज दिखे। उनका गुस्सा यह था कि वे हमें जबरदस्ती एथेनॉल मिला पेट्रोल (ईबीपी) कैसे दे सकते हैं? व्यापक तौर पर इन लोगों के सवाल ये हैं कि इससे हमें क्या फायदा होगा? हम कीमत तो उतनी ही देंगे, लेकिन कम माइलेज मिलेगा। इसके साथ गाड़ी का इंजन भी खराब होगा, जबकि हम ईएमआई का नियमित भुगतान कर रहे होंगे। और इससे देश को क्या फायदा होगा? अगर कोई फायदा होगा तो हमें क्यों नहीं बताया जा रहा है? हमें विकल्प चुनने का मौका क्यों नहीं दिया जा रहा है? हमसे कहा जा रहा है कि इसका इस्तेमाल करो या पैदल चलो। हमारी तकलीफ से किसे फायदा है? ये सही और अहम सवाल हैं और सरकार के पास इनके जवाब होने चाहिए। हैरानी की बात यह है कि उसे वोटरों को भरोसे में लेने की कोई परवाह नहीं दिखती। उपभोक्ताओं को पहले इस बदलाव के लिए तैयार करने की किसी ने कोशिश नहीं की। अब मंत्रियों को सामने खड़ा करके फायदे गिनाने की कोशिश की जा रही है। लेकिन इन बातों का कोई असर नहीं हो रहा है। 2014 के बाद से मध्यवर्ग भाजपा का मजबूत वोट बैंक रहा है। यह उसके प्रति इतना वफादार रहा है कि ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद इसने उसे ही वोट दिया। इसने सरकार को तब भी माफ कर दिया, जब कच्चे तेल की कीमत में गिरावट के बावजूद उसने उत्पाद शुल्क बढ़ाकर फायदा खुद उठा लिया। उस छप्परफाड़ फायदे का इस्तेमाल गरीबों के बीच मुफ्त अनाज और दूसरे सीधे लाभ बांटने में किया गया। इसे मैं ‘रॉबिनहुड बनने की कोशिश’ बताता हूं- मध्यवर्ग से वसूलो, गरीबों में बांटो और अमीरों की परवाह मत करो। ‘सेकुलर’ पार्टियां अगर मुस्लिम वोट को अपने लिए पक्का मानकर चलती हैं, तो भाजपा भी विशाल मध्यवर्ग को अपने लिए पक्का मान सकती है। इस वर्ग ने ईंधन की ऊंची कीमतों को इसलिए स्वीकार किया, क्योंकि वह हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद के नारे को मानता है। लेकिन ये वोटर आज नाराज हैं। यह उस पार्टी के लिए हैरान करने वाली बात है, जो इस बात पर गर्व करती है कि उसके नेता कड़े से कड़े फैसले वोटरों से स्वीकार करवाने की क्षमता रखते हैं, चाहे वह नोटबंदी हो या कोविड के दौरान देशभर में अचानक लॉकडाउन करने का फैसला। लेकिन ‘ईबीपी’ के मामले में एक्शन का आह्वान तक नहीं किया गया। ऐसा लगता है कि किसी को अचानक कुछ सूझ गया और 2013-14 में पेट्रोल में जो 1.56 प्रतिशत की मिलावट की जा रही थी, उसे चुपके से बढ़ाकर 20 फीसदी कर दिया गया और अब इसे 30 फीसदी करने की बात की जा रही है। लेकिन दो मुश्किलें हैं। एक तो यह कि खरीदार गुस्से में हैं और उनकी संख्या बड़ी है। दूसरी यह कि ज्यादा एथेनॉल उपलब्ध नहीं है। वह इतना भी नहीं है कि मिलावट के इस अनुपात को बनाए रखा जा सके, जब तक कि आप चावल के सुरक्षित भंडार में गहरा हाथ न डालें। इसके अलावा, लोग और ज्यादा मिलावट को स्वीकार नहीं करेंगे। कागज पर तो आयातित एथेनॉल की जगह देसी एथेनॉल का इस्तेमाल ठीक लगता है, लेकिन आपके पास एथेनॉल का कोई बहुत बड़ा स्रोत नहीं है कि आप ड्रिल करके उसे निकालने लगें। आपके किसानों को उस स्रोत- गन्ने, मक्के या धान