Headlines

India RAW Mission Vs Pakistan; Operation Kahuta Story Explained


बात 1977 की है। पाकिस्तानी फौज के हेडक्वार्टर रावलपिंडी से करीब 50 किलोमीटर दूर कहूटा। छोटा सा शहर। भारत के जम्मू-कश्मीर का पुंछ यहां से महज 70 किलोमीटर है।

.

सुबह का वक्त था। एक सैलून में बाल कटाने वालों की भीड़ थी। कैंचियों की ‘खिच-खिच’ और रेडियो पर बजते फिल्मी गानों बीच कई लोग अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे।

तभी सैलून का दरवाजा खुला। दो फौजी अफसर अंदर दाखिल हुए। उन्होंने कड़क आवाज में कहा, ‘पहले हमारे बाल काटो…वक्त नहीं है अपने पास।’ वे सीधे जाकर कुर्सी पर बैठ गए।

सैलून के कोने में बैठे तीन लड़के अखबार पढ़ रहे थे। कड़क आवाज सुनते ही उनकी नजरें फौजियों पर टिक गईं।

अब नाई ने बाल काटना शुरू किया। लड़कों की नजर फर्श पर गिर रहे फौजियों के बालों पर थी। थोड़ी देर बाद फौजी बाल कटवाकर चले गए।

अब सैलून वाला झाड़ू लेकर उन बालों को साफ करने के लिए आगे बढ़ा, तभी तीन में से दो लड़के आपस में भिड़ गए।

‘तूने मुझे गाली कैसे दी?’ एक चिल्लाया। ‘तेरी हिम्मत कैसे हुई मुझसे ऐसे बात करने की।’ दूसरे ने उसका कॉलर पकड़ लिया। सैलून में हड़कंप मच गया। नाई झाड़ू छोड़कर दोनों को छुड़ाने लगा। सैलून में बैठे बाकी लोग भी मार-पीट को शांत कराने में जुट गए।

इधर, चुपचाप बैठा तीसरा लड़का धीरे से उठा। फर्श पर गिरे फौजियों के बालों को समेटकर एक लिफाफे में डाला और जेब में रखकर चुपचाप निकल गया।

कहूटा के सैलून में जानबूझकर लड़ाई करते हुए RAW के जासूस। AI इमेज

कहूटा के सैलून में जानबूझकर लड़ाई करते हुए RAW के जासूस। AI इमेज

लड़का भागता हुआ रावलपिंडी स्टेशन पहुंचा। वहां से ट्रेन पकड़कर लाहौर आया। प्लेटफॉर्म पर भारत जाने वाली समझौता एक्सप्रेस खड़ी थी। लड़का खिड़कियों से अंदर झांकते हुए आगे बढ़ा।

अचानक उसने एक शख्स से पूछा- ‘जनाब दिल्ली जा रहे हैं क्या? शख्स ने सिर हिलाया- जी हां।’

थोड़ी देर बाद, भीड़ का फायदा उठाकर लड़का बोगी के अंदर गया और लोगों की नजरों से बचकर उस अनजान मुसाफिर के बैग में वो लिफाफा रख दिया।

करीब 10 घंटे बाद ट्रेन पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंची। भारत की खुफिया एजेंसी RAW के अफसर वहां मौजूद थे। जांच के नाम पर एक-एक बैग की तलाशी ली गई। फिर एक अफसर के हाथ वो लिफाफा लग गया।

अफसर उस लिफाफे को लेकर फौरन एक फॉरेन्सिक लैब पहुंचा। उसने एक अधिकारी से कहा- ‘अर्जेंट है। प्लीज इस सैंपल की जांच कीजिए।’

वैज्ञानिक ने लिफाफे से बाल निकाले और एक मशीन के भीतर रखकर स्विच ऑन कर दिया। मशीन की लाल लाइटें चमकने लगीं और मॉनिटर का ग्राफ तेजी से ऊपर होने लगा।

