पंजाब के अमृतसर से करीब 115 किमी दूर फिरोजपुर का चक मारन गांव। रात करीब 9 बजे का वक्त। एक गुरुद्वारे के बाहर चप्पलों का ढेर लगा दिखा। गेट खोला तो अंदर बरामदे की दीवार पर बड़ा सा प्रोजेक्टर लगा था, जिस पर फिल्म चल रही थी। फिल्म के सीन में लोगों के हाथ
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सीन फिल्म सतलुज का है, जो मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की जिंदगी पर बनी है। उन्होंने पंजाब में 1990 के दशक में हुई 2 हजार से ज्यादा हत्याओं को फेक एनकाउंटर बताया और उसके खिलाफ लड़ाई लड़ी। 3 जुलाई को सतलुज OTT प्लेटफॉर्म पर रिलीज की गई, लेकिन 48 घंटे बाद ही हटा ली गई। तब से लगातार पंजाब के गांव-गांव में ये लोगों को बड़ी स्क्रीन लगाकर दिखाई जा रही है।

फिरोजपुर के चक मारन गांव के एक गुरुद्वारे में महिलाओं और युवाओं के लिए सतलुज फिल्म की स्क्रीनिंग की गई।
सबसे पहले लोगों की बात… ‘पुरखों से किस्से सुने थे, अब फिल्म में देखा- कैसे बेगुनाह मारे गए’
चक मारन गांव में फिल्म की स्क्रीनिंग के दौरान मिले 19 साल के गुरमेल सिंह कॉलेज स्टूडेंट हैं। वे कहते हैं, ‘पुरखों से इन किलिंग के बारे में सुना था। फिल्म में पहली बार देखा। इसे देखकर पता चला कि कैसे बेगुनाहों को मारा गया। सिर्फ सिख ही नहीं, हिंदुओं का भी कत्ल हुआ।‘
गुरुद्वारे में फिल्म देखने आने वालों में ज्यादातर महिलाएं हैं। इन्हीं में से एक बलजीत कौर कहती हैं, ‘फिल्म देखकर पता चला कि 1995 के आस-पास तरनतारन जिले में कैसे परिवार के परिवार उजाड़ दिए गए। किसी का पिता, पति, भाई और बेटा कहां गया, कोई नहीं जानता। इनके लिए लड़ने जसवंत सिंह खालड़ा की कुर्बानी नई पीढ़ी को जाननी चाहिए और उसे याद रखना चाहिए।’

पीड़ित परिवारों की बात… ‘3 की उम्र में पिता को खोया, आज फिल्म से दरिंदगी पता चली‘
फिरोजपुर के कई गांवों में पिछले 10 दिनों में 100 से ज्यादा जगहों पर सतलुज की दिखाई गई। फिरोजपुर से करीब 12 किमी दूर वालिके गांव में रंजीत सिंह मिले। उनका दावा है कि 1990 से 1992 के बीच पंजाब पुलिस ने पिता और चाचा दोनों को फेक एनकाउंटर में मार दिया।
हमने रंजीत से पूछा कि क्या आपने सतलुज फिल्म देखी। उसमें कितना सच है। इस पर वे कहते हैं, ‘फिल्म में हकीकत तो महज 20 फीसदी ही है, बाकी सब तो काट दिया गया। हालांकि इतनी फिल्म से ही पंजाब पुलिस की सच्चाई सामने आ गई है।‘
‘चार बार कोशिश की, लेकिन पूरी फिल्म नहीं देख सका। रो-रोकर बुरा हाल हो जाता। किसी तरह पांचवीं बार में पूरी फिल्म देखी। मां तो देख ही नहीं सकीं। वो कई बार बेहोश हुईं, तो मैंने ही उन्हें रोक दिया।‘

