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रीटा कोठारी का कॉलम:हम पराये लोगों की कहानियों में भी अपना कुछ ढूंढ लेते हैं




मैं साहित्य पढ़ाती हूं किंतु साहित्य से मेरा रिश्ता कब और कैसे जुड़ा? इस सवाल पर गौर करते हुए मुझे याद है वह वाकया जब मैं मुश्किल से दस-बारह साल की थी। सिंधी घर की एक सांवली लड़की- जिसके बारे में मां कहती रहती- ‘रीटा सांवरी आ’। पिताजी को लगा होगा बेटी का आत्मविश्वास टूट जाएगा, इसलिए मुझे एलिजाबेथ बेनेट के बारे में बताने लगे। एलिजाबेथ जेन ऑस्टन के नॉवेल ‘प्राइड एंड प्रिजुडिस’ की किरदार है। वह सामान्य घर की लड़की है और सामान्य दिखती है पर उसके आत्मविश्वास की क्या कही जाए! पिताजी का यह कहानी सुनाना मेरे लिए एक बीज बन गया। पिता मुझे स्मिता पाटिल की फिल्म ‘मंथन’ भी दिखाने ले गए और कहने लगे कि देखा उनकी आंखों में कितनी तीव्रता है? यह भी सौंदर्य है। इन मिसालों को मैं भूल-सी गई थी किंतु बात करते-करते हर बात याद आती है। कहानियों के किरदार जीवन में दोस्त बन जाते हैं। काल्पनिक दुनिया का वास्तविक दुनिया पर भी गहरा असर होता है- इस बात में मुझे बड़ी आस्था है। हम आजकल साहित्यकारों को सेलेब्रिटी की तरह देखते हैं, उन्हें उत्सवों में सुनने जाते हैं, किंतु साहित्य के जो बुनियादी सवाल हैं उनके बारे में ज्यादा सोचते नहीं हैं। पराये लोगों और पराई संस्कृति को जानना क्यों जरूरी है? हमारे निज का परायों से क्या रिश्ता है? काल्पनिक पात्र कब हमारे बीच आ बसते हैं और उनसे हमारी जिंदगियां या उन्हें देखने के नजरिये कैसे बदलते हैं- यह चर्चाएं क्या पुरानी हो गई हैं इसलिए अब नहीं होतीं? या फिर साहित्य के साथ हमारे रिश्ते में अब ठहराव नहीं है? कई बार यह भी होता है कि हम मुख्य पात्र को छोड़कर किसी और से आकर्षित हो जाते हैं। मिसाल के तौर पर मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास ‘गोदान’ में मुझे होरी नहीं, गोबर अधिक पसंद आया। उसका रोष, उसकी बेचैनी और शहर जाकर एक मजदूर के उसके अनुभव ज्यादा याद रह गए। मैं आपको अनन्तमूर्ति के उपन्यास ‘संस्कार’ के बारे में भी बताना चाहूंगी। इसमें मुख्य भूमिका प्रणेशाचार्य की है। वेदों का ज्ञान, नीति, धर्म, जवाबदारी के प्रतीक- प्रणेशाचार्य एक खूब शांत, सुशील और प्रभावशाली नायक हैं। उन्होंने पूरी जिंदगी अपनी अपाहिज और बीमार धर्मपत्नी भगीरथी की सेवा की। लेकिन एक दलित स्त्री चंद्री से सम्बन्ध बनाकर वे अपनी नजरों में गिर जाते हैं और चल पड़ते हैं अकेले सब छोड़कर, ताकि पश्चाताप करें और अपने आप से पूछें कि इस घोर पाप को कैसे समझा जाए। किंतु रास्ते में उन्हें एक खूब बातूनी आदमी मिलता है, जिसका नाम है पुट्टा। वह जिंदगी के हर रस को चखने में विश्वास करता है और शुद्धि-अशुद्धि से उसके विचार परे हैं। उसकी बातें प्रणेशाचार्य को घेर लेती हैं। मुझे वह पात्र खूब जंचा- जीवन के करीब लगा। ऐसा बातूनी ही तो है जीवन, जो अकेला-तनहा नहीं छोड़ता। पुट्टा प्रणेशाचार्य से कहता है, मैं किसी बीते हुए जन्म का कोई पाप हूं जो आपसे चिपक गया हूं। मैं इस बात को भूल नहीं पाई कि जब-जब हम सोचते हैं कि हमें अकेले अपने मसलों पर गौर करना है, हमारे आस-पास की आवाजें साथ होती हैं। ‘संस्कार’ की याद मेरे लिए प्रणेशाचार्य का संयम नहीं, पर पुट्टा की बातों से सत्य बनता है। हम पराये लोगों की कहानियों में अपना कुछ ढूंढ लेते हैं- एक छोटी-सी बात, जो शायद लेखक ने भी न सोची हो। यह पाठक की स्वतंत्रता है जिसकी चर्चा का अब अवकाश नहीं रहा। साहित्य एक पदार्थ बन गया है, चिंतन का मौका नहीं रहा। जब अंतर तक जाकर स्मृतियां बन जाती हैं, तब साहित्य के बुनियादी फायदे महसूस होते हैं। मैं बताना भूल गई कि ‘प्राइड एंड प्रिजुडिस’ का गुजराती अनुवाद पढ़ कर मुझे पिताजी ने कहानी सुनाई थी। हमारे घर अंग्रेजी की किताबें नहीं थीं। शायद इसी से मेरा अनुवाद से इतना गहरा रिश्ता है- दूर बसे लोगों से अनुवाद द्वारा बात होती है। फिर यह भी जाना कि पास रहते लोगों को समझने के लिए भी अनुवाद ही जरिया है। तमिल-मलयालम साहित्य को मैंने ऐसे ही जाना है। अनुवाद सिर्फ भाषाओं का नहीं होता, वह एक जिंदगी को दूसरी में अनूदित करने की क्रिया भी है। इस पूरी बात में निज क्या और पराया क्या- कहां स्वयं पूरा होता है और दूजा शुरू होता है- इन सवालों पर आकर ठहर-सी गई हूं।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)



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