वैज्ञानिक ने घबराहट में री-चेकिंग की, पर नतीजा नहीं बदला। आखिर उन बालों में क्या था? पाकिस्तान के किस राज से पर्दा उठने वाला था? आज ‘स्पाई फाइल्स’ सीरीज में कहानी भारत के खुफिया ‘ऑपरेशन कहूटा’ की…

दिल्ली के एक फॉरेंसिक लैब में पाकिस्तान से आए फौजियों के बालों की जांच करते हुए वैज्ञानिक। AI इमेज

दिल्ली के एक फॉरेंसिक लैब में पाकिस्तान से आए फौजियों के बालों की जांच करते हुए वैज्ञानिक। AI इमेज

कहानी की शुरुआत होती है 1962 के भारत-चीन जंग से। चीन ने लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश के एक हिस्से पर अचानक हमला कर दिया।

एक महीने तक जंग चली। भारत बुरी तरह हार गया। करीब 38 हजार वर्ग किलोमीटर जमीन पर चीन ने कब्जा कर लिया। नेहरू की सरकार कठघरे में थी। देश की सुरक्षा और आधुनिक हथियारों की जरूरतों को लेकर बहस छिड़ी हुई थी।

इसी बीच 1964 में चीन ने परमाणु परीक्षण कर दिया। पूरी दुनिया चौंक गई। देश में यह मांग जोर पकड़ने लगी कि भारत को बचे रहना है, तो हर हाल में परमाणु बम बनाना होगा।

1965 की एक तपती दोपहर। कराची में पाकिस्तान के विदेश मंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो पत्रकारों से बात कर रहे थे। एक पत्रकार ने सवाल दागा- ‘भुट्टो साहब, अगर हिंदुस्तान ने परमाणु बम बना लिया, तो पाकिस्तान क्या करेगा?’

भुट्टो के चेहरे के भाव बदल गए। उन्होंने गुस्से में कहा- ‘अगर हिंदुस्तान परमाणु बम बनाता है, तो हम भी बनाएंगे। इसके सिवा हमारे पास और कोई रास्ता नहीं है। भले ही हमें घास खानी पड़े या पत्ते चबाने पड़ें। जरूरत पड़ी, तो हम भूखे पेट भी सो जाएंगे।’

इधर, पाकिस्तान, भारत पर हमले की तैयारी कर रहा था। वह यह सोच बैठा था कि चीन से मात खाने के बाद हिंदुस्तान कमजोर पड़ चुका है। अप्रैल 1965 में उसने गुजरात के कच्छ में कुछ इलाकों पर कब्जा कर लिया।

कुछ दिनों बाद दोनों देशों के बीच सुलह हुई, लेकिन जुलाई में पाकिस्तान ने कश्मीर को भारत से अलग करने के लिए ऑपरेशन जिब्राल्टर शुरू कर दिया।

भारत ने फौरन जवाबी कार्रवाई शुरू की और अगस्त महीने में पीओके के दाना और दर्रा हाजीपीर इलाके पर कब्जा कर लिया, लेकिन इतना काफी नहीं था।

फिर आई 6 सितंबर की सुबह। भारत की फौज लाहौर के बाहरी इलाके तक पहुंच गई। जोरदार हमला कर दिया।

तब पाकिस्तान को लगा कि कश्मीर हथियाने के चक्कर में कहीं उसका लाहौर न छीन जाए। आखिरकार यूनाइटेड नेशन्स की पहल पर 23 सितंबर को दोनों देश सीज फायर पर राजी हो गए।

ठीक 15 दिन बाद… 8 अक्टूबर को भारत के मशहूर परमाणु वैज्ञानिक डॉ. होमी भाभा ने ऑल इंडिया रेडियो पर ऐलान किया- ‘अगर मुझे छूट दी जाए तो भारत 18 महीने के भीतर परमाणु बम बना सकता है।’

