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- Rajdeep Sardesai Column | Conspiracy Theories Vs Truth In Delhi Politics
4 घंटे पहले
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राजदीप सरदेसाई वरिष्ठ पत्रकार
दिल्ली के सत्ता गलियारों में साजिश के सिद्धांत (कॉन्स्पिरेसी थ्योरीज़) हमेशा फलते-फूलते रहे हैं। लेकिन आज के अत्यधिक ध्रुवीकृत भारत में वे केवल गपशप भर नहीं रह गए हैं। अब वे राजनीतिक हथियार बन चुके हैं, जिनका इस्तेमाल विरोधियों की वैधता पर सवाल उठाने, आंदोलनों को बदनाम करने और असहज सवालों का सामना करने से बचने के लिए किया जाता है।
ताजा निशाने पर हैं सोनम वांगचुक और कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी), जो राष्ट्रीय राजधानी को झकझोर देने वाले छात्र आंदोलनों की पृष्ठभूमि में हैं। यह पूछने के बजाय कि पेपर लीक, परीक्षाओं में देरी और बेरोजगारी को लेकर युवा क्यों नाराज हैं, उन लोगों की मंशा पर सवाल उठाने में अधिक रुचि दिखाई जा रही है, जो इन आंदोलनों का नेतृत्व कर रहे हैं।
कांग्रेस से जुड़े समूहों में व्यापक रूप से प्रचलित एक सिद्धांत के अनुसार, वांगचुक और सीजेपी सरकार के ही “डीप स्टेट’ का हिस्सा हैं, जिन्हें इसलिए आगे किया गया, ताकि नीट विवाद को उठाने का राजनीतिक श्रेय कांग्रेस को न मिल सके। इस दावे के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य मौजूद नहीं है। फिर भी ऐसे दौर में, जब संदेह तथ्यों से अधिक तेजी से फैलता है, साजिश के सिद्धांत भी बहुत जल्दी अपनी पैठ बना लेते हैं।
सोनम वांगचुक का मामला ही देखिए। जब लद्दाख में अधिक स्वायत्तता की मांग वाला आंदोलन तेज हुआ, तब वांगचुक को एनएसए के तहत हिरासत में लिया गया था। उन्होंने छह महीने जेल में बिताए और बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया, लेकिन उन्हें क्यों कैद किया गया था, इसका कोई ठोस स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। उन्हें विदेशी फंडिंग से जुड़ा, राष्ट्र विरोधी और चीन-समर्थक एजेंट तक बताया गया। उनके भाषणों के चुनिंदा हिस्सों को संदर्भ से अलग करके एक सुविधाजनक नैरेटिव के अनुरूप प्रस्तुत किया गया।
अब विडम्बना यह है कि उसी व्यक्ति को कुछ नेता आईबी की कठपुतली बता रहे हैं। आरोप लगाया जा रहा है कि उन्हें सरकार के खिलाफ कांग्रेस के अभियान से ध्यान भटकाने के लिए आगे बढ़ाया गया है। कोई व्यक्ति पहले चीन-समर्थक बताकर बदनाम किया जाए और फिर उसी पर भारतीय-सत्तातंत्र के लिए काम करने का आरोप लगाया जाए- ऐसा कैसे हो सकता है?
मैं सोनम वांगचुक को लगभग दो दशकों से जानता हूं। उनसे मेरी पहली मुलाकात 2008 में हुई थी, जब शिक्षा और पर्यावरण के क्षेत्र में उनके कार्य के लिए उन्हें रियल हीरो सम्मान से नवाजा गया था। कोई व्यक्ति उनके हर विचार से सहमत हो या नहीं, यह अलग बात है। लेकिन लोकतंत्र की बुनियाद ही इस स्वीकार्यता पर टिकी है कि सत्ता से असहमति का अर्थ देश से विश्वासघात नहीं होता।
स्वयं केंद्र सरकार ने कई अवसरों पर सार्वजनिक रूप से वांगचुक के कार्य की सराहना की है। मार्च 2023 में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने वांगचुक और उनकी पत्नी से मुलाकात के बाद एक्स पर एक तस्वीर साझा की थी और शिक्षा-प्रणाली को बदलने के उनके प्रयासों की प्रशंसा की थी। अब जब वांगचुक नीट विवाद में जवाबदेही की मांग उठाने वाले प्रमुख चेहरों में शामिल हो गए हैं, तब वह प्रशंसा गायब हो चुकी है।
दूसरी ओर, सीजेपी को भी सरकार इंटरनेट तक सीमित एक मामूली समूह मानकर नजरअंदाज करती रही थी। लेकिन जब छात्र सड़कों पर उतर आए, तब जाकर उसके अस्तित्व को स्वीकार करना शुरू किया। कांग्रेस ने भी मान लिया था कि सीजेपी दरअसल आप पार्टी का ही मुखौटा है, क्योंकि उसके संस्थापक का कभी आप पार्टी से संबंध रहा था। शायद कांग्रेस आज भी 2011 के जख्मों को याद रखे हुए है, जब अण्णा हजारे का आंदोलन उसकी सरकार के पतन की प्रक्रिया को तेज कर गया था।
कांग्रेस से जुड़े समूहों में व्यापक रूप से प्रचलित एक सिद्धांत के अनुसार, वांगचुक और सीजेपी सरकार के ही “डीप स्टेट’ का हिस्सा हैं, जिन्हें इसलिए आगे किया गया, ताकि नीट विवाद को उठाने का श्रेय कांग्रेस को न मिल सके। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

