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'ट्रांसफर-ऑडियो' वाले नेताजी का 'प्रमोशन':सड़क मांगी तो 'कचरा' बिछा दिया; रोडवेज बस का 'पहला फेरा'




नमस्कार, भाजपा के एक नेताजी पैसे लेकर भी अध्यापक का ट्रांसफर नहीं करा पाए थे, उनका प्रमोशन हो गया है। कॉलोनीवालों ने नगरपालिका से सड़क की डिमांड की तो कचरा लाकर डाल दिया गया और क्या हुआ जब गांव में जब पहली बार राजस्थान रोडवेज की बस पहुंची। राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में… 1. ‘ट्रांसफर’ वाले नेताजी का प्रमोशन गहलोत साहब ने एक बार शिक्षकों से पूछा- क्या ट्रांसफर में पैसे लिए जाते हैं? सारे टीचर एक सुर में बोले- हां, पैसे लिए जाते हैं। निशाना न चाहते हुए भी चीफ साहब बने और तीर सीधे दिल में उतर गया। यह टीस अब तक भी दर्द देती है। हालांकि गहलोत साहब कह चुके हैं कि शिक्षा विभाग में भ्रष्टाचार आम बात है। खैर, हम उस विषय की बात नहीं कर रहे। दूसरी पार्टी की बात कर रहे हैं। भाजपा के एक नेताजी हैं। नाम है राजेंद्र मीणा शेखपुरा। उनका एक ऑडियो वायरल हुआ था। ऑडियो में एक शिक्षक उन्हें लताड़ रहा था। ट्रांसफर के लिए दिए गए 25 हजार रुपए लौटाने की बात कर रहा था। नेताजी बहुत ही सभ्य और संभली जुबान में मास्टर जी को ठंडा कर रहे थे। उस समय मुद्दा खूब उछला। सवाल पूछे गए कि ऐसे नेताओं पर नकेल कब कसी जाएगी? लेकिन चूंकि गहलोत जी के मुताबिक शिक्षा विभाग में भ्रष्टाचार आम बात है। तो इस आम बात को आम ही रखा गया और नेताजी ने जिस तरह मास्टर जी को ठंडा किया, वह उनकी खास प्रतिभा करार दी गई। इसी प्रतिभा को बड़े नेताओं ने पहचाना और नेताजी का प्रमोशन करते हुए उन्हें किसान मोर्चा का प्रदेश उपाध्यक्ष बना दिया। शिक्षकों का तो पता नहीं, उम्मीद है किसानों का नेताजी जरूर भला करेंगे। 2. सड़क मांगी तो कचरा दे दिया 1961 में आई फिल्म ‘जब प्यार किसी से होता है’ में हसरत जयपुरी साहब ने गीत लिखा था- तेरी जुल्फों से रिहाई तो नहीं मांगी थी, प्यार मांगा था जुदाई तो नहीं मांगी थी। संत कबीर ने भी डिमांड और सप्लाई को लेकर एक महान दोहा लिखा- बिन मांगे मोती मिले, मांगे मिले न भीख। कभी-कभी ऐसी परिस्थिति बन जाती है कि जो मांगा, वह नहीं मिलता। आम लोगों के साथ यह परिस्थिति बार-बार बन सकती है। खास तौर पर शासन-प्रशासन के संदर्भ में। तो बात भरतपुर के नदबई की है। यहां टीचर्स कॉलोनी में सड़क नहीं थी। लोगों ने बीसों बार जाकर नगरपालिका में मांग रखी, तब जाकर सड़क मंजूर हो गई। वर्कऑर्डर भी जारी हो गया। इसके बाद भी जब सड़क नहीं बनी तो लोग बार-बार अधिकारियों के पास पहुंचने लगे। ऐसे में नगरपालिका ने कॉलोनी में रोड़ी-गिट्‌टी की जगह डंपिंग यार्ड में डाले जाने योग्य कूड़ा-करकट, गंदगी, कचरा और मलबा कॉलोनी की सड़कों पर डलवा दिया। इस कोढ़ में खाज तब हुई, जब बारिश हो गई। घरों के सामने सड़क की जगह दुर्गन्ध मारता गंदा नाला नजर आने लगा। स्कूली बच्चे फिसलकर गिरने लगे। बाइकों के टायर धंसने लगे। विदेशों में कचरे से सड़क बनाने के आविष्कार के बारे में तो सुना है, नदबई नगरपालिका ने करके दिखा दिया। 3. चलते-चलते… पहली झलक की बात ही कुछ और होती है। बरसों बरस वह झलक यादों में बस जाती है। अजमेर में भिनाय इलाके के गांवों कुरथल और कैरोट में लोग ऐसा ही महसूस कर रहे हैं। अब तक इन गांवों में सरकारी बसें नहीं पहुंचती थीं। गंतव्य तक जाने के लिए प्राइवेट साधनों का सहारा लिया जाता था। दोनों गांवों में जब केकड़ी डिपो की बस हॉर्न बजाते पहुंची तो उत्सव जैसा माहौल हो गया। लोग सीटी बजाने लगे। खुशी से नाचने लगे। बस पर फूल बरसाए। ड्राइवर और कंडक्टर का साफा बांधकर स्वागत किया। महिलाओं ने मंगल गीत गाए। यह सब उस दौर की तस्वीरें हैं, जब मोबाइल की स्क्रीन पर सारी दुनिया आपस में कनेक्ट है। लेकिन ग्राउंड पर कनेक्ट होने का मतलब कुछ और है। एक सीख यह भी कि अगर आप सोचते हैं कि आप अपनों से मोबाइल के जरिए कनेक्ट हैं, वीडियो कॉल कर रहे हैं, कॉल कर रहे हैं, ऑनलाइन पैसा भेज रहे हैं, सारी जरूरतें पूरी कर रहे हैं। तो आप भ्रम में हैं। आपकी सशरीर मौजूदगी ही असली कनेक्टिविटी है। इनपुट सहयोग- अभय शर्मा (नदबई, भरतपुर)। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल सुबह 7 बजे मुलाकात होगी।



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