तीन महीने बाद यानी 10 जनवरी 1966 को भारत और पाकिस्तान के बीच ताशकंद में समझौता हुआ, लेकिन 12 घंटे बाद ही आधी रात में प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मौत हो गई।

अचानक हुई शास्त्री की मौत पर साजिश की बात चल ही रही थी कि 24 जनवरी को लंदन जा रहे एक विमान हादसे में परमाणु वैज्ञानिक होमी भाभा का निधन हो गया। चर्चा होने लगी कि दोनों मौतों में कोई ना कोई कड़ी तो है।

ताशकंद समझौते के तुरंत बाद की फोटो। शास्त्री जी और अयूब खान हाथ मिला रहे हैं। ये शास्त्री जी की मृत्यु के पहले की आखिरी तस्वीर है।

ताशकंद समझौते के तुरंत बाद की फोटो। शास्त्री जी और अयूब खान हाथ मिला रहे हैं। ये शास्त्री जी की मृत्यु के पहले की आखिरी तस्वीर है।

7 साल बाद… 3 अगस्त 1972, अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA ने पाकिस्तान सरकार को बताया कि भारत बहुत जल्द परमाणु परीक्षण करने वाला है।

1971 की जंग हार चुका पाकिस्तान बेचैन हो उठा, लेकिन परीक्षण कब होगा, कहां होगा और किस रूप में होगा, इसकी जानकारी CIA को भी नहीं थी। पाकिस्तान इधर-उधर हाथ-पैर मारता रहा।

2 साल बाद, तारीख-13 मई 1974 और जगह- राजस्थान का पोकरण। भारत के परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष होमी सेठना की देखरेख में वैज्ञानिकों ने परमाणु डिवाइस असेंबल करना शुरू किया।

14 मई की रात ढलने से पहले, उस डिवाइस को L शेप के एक गहरे गड्ढे में पहुंचा दिया गया। काम का पहला चरण पूरा हो चुका था, अब बारी थी फैसले की।

अगली सुबह, सेठना साहब ने दिल्ली का रुख किया। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मुलाकात का वक्त पहले से मुकर्रर था।

सेठना ने इंदिरा से कहा- ‘मैडम… हमने उस डिवाइस को असेंबल कर दिया है। अब आप यह मत कहिएगा कि उसे बाहर निकालो। ऐसा करना मुमकिन नहीं है। अब आप भी हमें आगे बढ़ने से नहीं रोक सकतीं।’

इंदिरा के चेहरे पर न कोई शिकन थी, न कोई हिचकिचाहट। उन्होंने बड़ी सहजता से कहा- ‘क्या तुम्हें डर लग रहा है, सेठना?’

सेठना के होठों पर मुस्कान उभर आई, बोले- ‘बिल्कुल नहीं, प्रधानमंत्री जी। मैं तो बस आपको बता रहा था कि अब इस रास्ते पर वापसी का कोई मोड़ नहीं है।’

इंदिरा ने मुस्कुराते हुए कहा- ‘गो अहेड।’

अगले दिन सेठना वापस पोकरण पहुंचे। टीम को एक जगह जमा किया। माहौल में एक अजीब सा सन्नाटा था। सेठना ने सबकी तरफ देखा और पूछा- ‘साथियों, अगर यह मिशन नाकाम रहा, तो किसका सिर काटा जाना चाहिए?’

बम का डिजाइन तैयार करने वाले राजगोपाल चिदंबरम ने झट से जवाब दिया- ‘मेरा, मेरा सिर काट लीजिएगा।’

18 मई 1974, सुबह के ठीक 9 बज रहे थे। आकाशवाणी के दिल्ली स्टेशन पर उस दौर की ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘बॉबी’ का गाना बज रहा था- ‘हम तुम एक कमरे में बंद हों, और चाबी खो जाए…’

अचानक, गाने को बीच में ही रोक दिया गया। रेडियो पर कुछ सेकेंड्स के लिए सन्नाटा पसर गया। फिर अनाउंसर की गंभीर आवाज गूंजी- ‘एक महत्वपूर्ण प्रसारण की प्रतीक्षा करें…’

