डियर दिल्ली पुलिस, 20 जुलाई को देश के युवा अपनी मांग के साथ संसद की तरफ जा रहे थे। 5 हजार से ज्यादा सुरक्षाकर्मी लाठी, आंसू गैस और पत्थरों के साथ उनपर टूट पड़े। इस बीच कैमरों पर उनकी कुछ ऐसी हरकतें भी रिकॉर्ड हो गईं, जो गैरकानूनी होने के साथ किसी प्र
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लड़कियों पर गलत तरीके से गलत जगह डंडा मारना, बिना नेमप्लेट की वर्दी, कई के पास तो वर्दी भी नहीं। कार्रवाई के चार तरह के वीडियोज का हमने कानून की कसौटी पर एनालिसिस किया है…
1. प्रदर्शनकारी लड़कियों को गलत तरीके से पीटना

पुलिस की लाठियों के बीच एक लड़की लड़खड़ाकर पेड़ के पास जाती है। एक पुलिसकर्मी लड़की की स्लीवलेस बांह को छूता है, बिना वजह पीछे डंडा मारता है और फिर साथी की तरफ देखकर मुस्कुराता है। ये मुस्कान लड़की छूने के पीछे की मंशा का सबूत है।

भीड़ के बीच से निकल रही लड़की पर एक पुलिसकर्मी पीछे से गलत तरीके से गलत जगह डंडा मारता है। वो ऐसा नहीं करता, तब भी लड़की जा रही थी।

दिल्ली के डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस संदीप लांबा पर खुद आरोप है कि उन्होंने महिला प्रदर्शनकारी के गाल पर थप्पड़ जड़ दिया।
ये कुछ रिकॉर्डेड मामले हैं। लड़कियों ने मीडिया कैमरों पर बताया कि पुरुष सुरक्षाकर्मी लाठियां चलाते हुए गालियां दे रहे थे। अभिजीत दीपके ने दावा किया की दिल्ली पुलिस के पुरुष अफसर ने एक लड़की के कपड़े फाड़े और उसकी छाती पर पैर देकर पीटा है।
नियम-कानून क्या है?
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, यानी BNSS की धारा 43 के मुताबिक, केवल महिला पुलिस कर्मी ही महिला को गिरफ्तार या छू सकती है। सिविल राइट्स एक्टिविस्ट और एडवोकेट विनय श्रीनिवास के मुताबिक, महिला प्रदर्शनकारियों से सिर्फ महिला पुलिस या सुरक्षा बल ही निपट सकते हैं।
- अगर कोई व्यक्ति महिला की मर्यादा को ठेस पहुंचाने के इरादे से उसके साथ मारपीट करता है, तो BNS की धारा 74 के तहत ये अपराध है। इसके लिए 1 से 5 साल की सजा का प्रावधान है।
2. ज्यादातर सुरक्षाकर्मियों के नेमप्लेट गायब थे

प्रदर्शनकारियों पर डंडे चलाने वाले दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के कई जवानों ने अपने नाम वाले बैज नहीं पहने थे। प्रदर्शनकारियों ने सवाल उठाते हुए ऐसे कई वीडियोज बनाए हैं।
RAF की असिस्टेंट कमांडेंट सोनिया सेहरावत ने मीडिया से कहा, ‘हम कुछ प्रोटेक्टिव गियर पहनते हैं, जिसकी वजह से नेमटैग गिर सकते हैं। ये किसी के पैर के नीचे आ सकते हैं। हमें अपने नाम का सम्मान रखना होता है, इसलिए बैज निकाल देते हैं।’
दिल्ली पुलिस के उच्च पदस्थ सूत्रों ने दैनिक भास्कर से कहा कि ऐसी स्थिति में नेमप्लेट टूट जाती है। ये जानबूझकर नहीं किया गया है।
नियम-कानून क्या है?
- पुलिस मैनुअल के मुताबिक, फील्ड ड्यूटी पर तैनात हर पुलिसकर्मी को पूरी यूनिफॉर्म पहननी होती है। इसमें उनके नाम और रैंक वाला बैज भी शामिल होता है। दंगे या प्रदर्शन नियंत्रित करते समय या लाठीचार्ज करते समय बैज निकाल देने का कोई नियम नहीं है।
- 1997 में सुप्रीम कोर्ट ने डीके बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य मामले में फैसला सुनाया कि पुलिसकर्मी बिना नेमटैग के किसी को भी गिरफ्तार नहीं कर सकते हैं।
- यूपी के आईजी रहे रिटायर्ड IPS अफसर एस. आर. दारापुरी के मुताबिक, ‘जंतर-मंतर के वीडियो से साफ है कि कई पुलिसकर्मी नेमप्लेट नहीं पहने हुए थे। उनकी वर्दी पर ऐसे बैज भी नहीं लगे थे, जिनसे उनके पद फोर्स का पता चले। यह पूरी तरह से गैर-कानूनी है। सभी राज्यों के पुलिस नियमों में ड्यूटी के दौरान वर्दी और बैज पहनना जरूरी है, ताकि पुलिसकर्मियों की पहचान हो सके।’
3. बिना वर्दी के प्रदर्शनकारियों को पीटने वाले कौन थे