पति आत्मा सिंह की तस्वीर लिए रंजीत की मां हरप्रीत कौर।
हड्डियां तोड़ीं-नाखून उखाड़े, न लाश मिली, न मौत का सर्टिफिकेट
पिता के बारे पूछने पर रंजीत कहते हैं, ‘हम किसान परिवार से हैं। 1991-92 की बात है। पुलिस ने पहले चाचा सरदार परमात्मा सिंह को उठाया और उन्हें मार डाला। पुलिस को शक था कि हमारे घर उग्रवादी आते हैं। हम ही नहीं, उस वक्त हर सिख को टारगेट किया, जैसा फिल्म में दिखाया गया है।‘
‘चाचा के बाद पुलिस ने पापा (आत्मा सिंह) को उठा लिया। तब मैं 3 साल का था और बड़ी बहन 5 की। पुलिस ने पापा के केश (बाल) खोले और खुली जिप्सी के दो हिस्सों में बांध दिए। इसी हाल में उन्हें गांव में 3-4 किमी घुमाया गया। फिर पुलिस सुल्तानपुर लोदी थाने ले गई, जहां उन्हें जानवरों की तरह पीटा गया।‘
‘तीन दिन बाद दादा जी किसी तरह उनसे मिल सके। पुलिस की पिटाई में पापा का दाहिना हाथ दो जगह से टूटा था। एक आंख बाहर आ चुकी थी। जांघ से खून रिस रहा था। दोनों हाथों के नाखून उखाड़ दिए गए थे। दादा को देखकर पापा ने उठने की कोशिश की, लेकिन खड़े नहीं हो सके।‘
‘पापा को छुड़ाने के लिए दादा कई पुलिस अफसरों से मिले, लेकिन सबने पैसे मांगे। उन्हें 24 घंटे का समय दिया और 4 लाख रुपए की डिमांड की। तय समय में दादा जितने पैसे जोड़ सके लेकर थाने पहुंचे, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। पापा को भी मार दिया गया था। उनकी लाश भी उसी हरिके कैनाल में बहा दी गई, जहां जसवंत सिंह खालड़ा को फेंका गया था। उस वक्त न किसी ने हमारी शिकायत सुनी और न रिपोर्ट लिखी।‘

‘सतलुज देखकर महसूस हुआ- पापा के साथ क्या हुआ था‘
इसके बाद हम हरिके कैनाल पहुंचे। जहां 90 के दशक में हुए फर्जी पुलिस एनकाउंटर के बाद लाशें फेंकी गईं। यहां कई पीड़ित परिवार इंसाफ की मांग लेकर जुटे थे। यहीं बैसाखी के सहारे आईं गुरप्रीत कौर बताती हैं, ‘1993 में जब पुलिस ने पापा को घर से उठाया, तब छोटी बहन मां के पेट में थी और मैं 3 साल की थी।‘
‘मां ने बचपन में कुछ नहीं बताया। बड़े हुए तो पता चला कि पापा फेक पुलिस एनकाउंटर में मारे गए थे। अब सतलुज फिल्म देखकर महसूस हो रहा है कि पापा के साथ क्या हुआ होगा।‘

गुरप्रीत चाहती हैं कि हर कोई ये फिल्म देखे ताकि पता चल सके कि 90 के दशक में सिखों के साथ क्या हुआ था।
‘फिल्म ने पिता की शहादत समझाई, बेटियां वर्दी देख सहम जाती हैं’
हरिके कैनाल के पास ही मिले रविंद्र सिंह तरनतारन जिले के नागो गांव के रहने वाले हैं। उनके पिता बिजली बोर्ड में कैशियर थे। 2 जुलाई 1989 को फेक एनकाउंटर में उन्हें मार दिया गया। रविंद्र बताते हैं, ‘तब मैं 3 साल का था। मां से पिता के बारे में पूछता, तो कहतीं- बाबा के पास गए हैं। बड़ा हुआ, तो सच पता चला।‘
‘मैंने सतलुज के OTT पर रिलीज होते ही देख ली थी। फिल्म से ही पिता की शहादत समझ आई। मेरी दोनों बेटियों को भी इसी से अपने दादा के फर्जी पुलिस एनकाउंटर का पता चला। अब बेटियां पुलिस की वर्दी देखकर भी डर जाती हैं।’
’हमारे गांव में भी सतलुज दिखाई गई। फिल्म देखकर सबकी आंखें नम थीं। बच्चों को भी पंजाब का ये काला इतिहास पता चलना चाहिए।’

फेक एनकाउंटर के चश्मदीद बोले… ’फिल्म में पूरा सच नहीं, असलियत में इससे ज्यादा दरिंदगी हुई’
फिरोजपुर में सतलुज फिल्म देखने पहुंचे सतवंत सिंह मानक एनकाउंटर के कई केस में गवाह हैं। गांवों में फिल्म दिखाने को जरूरी बताते हुए कहते हैं, ‘90 के दशक में बहुत झूठे एनकाउंटर किए गए। हम खुद 15 केस से जुड़े रहे हैं। फिल्म में जितना दिखाया, वो पूरा सच नहीं। असल में इससे कहीं ज्यादा दरिंदगी हुई थी।‘
‘हमारे गांव में रहने वाले चरण सिंह को पुलिस सबके सामने उठा ले गई थी। उनके दोनों पैरों को रस्सी के जरिए दो गाड़ियों में बांधा गया और सड़क पर खींचकर मार डाला गया। फिर लाश नहर में फेंक दी। तब पुलिस एनकाउंटर करने के बाद लाश के पेट चीरकर नहर में फेंक देती थी, ताकि लाश तैरकर पानी के ऊपर न आ जाए। पेट काटने से अंदर पानी भर जाता और लाश नहर की गहराई में चली जाती। फिर तेज धार के साथ बह जाती।‘