रेडियो सुन रहे लोगों की सांसें थम गईं। कुछ ही सेकेंड्स के बाद अनाउंसर ने बताया- ‘आज सुबह 8 बजकर 5 मिनट पर भारत ने एक अज्ञात जगह पर भूमिगत परमाणु परीक्षण किया है।’

यह भारत का ‘स्माइलिंग बुद्धा’ मिशन था। यानी भारत ने परमाणु बम बनाने की टेक्नोलॉजी हासिल कर ली थी।

पोकरण की वो जगह, जहां 1974 में परमाणु परीक्षण किया गया। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी उस जगह पहुंची थीं।

पोकरण की वो जगह, जहां 1974 में परमाणु परीक्षण किया गया। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी उस जगह पहुंची थीं।

जब ये खबर रेडियो पर चल रही थी, तब नीदरलैंड्स में बैठा एक शख्स भी कान लगाए हुए था। उसका नाम था- ‘अब्दुल कदीर खान।’

आजादी से पहले भोपाल में जन्मे कदीर खान उन दिनों नीदरलैंड्स में एक जर्मन यूरेनियम लैबोरेटरी में काम कर रहे थे।

अमेरिकी पत्रिका ‘फॉरेन अफेयर्स’ के मुताबिक- ‘जैसे ही कदीर खान को पता चला कि हिंदुस्तान ने परमाणु बम बना लिया है, उन्होंने सीधे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को चिट्ठी लिखी।

कदीर खान ने लिखा- ‘हिंदुस्तान के परमाणु परीक्षण ने हमारे अस्तित्व को खतरे में डाल दिया है। पाकिस्तान को बिना देर किए परमाणु बम बनाना चाहिए। मेरे पास वह समझ और पहुंच है, जो पाकिस्तान को परमाणु ताकत वाला मुल्क बना सकता है। मैं काम करने को तैयार हूं।’

चिट्ठी मिलते ही भुट्टो ने कदीर खान के इस ऑफर को मान लिया और हर मुमकिन मदद का भरोसा भी दिया। कदीर खान अपने मिशन में जुट गए।

इधर, अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA और नीदरलैंड्स की खुफिया एजेंसियां उनके पीछे पड़ गईं। एजेंसियों को पता चल चुका था कि खान चोरी-छिपे परमाणु बम बनाने की टेक्नोलॉजी और डिजाइनों का अध्ययन कर रहे हैं।

हालांकि, एजेंसियों ने तुरंत गिरफ्तार करने के बजाय, उनकी जासूसी करने का फैसला किया। क्योंकि, उनकी नजर सिर्फ एक व्यक्ति तक नहीं थी। वे पाकिस्तान के पूरे नेटवर्क का पता लगाना चाहते थे।

कदीर खान भी कम शातिर वैज्ञानिक नहीं थे। जल्द ही उन्हें आभास हो गया कि चौबीसों घंटे उनकी निगरानी की जा रही है। उनके फोन टैप हो रहे हैं। अगर वे जरा भी चूके, तो यूरोप की जेलों में उन्हें सड़ना होगा।

दिसंबर 1975 की एक सर्द रात। नीदरलैंड्स के यूरेनियम प्लांट के बरामदे में सन्नाटा पसरा था। भारी ओवरकोट पहने कदीर खान तेजी से आगे बढ़ रहे थे। अचानक उनके कदम एक दरवाजे के सामने रुक गए, जिस पर लाल अक्षरों में लिखा था- ‘प्रतिबंधित एरिया’।

खान ने गर्दन घुमाकर चारों तरफ देखा। कोई नजर नहीं आ रहा था। उन्होंने कोट की अंदरूनी जेब से एक मास्टर चाबी निकाली। चाबी घूमते ही महीन सी ‘क्लिक’ की आवाज हुई और दरवाजा खुल गया।