इस वीडियो में एक शख्स सादे कपड़ों में लाठी लिए बैठा है। उसका हुलिया, कान की बाली, बाल वगैरह देखकर सुरक्षाकर्मी नहीं लग रहा। जब पूछा गया कि सादे कपड़ों में क्यों हो, तो वर्दीधारी पुलिसवालों के साथ लोगों पर लाठियां बरसाने लगता है।

चप्पल पहने बिना वर्दी में यह शख्स भी लगातार डंडे बरसा रहा है। दिलचस्प बात ये है कि उसने चेहरा छुपाने या बचाने के लिए एक हेलमेट पहना है, जो आमतौर पर पुलिस या सुरक्षा बल पहनते हैं।
नियम-कानून क्या है?
- पुलिस की वर्दी से जुड़े स्टैंडिंग ऑर्डर-51 में साफतौर पर लिखा है कि लॉ एंड ऑर्डर, प्रदर्शन, गार्ड ड्यूटी, परेड या अन्य मौकों पर तैनात अधिकारियों और कर्मियों को तय वर्दी पहननी अनिवार्य है।
- पुलिस मैनुअल के मुताबिक, सिविल ड्रेस यानी सादे कपड़ों में तैनात पुलिस सिर्फ इंटेलिजेंस जुटाती है या लॉ एंड ऑर्डर बनाए रखने में सपोर्ट करती है। भीड़ को हटाने, तितर-बितर या लाठीचार्ज करने का आदेश और उसे लागू केवल वर्दीधारी पुलिस बल ही कर सकते हैं।
- BNSS की धारा 148 के मुताबिक, भीड़ हटाने या लाठीचार्ज करने का आदेश सिर्फ इलाके के एग्जिक्यूटिव मजिस्ट्रेट या थाना प्रभारी या उससे ऊपर का अधिकारी ही दे सकता है।
- एस आर दारापुरी मानते हैं कि सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों द्वारा लाठीचार्ज करना पूरी तरह गैरकानूनी है। ये सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और डिपार्टमेंटल ऑर्डर्स का उल्लंघन है। ऐसे में शरारती तत्व सादे कपड़ों में आसानी से भीड़ में घुस कर हंगामा कर सकते हैं।
- अगर सादे कपड़ों में मौजूद कर्मी मारपीट करते हैं या रास्ता रोकते हैं, तो पीड़ित उनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता, यानी BNS की धारा 115(1), 117, 118, 126, 131 और 351 के तहत शिकायत दर्ज करा सकते हैं। क्योंकि सादे कपड़ों में कर्मियों को ऑन-ड्यूटी पुलिस ऑफिसर के रूप में पहचानना मुश्किल है।
- भारतीय न्याय संहिता, यानी BNS की धारा 34 से 44 तक हर नागरिक को अपनी जान बचाने के लिए बल प्रयोग करने का अधिकार देती है। अगर सादे कपड़ों में कोई अनजान व्यक्ति किसी पर हमला कर दे तो वह आत्मरक्षा में पलटवार कर सकता है।
4. जरूरत से बहुत ज्यादा बल का इस्तेमाल

दिल्ली के लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज में एडमिट शेख इरशाद मंसूरी के पैलेट गन से जख्मी होने का दावा किया जा रहा है। लेफ्ट के स्टूडेंट विंग AISA के कार्यकर्ता दानिश ने बताया कि रैपिड एक्शन फोर्स, यानी RAF के वर्दीधारी जवान ने पैलेट गन से मारा था। हालांकि दिल्ली पुलिस और PIB ने इसे गलत और भ्रामक बताया है।