तरनतारन में मिली राजविंदर कौर और रनजीत कौर। इनके भाई इंद्रजीत को 1993 में फेक एनकाउंटर में मार दिया गया था। दोनों सतलुज फिल्म देखने पहुंचीं, लेकिन पूरी देख नहीं सकीं।
अब फिल्म की स्क्रीनिंग कराने वालों से बात… 500 से ज्यादा स्क्रीनिंग कराई, जब प्रोपेगेंडा फिल्मों पर रोक नहीं तो इस पर क्यों
पंजाब में कुछ राजनीतिक पार्टियां, सामाजिक संस्थाएं और आम लोग गांवों में बड़ी स्क्रीन लगाकर फिल्म दिखा रहे हैं। इनमें सांसद अमृतपाल की पार्टी वारिस पंजाब दे, सामाजिक संस्था मिसल सतलुज और कुछ पार्टियां शामिल हैं। इसे फिरोजपुर, गुरदासपुर, रूपनगर, बठिंडा, तरनतारन और मोगा समेत उन इलाकों में दिखाया जा रहा है, जो 90 के दशक में ऐसे मामलों से ज्यादा प्रभावित थे।
हम मिसल सतलुज संस्था के जनरल सेक्रेटरी देवेंद्र सिंह बताते हैं कि वे अब तक 400-500 जगहों पर सतलुज की स्क्रीनिंग करा चुके हैं। वे कहते हैं, ‘इसके लिए हमें फिल्म प्रोड्यूसर या हीरो ने कोई मैसेज नहीं भेजा। हम चाहते हैं कि 90 के दशक में हुई किलिंग की जानकारी बच्चों तक पहुंचे।’

मिसल सतलुज और सतलुज फिल्म के बीच संबंध पूछने पर कहते हैं, ’हमारी संस्था का इस फिल्म से कोई लेना-देना नहीं है। सतलुज नदी पंजाब की पहचान है, इसलिए हमने संस्था का नाम सतलुज रखा। फिल्म का नाम सतलुज इसलिए रखा गया, क्योंकि एक्स्ट्रा जुडिशियल किलिंग में ज्यादातर लाशें सतलुज में बहाई गई थी।’
हमने पूछा क्या स्क्रीनिंग को लेकर पुलिस-प्रशासन ने कोई रोक-टोक की। इस पर देवेंद्र कहते हैं,
अगर रोक-टोक करेगा भी, तब भी लोग नहीं रुकेंगे। जब धुरंधर जैसी प्रोपेगेंडा फिल्म दिखाई जा सकती है, फिर ये तो पंजाब की हकीकत बयां कर रही है। इसे कैसे रोका जा सकता है।

फिल्म दिखाने के पीछे राजनीतिक मंशा या पंजाब में चुनाव की बात वो सिरे से नकारते हैं।
‘युवाओं को फिल्म दिखाना जरूरी, ताकि खालड़ा की कुर्बानी जान सकें’
फिरोजपुर के जीरा इलाके में सतलुज की स्क्रीनिंग करा रहे जसनूर सिंह बराड़ मिले। वे कहते हैं, ‘ये फिल्म दिखाना जरूरी है। हमारे युवा इमोशनली और मेंटली 1990 के दौर से जुड़ रहे हैं। हमें जसवंत सिंह खालड़ा की कुर्बानी जाननी चाहिए।‘
हमने पूछा क्या आने वाले चुनाव की वजह से फिल्म दिखा रहे या सतलुज की टीम ने अप्रोच किया है। जवाब में जसनूर कहते हैं, ‘चुनाव तो यहां की जनता तय करेगी। हमें एक्टर दिलजीत सिंह दोसांज या फिल्म मेकर्स से कोई मैसेज नहीं आया। न किसी ने अप्रोच किया। ये गांव के लोगों का फैसला है।‘

फिल्म स्क्रीनिंग गैरकानूनी, हाईकोर्ट से FIR कराने की मांग
सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट विनीत जिंदल ने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में एक याचिका लगाई है। इसमें फिल्म सतलुज की स्क्रीनिंग, स्ट्रीमिंग और सार्वजनिक प्रसारण पर रोक लगाने की मांग की गई है। इन्होंने पिटीशन में दावा किया है कि सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) ने फिल्म में करीब 127 कट सुझाए थे, लेकिन फिल्म मेकर्स ने थिएटर रिलीज के बजाय नाम बदलकर इसे ZEE5 पर रिलीज कर दिया।
उनका ये भी दावा है कि फिल्म में कथित रूप से खालिस्तानी उग्रवादियों के प्रति सहानुभूति दिखाई गई है।

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