अंदर टेबल पर एक ब्रीफकेस रखा था। खान ने फुर्ती से उसका लॉक खोला। भीतर रखे डिजाइन्स और ब्लूप्रिंट्स को निकालकर ओवरकोट में छुपा लिया। दबे पांव बाहर निकले। दरवाजा बंद किया और अंधेरे में गुम हो गए।

कुछ देर बाद… खान अपने घर के एक बंद कमरे में थे। टेबल लैंप की मद्धम रोशनी में उनके साथ 35-40 साल का भरोसेमंद असिस्टेंट बैठा था। खान एक-एक कर सीक्रेट फाइलें बढ़ाते जा रहे थे और असिस्टेंट उनका अंग्रेजी में अनुवाद करता जा रहा था। दो घंटे की मशक्कत के बाद अनुवाद पूरा हो गया।

डॉ. अब्दुल कदीर खान अपने सहयोगी के साथ बम बनाने वाले सीक्रेट डॉक्यूमेंट का अनुवाद कराते हुए। AI इमेज

डॉ. अब्दुल कदीर खान अपने सहयोगी के साथ बम बनाने वाले सीक्रेट डॉक्यूमेंट का अनुवाद कराते हुए। AI इमेज

तड़के 4 बजे। एम्सटर्डम एयरपोर्ट कोहरे की चादर से लिपटा हुआ था। कदीर खान बीवी और बच्चों के साथ पाकिस्तान जाने वाले जहाज में बैठ चुके थे। जैसे ही जहाज आसमान की ऊंचाइयों में ओझल हुआ, खान ने खिड़की से बाहर देखते हुए गहरी सांस ली।…’Now we are safe.’

उधर, एम्सटर्डम एयरपोर्ट के कंट्रोल रूम में डच खुफिया एजेंसी के अफसरों के होश उड़े थे। वे बदहवासी में सुरक्षा कैमरों की फुटेज खंगाल रहे थे। कुछ अफसर गाड़ियां दौड़ाते हुए खान के घर की तरफ भागे, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी।

अगले दिन, इस्लामाबाद में प्रधानमंत्री आवास। बंद कमरे में प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो, सेना के टॉप अफसर और ISI प्रमुख के सामने वो फाइल और ब्लूप्रिंट्स रखे थे।

भुट्टो ने सिगार का धुआं छोड़ते हुए खान से कहा- ‘डॉक्टर साहब, क्या इन कागजातों के दम पर हम एटम बम बना लेंगे।?’

खान की आंखों में एक चमक उभरी, ‘बिल्कुल जनाब। अगर हमें इसका सामान मिल जाए, तो एटम बम सिर्फ एक ख्वाब नहीं, हकीकत होगा।’

भुट्टो के चेहरे पर मुस्कान तैर गई। उन्होंने मेज पर मुट्ठी मारी और मंजूरी दे दी- ‘चलिए, अपने काम में जुट जाइए। हुकूमत आपके साथ है।’

कुछ दिन बाद…रावलपिंडी के पास कहूटा की बंजर, पथरीली और वीरान पहाड़ियां फौज के बूटों की थाप से गूंज उठीं। भारी मशीनें दिन-रात कंक्रीट उगल रही थीं।

देखते ही देखते, एक बड़ी सी बिल्डिंग के मेन गेट पर बोर्ड टांग दिया गया, जिस पर लिखा था- ‘खान रिसर्च लैबोरेट्रिज’।

धूल और कंक्रीट के उस बवंडर के बीच, सिर पर सेफ्टी हेलमेट पहने कदीर खान एक ऊंची पहाड़ी पर खड़े थे। तभी एक सीनियर अफसर उनके पास आया। बोला- ‘मुबारक हो डॉक्टर खान… आज से आप इस लैब के डायरेक्टर और चीफ साइंटिस्ट हैं। हिंदुस्तान को बता दीजिए कि अब हमारे पास भी एटमी ताकत है।’

