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एक लोक कथा है, बहुत समय पहले एक गांव में एक व्यक्ति मेहनत और ईमानदारी से गरीबी दूर करना चाहता था। उसने कई छोटे-बड़े काम शुरू किए, लेकिन हर बार उसे असफलता ही मिली। धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास खत्म होने लगा। उसे लगने लगा कि किस्मत उसका साथ नहीं दे रही। अंततः उसने कोशिश करना ही छोड़ दिया और निराशा में डूब गया। उसी समय गांव में एक संत आए। लोगों ने बताया कि वे जीवन की कठिन समस्याओं का सरल समाधान बताते हैं। गरीब व्यक्ति भी उनसे मिलने पहुंचा और अपनी सारी परेशानियां सुनाईं। उसने कहा, “मैंने बहुत कोशिश की, लेकिन हर बार हार मिली। अब मुझमें आगे बढ़ने की ताकत नहीं बची।” संत मुस्कुराए और बोले, “मैं तुम्हें एक बच्चे की कहानी सुनाता हूं।” उन्होंने बताया कि एक छोटे बच्चे ने अपने घर के आंगन में बांस और कैक्टस के पौधे लगाए। वह रोज दोनों पौधों को समान मात्रा में पानी देता, खाद डालता और उनकी देखभाल करता। कुछ समय बाद कैक्टस तेजी से बढ़ने लगा, लेकिन बांस के बढ़ने का कोई निशान दिखाई नहीं देता था। बच्चा कभी-कभी उदास हो जाता, लेकिन उसने देखभाल करना बंद नहीं किया। काफी दिन बीत गए। एक दिन अचानक मिट्टी से बांस का छोटा-सा अंकुर बाहर आया। फिर देखते ही देखते कुछ ही दिनों में बांस का पौधा तेजी से बढ़ने लगा और थोड़े समय में कैक्टस से भी कहीं अधिक ऊंचा हो गया। संत ने कहा, “बांस इतने दिनों तक दिखाई नहीं दे रहा था, क्योंकि वह जमीन के भीतर अपनी जड़ों को मजबूत कर रहा था। मजबूत जड़ों के कारण ही वह बाद में इतनी तेज गति से बढ़ सका।” संत की बात सुनकर गरीब व्यक्ति की आंखें खुल गईं। उसने समझ लिया कि जीवन में संघर्ष का समय व्यर्थ नहीं होता। यह समय हमें मजबूत बनाता है। उसने फिर से पूरे उत्साह के साथ काम करना शुरू किया। इस बार उसने धैर्य रखा, लगातार सीखता रहा और अंततः उसे सफलता मिल गई। यह कथा संदेश देती है कि सफलता का फल उसी को मिलता है जो कठिन समय में भी अपने प्रयासों को नहीं छोड़ता। प्रसंग की सीख
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संत को दुखी व्यक्ति को सीख:सफलता उसी को मिलती है जो सकारात्मक सोच के साथ कठिन समय में भी प्रयास करना नहीं छोड़ता है
