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श्राविका मंजुला जैन का हुआ केश लोचन:बड़वानी में मोक्ष मार्ग की ओर बढ़ाया कदम, पहली श्राविका बनीं




बड़वानी दिगंबर जैन समाज की श्राविका मंजुला जैन ने शनिवार दोपहर को स्थानीय दिगंबर जैन मंदिर में केश लोचन की क्रिया संपन्न की। वह जैन धर्म के अनुसार 8 प्रतिमा के नियम धारण किए हुए हैं और गृहस्थ अवस्था में हैं। बड़वानी के इतिहास में वह पहली श्राविका हैं जिन्होंने केश लोचन किया है। यह क्रिया आर्यिका संघ की क्षुल्लिका संभाव मति माताजी के केश लोचन को देखकर मंजुला जैन के मन में वैराग्य के भाव उत्पन्न होने के बाद हुई। बड़वानी में विराजित चतुर्थ पट्टाचार्य सुनील सागर जी महाराज जी की शिष्या आर्यिका सुप्रज्ञ मति जी माताजी ससंघ से उन्होंने केश लोचन का निवेदन किया। पूज्य सुप्रज्ञ मति जी माताजी ने अपने वरद हस्त से यह क्रिया संपन्न कराई। मंजुला जैन ने विगत 9 वर्षों से त्याग का जीवन प्रारंभ किया था। उन्होंने पहले 2 प्रतिमा, फिर 7 प्रतिमा और अंततः आचार्य श्री विद्या सागर जी से 8वीं प्रतिमा के व्रत धारण कर मोक्ष मार्ग पर कदम बढ़ाया है। इस अवसर पर आर्यिका सुप्रज्ञ मति जी माताजी ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि मुनि और आर्यिका के केश लोचन तथा आहार की क्रिया प्रत्येक श्रावक को देखनी चाहिए, जिससे वैराग्य की भावना उत्पन्न होती है। माताजी ने दान और प्रभावना के महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि दान और प्रभावना ऐसी वस्तुओं का करना चाहिए जिससे जीव हिंसा न हो। अहिंसक वस्तुओं का दान करने से होने वाली सभी क्रियाओं का 6 प्रतिशत पुण्य नियम से प्राप्त होता है। यदि किसी हिंसक वस्तु का दान किया गया है और उससे कोई जीव घात या पापाचार हुआ है, तो उसका पाप भी नियम से दान करने वाले को लगता है। अतः दान ऐसी वस्तु का करें जिससे पुण्य की प्राप्ति हो। उन्होंने यह भी बताया कि मंदिर में दिए गए दान का उपयोग केवल मंदिर के निर्माण और धार्मिक कार्यों में ही होना चाहिए, न कि किसी अन्य कार्य के लिए। श्रावक को पूजा की सामग्री स्वयं लानी चाहिए और मंदिर में भी रखनी चाहिए। मंदिर के द्रव्य से की गई पूजा निर्मालय हो जाती है। भगवान के परिमार्जन के लिए उपयोग किए जाने वाले अंगोछे (वस्त्र) भी बगैर सिलाई के होने चाहिए। माताजी ने ऐसी कई अन्य बारीकियां भी बताईं।



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