खान ने कहूटा की पहाड़ियों को देखा। कुछ कहा नहीं, बस मुस्कुराते रहे।

डॉ. अब्दुल कदीर खान कहूटा में बन रहे परमाणु कार्यक्रम का मुआयना करते हुए। AI इमेज

डॉ. अब्दुल कदीर खान कहूटा में बन रहे परमाणु कार्यक्रम का मुआयना करते हुए। AI इमेज

कदीर खान के पास बम बनाने की चोरी की गई टेक्नोलॉजी तो थी, लेकिन उसके लिए जरूरी कच्चा माल और क्रिटिकल पार्ट्स पाकिस्तान में उपलब्ध नहीं थे। उस दौर में यूरोप की कुछ गिनी-चुनी कंपनियां ही ऐसे संवेदनशील टेक्निकल पार्ट्स बनाती थीं।

पाकिस्तान सीधे उन कंपनियों से डील करता, तो उसका मिशन लीक हो जाता। RAW या अमेरिका की CIA को तुरंत भनक लग जाती कि पाकिस्तान एटम बम बना रहा है।

इस सीक्रेसी को बनाए रखने के लिए पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों ने एक तरकीब निकाली। उन्होंने दुनिया के अलग-अलग हिस्सों जैसे- स्विट्जरलैंड, ब्रिटेन, जर्मनी और दुबई में फर्जी कंपनियां बना लीं।

इन फर्जी कंपनियों के जरिए इंडस्ट्रियल सामान खरीदने के बहाने बम बनाने के पार्ट्स खरीदे जाने लगे। इन पार्ट्स को अलग-अलग रास्तों से घुमाकर पाकिस्तान लाया जाने लगा।

इस मिशन को नाम दिया गया- ‘प्रोजेक्ट 706.’

इसी दौरान, भारत में बड़ा सियासी उलटफेर हुआ। देश में लगे आपातकाल के बाद मार्च 1977 में लोकसभा चुनाव हुए। कांग्रेस को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी। इंदिरा गांधी खुद चुनाव हार गईं।

जनता पार्टी ने 542 में से 296 सीटें जीत लीं। पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। कभी इंदिरा गांधी सरकार में वित्त मंत्री रहे मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बन गए।

इसके कुछ ही महीनों बाद, सरहद पार पाकिस्तान में भी एक खूनी उलटफेर हो गया। 5 जुलाई 1977 को जनरल जिया-उल-हक ने सैन्य तख्तापलट करते हुए प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को सत्ता से बेदखल कर दिया।

देश में मार्शल लॉ लागू कर दिया, केंद्र और सभी प्रांतीय सरकारों को भंग करके खुद को पाकिस्तान का राष्ट्रपति घोषित कर दिया। दो साल बाद यानी 1979 में भुट्टो को भ्रष्टाचार के एक मामले में फांसी दे दी गई।

साल 1977-78, ट्रायल के लिए पुलिस जुल्फिकार अली भुट्टो को लाहौर हाईकोर्ट ले जाती हुई।

साल 1977-78, ट्रायल के लिए पुलिस जुल्फिकार अली भुट्टो को लाहौर हाईकोर्ट ले जाती हुई।

अब पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम की कमान सीधे जनरल जिया-उल-हक के हाथों में आ चुकी थी। कहूटा में फौज का दखल और सख्त हो गया। खान रिसर्च लैबोरेट्रिज की सुरक्षा ऐसी सख्त कर दी गई कि परिंदा भी पर नहीं मार सकता था। चारों तरफ तोपें और मॉडर्न रडार तैनात कर दिए गए।

पाकिस्तान सोच रहा था कि उसका यह राज कोई जान नहीं पाएगा, लेकिन मार्च 1979 में जर्मन ब्रॉडकास्टर ZDF ने एक डाक्यूमेंट्री जारी कर दी।

इस डॉक्यूमेंट्री में बताया गया कि कदीर खान ने नीदरलैंड्स से परमाणु बम बनाने की डिजाइन चुराई है। वे पाकिस्तान में परमाणु बम बना रहे हैं।’