लाठी और आंसू गैस के गोले के अलावा शॉक बैटन के इस्तेमाल का भी दावा जा रहा है। वीडियो में RAF की एक महिला कर्मी कुछ महिला प्रदर्शनकारियों पर शॉक बैटन का इस्तेमाल करते दिख रही है।
अगर ये दावे सही हुए तो ऐसा पहली बार होगा कि दिल्ली में सिविल प्रोटेस्ट में पैलेट गन और शॉक बैटन का इस्तेमाल किया गया।
दिल्ली पुलिस का कहना है कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पैलेट गन और इलेक्ट्रिक स्टन गन (शॉक बैटन) का इस्तेमाल नहीं किया गया है। ये दावे झूठे और भ्रामक हैं। इन अफवाहों को आगे न बढ़ाएं।
नियम-कानून क्या हैं?
- पुलिस द्वारा बल प्रयोग करने की स्टेप-बाय-स्टेप SOP के मुताबिक पहले चेतावनी, फिर पानी की बौछार, आंसू गैस के गोले, हल्का लाठीचार्ज और आखिर में नॉन-लेथल वेपन का इस्तेमाल।
- नॉन-लेथल वेपन, ऐसे कम घातक हथियार हैं, जो किसी व्यक्ति को अस्थायी तौर पर अक्षम कर देते हैं। जैसे- पैलेट गन और शॉक बैटन। ये केंद्रीय रिजर्व पुलिस फोर्स, यानी (CRPF) की दंगा-रोधी इकाई RAF के साजो-सामान में होते हैं।
- केंद्रीय गृह मंत्रालय के मुताबिक, नॉन-लेथल वेपन के तौर पर सुरक्षा बलों को पहले PAVA ग्रेनेड (मिर्च के गोले), STUN-LAC ग्रेनेड (रोशनी-धमाके वाले गोले) और आंसू गैस के गोले इस्तेमाल करने चाहिए। फिर भी भीड़ न हटे तो पैलेट गन का इस्तेमाल करना चाहिए।
- शॉक बैटन को लेकर भी SOP है कि सुरक्षा बल ध्यान रखें कि इसका प्रयोग केवल शांति बहाली और भीड़ खदड़ने के लिए हो। साथ ही ये सुनिश्चित हो कि घायलों की संख्या कम से कम हो।
दैनिक भास्कर के सवालों पर दिल्ली पुलिस के उच्च पदस्थ सूत्र ने कहा कि ये सब एकतरफा कहानियां हैं, जो पुलिस के खिलाफ नैरेटिव बना रही हैं। सब कुछ सीसीटीवी पर कैद है, वीडियोग्राफी कराई गई है, इसलिए कोई छिप नहीं सकता।
एक वकील ने सुप्रीम कोर्ट में प्रदर्शनकारियों के साथ ही बर्बरता का मुद्दा उठाया। तर्क दिया कि पुलिस की सख्ती की वीडियो सबूत मौजूद है। हालांकि CJI सूर्यकांत ने सुनवाई करने से मना कर दिया। उन्होंने कहा, ‘हमें वीडियो में दिलचस्पी नहीं है। हमारे पास देखने का समय नहीं है।’
प्रदर्शनकारियों से मारपीट के आरोपों वाली याचिकाओं पर दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर रिकॉर्ड, जैसे CCTV और अन्य फुटेज, सुरक्षित रखने को कहा है।
सुनवाई के दौरान एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) एस. राजू ने कहा कि याचिकाओं का मकसद पब्लिसिटी पाना था।इस पर हाईकोर्ट ने पूछा, आप यह कैसे कह सकते हैं कि यह पब्लिसिटी के लिए दायर याचिका है?
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डिस्क्लेमर: इस स्टोरी में इस्तेमाल सभी फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हैं। ये विजुअल्स कॉकरोच जनता पार्टी, पत्रकारों और प्रदर्शनकारियों द्वारा पोस्ट किए गए हैं। दैनिक भास्कर इनकी टाइमिंग, लोकेशन और सत्यता की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता। स्टोरी में लगाए गए आरोप संबंधित पक्षों (प्रदर्शनकारी, CJP प्रवक्ता वगैरह) के दावे हैं।
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