की खेती करनी पड़ेगी। इसके इस्तेमाल का विचार तब आया था, जब चीनी का सरप्लस उत्पादन हो रहा था। चीनी मिलें अपना पैसा वसूल करके किसानों के बकाये का भुगतान कर सकती थीं। यह इतना उत्साह बढ़ाने वाला था कि चीनी मिलों को इजाजत दे दी गई कि वे गन्ने के रस को एथेनॉल के उत्पादन के लिए दे सकती हैं। बाजार में चीनी भरपूर मात्रा में पड़ी थी। लेकिन खेती से जुड़ी अनिश्चितताओं का किसी ने हिसाब नहीं लगाया, मसलन अनाज की मंडियों, मानसून की अनिश्चितता, कीड़ों के हमलों का। एक ही साल में गन्ना सरप्लस से अभाव में पहुंच गया। इस सीजन की शुरुआत चीनी के भंडार में 50 लाख टन की कमी के साथ हुई, जबकि आधार 34.3 मीट्रिक टन का होता था, जो अब गिरकर 28 मीट्रिक टन पर पहुंच गया। इसका नतीजा यह हुआ कि चीनी की कीमत करीब 50 फीसदी बढ़ गई। उम्मीद के मुताबिक, पुरानी कहानी दोहराई जा रही है : भंडार पर नियंत्रण करो, ‘जमाखोरी और मुनाफाखोरी’ पर हमला करो, निर्यात पर रोक लगाओ और ड्यूटी फ्री आयात के लिए रास्ता बनाओ। लेकिन जब त्योहारों के दिन आ रहे हैं, तब क्या चीनी को महंगा होने दिया जा सकता है? एथेनॉल की खरीद में बेहिसाब बढ़ोतरी होती रही-2013-14 में 38 करोड़ लीटर से बढ़कर इस साल 1,200 करोड़ लीटर की खरीद हुई। रिफाइनरियों ने मक्के की ओर रुख किया। तब मक्के की कीमत में भी करीब 50 फीसदी की बढ़ोतरी हो गई। इसके कारण पोल्ट्री और मीट की कीमतें भी बढ़ती हैं, क्योंकि इन्हें मक्का चाहिए। अब धान की ओर हाथ बढ़ाया जा रहा है। पहले टूटे चावल का और फिर सरप्लस चावल का नंबर आया। इस साल ईंधन के लिए 72 लाख टन चावल बाजार की कीमत से आधी कीमत पर आवंटित किया गया। ‘ईबीपी’ का आइडिया अच्छा हो सकता है, लेकिन यह कृषि पर आधारित है, इसलिए इसे लागू करने से पहले तीन-चार साल तक तैयारी करनी चाहिए थी। किसानों को अपनी पसंद की फसल बदलने के लिए तैयार किया जाना चाहिए था। उनके लिए बाजार बनाने के साथ यह व्यवस्था की जानी चाहिए थी कि जरूरी चीजों की कमी न हो और हम ‘फूड बनाम फ्यूल’ के जाल में न फंसें। और अंत में, उपभोक्ताओं को मिलावटी पेट्रोल का इस्तेमाल करने के लिए राजी किया जाता। लेकिन आज ये नतीजे सामने आए हैं- चीनी की कमी हो गई है, विदेशी मुद्रा की स्थिति खराब है, महंगाई बढ़ी है जबकि त्योहार आने वाले हैं, और आप चावल के सुरक्षित भंडार को ‘ईबीपी’ की आधी कीमत पर आवंटित कर रहे हैं। ऐसे में या तो ब्लेंडिंग का अनुपात घटाकर 10 फीसदी किया जाए, या उपभोक्ताओं के सामने विकल्प रखा जाए।
याद रहे, भाजपा के वफादार मतदाता गुस्से में हैं! इसकी तैयारी जरूरी थी…
एथेनॉल का आइडिया अच्छा हो सकता है, लेकिन यह कृषि पर आधारित है, इसलिए इसे लागू करने से पहले तीन-चार साल तक तैयारी करनी चाहिए थी। किसानों को अपनी पसंद की फसल बदलने के लिए तैयार किया जाना चाहिए था। उनके लिए व्यवस्था की जानी चाहिए थी कि जरूरी चीजों की कमी न हो।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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शेखर गुप्ता का कॉलम:हम ‘फूड बनाम फ्यूल’ के जाल में न फंसें