पाकिस्तान परमाणु बम बना रहा है, लेकिन कहां?… इसकी पुख्ता जानकारी किसी एजेंसी के पास नहीं थी।

पाकिस्तान में मौजूद RAW के अंडरकवर एजेंट्स दिन-रात कड़ियों से कड़ियां जोड़ने में लगे थे, लेकिन उनके हाथ कोई खास सुराग नहीं लग रहा था।

तभी इस मिशन में एंट्री हुई- इजराइल के मोसाद की। मोसाद दुनिया की सबसे खतरनाक खुफिया एजेंसी मानी जाती है।

इजराइल हरगिज नहीं चाहता था कि किसी इस्लामिक मुल्क के पास परमाणु बम हो। उसे डर था कि इस ‘इस्लामिक बम’ का इस्तेमाल आगे चलकर उसके विनाश का कारण बन सकता है।

यहां से ‘RAW’ और ‘मोसाद’ के बीच एक सीक्रेट और अघोषित साझेदारी की शुरुआत हुई। दोनों एजेंसियां पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम को भेदने में जुट गईं।

उसी दौरान, अमेरिकी खुफिया विभाग में काम करने वाले एक सीनियर अफसर रॉबर्ट गैलुची किसी तरह कहूटा जा पहुंचे, लेकिन पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियों ने उनकी गाड़ी रोक ली। गैलुची ने बताया कि वे कहूटा की पहाड़ियों में पिकनिक मनाने आए हैं।

कहूटा पिकनिक स्पॉट था तो जरूर, लेकिन पाकिस्तानी फौज इतनी मूर्ख नहीं थी। उन्होंने अमेरिकी अधिकारी को फौरन इस्लामाबाद भेज दिया।

कुछ महीने बाद पाकिस्तान में तैनात फ्रांस के राजदूत ने भी कहूटा जाने की भरपूर कोशिश की, लेकिन पाकिस्तानी फौज की नजर से वे बच नहीं सके।

फौज ने न सिर्फ उनकी गाड़ी रोकी, बल्कि बेरहमी से पिटाई भी कर दी। इसके चलते फ्रांस और पाकिस्तान के बीच मनमुटाव भी हो गया।

कहूटा के चारों तरफ बिखरी इन घटनाओं ने भारत की खुफिया एजेंसी RAW के कान खड़े कर दिए थे, लेकिन अभी तक जो भी जानकारियां थीं, वे महज कयास, सुनी-सुनाई बातें या विदेशी रिपोर्टों पर आधारित थीं।

कहूटा के भीतर झांकने और उस परमाणु प्रोजेक्ट को बेनकाब करने के लिए भारत को एक ऐसे सबूत की जरूरत थी, जिसे झुठलाया न जा सके। तभी भारत के जासूसों के हाथ कुछ ऐसा लगा जिसे जानकर दुनिया चौंक गई।

*****

पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल जिया अक्सर भारत के पीएम मोरारजी देसाई को फोन करते थे। देसी दवाओं और मूत्र चिकित्सा पर सलाह लेने के बहाने। मोरारजी इस पर गद्गद हो जाते थे।

जिया गंभीरता दिखाते हुए उनसे पूछते- ‘जनाब, एक दिन में कितनी बार मूत्र पीना चाहिए? क्या ये सुबह का पहला मूत्र होना चाहिए या दिन के किसी भी वक्त का?’

उस रोज भी जनरल जिया का फोन आया था, पर उस दिन मोरारजी देसाई नेचर थेरेपी बताने के मूड में नहीं थे। वे परेशान थे। गुस्से में थे। पूरी कहानी कल यानी रविवार को पढ़िए ‘ऑपरेशन कहूटा’ पार्ट-2…

रेफरेंस : 1. Raja ramanna years of pilgrimage. 2. Kahuta: The Indo-Israeli Plan to Attack Pakistan’s Nuclear Plant. 3. The man from Pakistan.



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *