Headlines

Depression Vs Anxiety; Mental Health Conditions Early Signs


  • Hindi News
  • Lifestyle
  • Depression Vs Anxiety; Mental Health Conditions Early Signs | Panic Attack Sadness

1 घंटे पहले

  • कॉपी लिंक

सवाल– मेरी उम्र 47 साल है। पिछले कुछ महीनों से किसी भी काम में मन नहीं लग रहा। छोटी-छोटी बात पर बहुत चिंता होने लगी है। परिवार का कोई सदस्य फोन न उठाए तो लगता है कि कहीं कोई हादसा न हो गया हो। ऑफिस में हमेशा डर रहता है कि मुझसे कोई बड़ी गलती हो जाएगी। कई बार बिना किसी वजह दिल तेजी से धड़कने लगता है और बेचैनी होने लगती है। अब चीजें भी भूलने लगी हूं। क्या यह सामान्य चिंता है या एंग्जाइटी का संकेत? क्या मुझे दवा लेनी चाहिए?

एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर।

सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। आपके बताए लक्षण सिर्फ सामान्य चिंता जैसे नहीं लगते। कई महीनों से किसी काम में मन न लगना, हर समय चिंता करना, बिना वजह सबसे बुरा सोच लेना, याददाश्त और फोकस कमजोर होना, दिल की धड़कन तेज होना और बेचैनी महसूस होना। ये सब इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि आपको एंग्जाइटी के साथ डिप्रेशन भी हो सकता है।

ऐसा मैं सिर्फ उतनी जानकारी के आधार पर कह रहा हूं, जितनी आपने सवाल में दी है। जैसाकि आपके सवाल से जाहिर है कि ऐसा महसूस करने के पीछे कोई तात्कालिक बुरी घटना या अनुभव जिम्मेदार नहीं है।

सिर्फ लक्षणों से डायग्नोसिस नहीं

हालांकि, सिर्फ इन लक्षणों के आधार पर ही बीमारी तय नहीं की जा सकती। श्योर होने और फिर सही इलाज के लिए यह जानना जरूरी है कि परेशानी कब से है, कितनी गंभीर है और इसका आपकी रोजमर्रा की जिंदगी पर कितना असर पड़ रहा है।

सही डायग्नोसिस के लिए डॉक्टर ये सारी चीजें देखते और उसका मूल्यांकन करते हैं, जैसेकि–

  • आपकी नींद
  • भूख का पैटर्न
  • एनर्जी लेवल
  • कहीं कोई दूसरी बीमारी तो नहीं जैसेकि थायरॉइड
  • मेनोपॉज
  • क्या कोई और हेल्थ कंडीशन है
  • क्या आप कोई दवाएं लेती हैं

जरूरत पड़ने पर कुछ मेडिकल टेस्ट भी करवाए जा सकते हैं।

सामान्य चिंता या एंग्जाइटी डिसऑर्डर?

हर चिंता बीमारी नहीं होती। तनावपूर्ण परिस्थितियों में चिंता होना सामान्य है। लेकिन जब चिंता बिना वजह होने लगे, लंबे समय तक बनी रहे और रोजमर्रा की जिंदगी पर असर डालने लगे, तो यह एंग्जाइटी डिसऑर्डर का संकेत हो सकता है। इसलिए दोनों के बीच का अंतर समझना जरूरी है।

डिप्रेशन सिर्फ उदासी नहीं है

अक्सर लोग सोचते हैं कि डिप्रेशन का मतलब हर समय रोना या उदास रहना है। ऐसा जरूरी नहीं है। कई लोग बाहर से बिल्कुल सामान्य दिखाई देते हैं, लेकिन अंदर ही अंदर लगातार संघर्ष कर रहे होते हैं।

डिप्रेशन में व्यक्ति को पहले पसंद आने वाले काम भी अच्छे नहीं लगते। किसी काम की शुरुआत करने का मन नहीं करता। छोटी-सी जिम्मेदारी भी भारी लगने लगती है। इसके साथ कई और लक्षण भी हो सकते हैं, जैसेकि–

  • किसी काम में मन न लगना।
  • हमेशा थकान महसूस होना।
  • नींद कम या ज्यादा आना।
  • भूख बदल जाना।
  • छोटी बात पर चिड़चिड़ापन।
  • लोगों से मिलने का मन न करना।
  • खुद को दोष देना।
  • भविष्य को लेकर निराश होना।
  • ध्यान लगाने में परेशानी।
  • छोटे फैसले भी मुश्किल लगना।

अगर इनमें से दो या उससे ज्यादा लक्षण दो हफ्ते से ज्यादा समय तक बने रहें और नौकरी, परिवार या रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगे तो किसी मनोचिकित्सक या क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट से सलाह लेनी चाहिए। डिप्रेशन के सभी शुरुआती संकेत नीचे ग्राफिक में देखिए–

क्या एंग्जाइटी में कमजोर हो सकती है याददाश्त?

जी हां। बहुत से लोग सोचते हैं कि उन्हें भूलने की बीमारी हो गई है, लेकिन कई बार इसकी वजह एंग्जाइटी या डिप्रेशन भी हो सकती है।

जब दिमाग हर वक्त चिंता और नकारात्मक विचारों में उलझा रहता है तो नई जानकारी पर पूरा ध्यान नहीं दे पाता। इसलिए चीजें याद नहीं रहतीं।

उदाहरण के लिए आप ये सारी बातें भूल सकते हैं–

  • आपने चाबी कहां रखी।
  • किसी से क्या बात हुई।
  • कोई भी और जरूरी काम।

इसलिए अगर ऐसा बार–बार हो तो तुरंत इसे मेमोरी से जुड़ी कोई बीमारी मान लेना ठीक नहीं है। पहले यह समझना जरूरी है कि भूलने की वजह कहीं मानसिक तनाव तो नहीं है।

इसके साथ ही अगर भ्रम होना, रास्ता और पता भूलना जैसी घटनाएं हों या रोजमर्रा के काम करना मुश्किल होने लगे तो डॉक्टर से जांच जरूर करानी चाहिए।

सामान्य चिंता कब बन जाती है बीमारी?

मान लीजिए, घर का कोई सदस्य फोन नहीं उठाता। ज्यादातर लोग सोचेंगे कि शायद वह व्यस्त होगा या उसका फोन साइलेंट होगा। लेकिन एंग्जाइटी में दिमाग सीधे सबसे बुरे नतीजे पर पहुंच जाता है। जैसे कहीं एक्सीडेंट तो नहीं हो गया? कहीं कोई अनहोनी तो नहीं हो गई?

इसे ‘कैटेस्ट्रॉफिक थिंकिंग’ कहा जाता है यानी बिना सबूत के सबसे खराब संभावना को सच मान लेना। ऐसा कभी-कभी होना सामान्य है। लेकिन अगर यह लगभग हर दिन होने लगे तो यह एंग्जाइटी डिसऑर्डर का संकेत हो सकता है।

पैनिक अटैक जैसा महसूस हो तो क्या करें?

एंग्जाइटी में कई बार शरीर भी तेजी से प्रतिक्रिया देता है। अचानक दिल तेज धड़कने लगता है। पसीना आने लगता है। हाथ-पैर कांपते हैं। सांस तेज चलने लगती है। ऐसा महसूस होता है कि कुछ बहुत बुरा होने वाला है। इसे पैनिक अटैक कहा जा सकता है।

हालांकि, हर बार धड़कन तेज होना एंग्जाइटी की वजह से ही हो, यह जरूरी नहीं है। इसके पीछे थायरॉइड, एनीमिया, मेनोपॉज, हार्ट से जुड़ी कोई गड़बड़ी, ज्यादा कैफीन का सेवन या कुछ दवाएं भी कारण हो सकती हैं।

इसलिए अगर ऐसे लक्षण बार-बार दिखें तो पहले फिजिशियन से जांच कराएं। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर ईसीजी, ब्लड प्रेशर और कुछ ब्लड टेस्ट कराने की सलाह दे सकते हैं।

एंग्जाइटी: एक सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट

यहां मैं आपको एक सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट दे रहा हूं। नीचे ग्राफिक्स में 2 हिस्सों में कुल 30 सवाल हैं। आपको इन सवालों को 0 से 2 के स्केल पर रेट करना है। जैसेकि पहले सवाल के लिए अगर आपका जवाब ‘नहीं’ है तो 0 नंबर दें और अगर आपका जवाब ‘अक्सर’ है तो 2 नंबर दें। पहले भाग के कुछ सवालों के आगे स्टार (*) लगा हुआ है। इन सवालों को उल्टा स्कोर करना है। जैसेकि तीसरे सवाल में अगर आनंद आया तो 0 और नहीं आया तो 2 अंक देना है।

स्कोर इंटरप्रिटेशन: इसे कैसे समझें

यह स्कोर किसी तरह का डायग्नोसिस नहीं है। इसका उपयोग सिर्फ यह पहचानने के लिए करना है कि कौन-से लक्षण बार-बार दिख रहे हैं। दो सप्ताह तक लगातार सवालों को स्कोर करें, उसकी तुलना करें। यदि एक रिपीट पैटर्न दिखे, दो से चार सप्ताह में लक्षण कम न हों या बढ़ते जाएं तो अपना प्रोफेशनल एसेसमेंट कराएं।

चार सप्ताह का CBT बेस्ड सेल्फ हेल्प प्लान

पहला सप्ताह

अपने पैटर्न को पहचानें

रोज डायरी में लिखें-

घटना → स्वतः आया विचार → भावना → शरीर की प्रतिक्रिया → आपने क्या किया।

उदाहरण:

  • घटना- परिवार ने फोन नहीं उठाया।
  • स्वतः आया विचार- जरूर दुर्घटना हुई है।
  • भावना- डर 9/10
  • शरीर की प्रतिक्रिया- हार्टबीट तेज होना।
  • आपने क्या किया- दस बार फोन किया।

यह रिकॉर्ड दिखाएगा कि बेचैनी केवल परिस्थिति से नहीं, उसके इंटरप्रिटेशन से भी बढ़ती है।

दूसरा सप्ताह

डरावने विचारों की शिनाख्त

जब भी मन में कोई परेशान करने वाला विचार आए तो खुद से पूछें:

  • इस विचार के समर्थन में क्या सबूत है?
  • इसके विरुद्ध क्या सबूत है?
  • सबसे खराब नहीं, बल्कि सबसे संभावित कारण क्या है?
  • यही परिस्थिति किसी दोस्त की होती तो मैं उसे क्या समझाती?

तीसरा सप्ताह

एक्टिविटी पहले, मोटिवेशन बाद में

डिप्रेशन कहता है, “मन होगा, तब काम करूंगी।” CBT में इस क्रम को उलटा कर देते हैं। अब आपको हर दिन ये चार चीजें करनी हैं-

  • कोई भी एक जरूरी काम
  • एक खुशी देने वाली एक्टिविटी
  • एक फिजिकल एक्टिविटी
  • किसी दोस्त, भरोसेमंद से बातचीत

चौथा सप्ताह

चिंता का टाइम फिक्स करना

रोज एक निश्चित 20 मिनट का समय ‘चिंता’ के लिए फिक्स कर दें। दिन में जब भी मन में चिंता आए तो उसे लिखकर कहें, “मैं फिक्स टाइम पर ही इस बारे में सोचूंगी। अभी तुम जाओ।”

क्या एंग्जाइटी की दवा खुद से लेनी चाहिए?

बिल्कुल नहीं। कई लोग घबराहट होने पर खुद ही Alprazolam, Clonazepam या Diazepam जैसी दवाएं लेना शुरू कर देते हैं। ऐसा करना ठीक नहीं है।

इन दवाओं से नींद ज्यादा आ सकती है। इनकी आदत भी पड़ सकती है। लंबे इस्तेमाल से मेमोरी पर असर पड़ सकता है। इसलिए साइकेट्रिस्ट के बताए बिना अपने मन से कोई दवा न लें।

अंतिम बात

मेंटल हेल्थ से जुड़ी समस्याएं किसी की कमजोरी नहीं होतीं। इन्हें छिपाने या सहते रहने के बजाय समय पर पहचानना जरूरी है। जितनी जल्दी सही सलाह और इलाज मिलता है, उतनी जल्दी चिंता कम होती है। नींद, ध्यान, आत्मविश्वास और जीवन में रुचि भी धीरे-धीरे वापस आने लगती है।

…………………….

ये खबर भी पढ़िए

मेंटल हेल्थ- शादी के बाद नौकरी छोड़ दी: अब सिर्फ एक पत्नी और मां हूं, सबको खुश करने की कोशिश में अपनी खुशी भूल गई, क्या करूं

ये समस्या आपकी अकेले की नहीं है। हजारों महिलाएं जीवन के किसी-न-किसी मोड़ पर ये महसूस करती हैं। वे अच्छी मां हैं, जिम्मेदार पत्नी हैं, परिवार की मजबूत आधारशिला हैं, लेकिन जब बात खुद की आती है तो जवाब धुंधला पड़ जाता है। पूरी खबर पढ़िए…

खबरें और भी हैं…



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *