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5 सेकेंड में 1 लाख उड़ाए, FIR 5 दिन में:साइबर फ्रॉड जांच में पुलिस का रवैया नहीं बदला, हाईकोर्ट भी लगा चुका फटकार




साइबर अपराधी मिनटों में लोगों की गाढ़ी कमाई लूट रहे हैं, जबकि पुलिस की कार्रवाई अब भी बेहद धीमी है। यह टिप्पणी मप्र हाईकोर्ट के जस्टिस हिमांशु जोशी ने साइबर ठगी के एक मामले की सुनवाई के दौरान की थी। कोर्ट ने ऑनलाइन ठगी के मामलों में एमपी पुलिस की सुस्त कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा था कि तकनीकी विशेषज्ञता और पुलिसिंग को साथ लाकर साइबर अपराधों से निपटना होगा। इसके बावजूद पुलिस की कार्यशैली में खास बदलाव नहीं दिखा। इंदौर के एक मामले में ठगों ने 5 सेकेंड में खाते से 1 लाख रुपए निकाल लिए, लेकिन एफआईआर दर्ज होने में 5 दिन लग गए। भास्कर की पड़ताल में ऐसे कई मामले सामने आए, जो पुलिस की धीमी और गैरजिम्मेदाराना कार्यप्रणाली की ओर इशारा करते हैं। तीन मामलों से समझिए पुलिस की धीमी कार्रवाई केस-1: पुलिस ने थाने-थाने भटकाया, बैंक ने कहा- खुद संपर्क करें बलराम जोशी के अनुसार, उनके खाते से 5 सेकेंड में 1 लाख रुपए निकल गए। रात करीब 8:30 बजे उन्हें लगातार 9,999 रुपए के कई ट्रांजेक्शन के मैसेज मिले, जबकि उन्होंने कोई भुगतान नहीं किया था। रकम एक यूपीआई आईडी पर ट्रांसफर हुई। अगले दिन वे बैंक पहुंचे, जहां उन्हें 1930 हेल्पलाइन या साइबर सेल जाने की सलाह दी गई। साइबर सेल ने एरोड्रम थाने भेजा, जबकि वहां से गोमठगिरी थाना भेज दिया गया। गोमठगिरी थाने ने फिर मामला एरोड्रम क्षेत्र का बताते हुए लौटा दिया। चार दिन तक बैंक, साइबर सेल और थानों के चक्कर लगाने के बाद 9 जुलाई को एफआईआर दर्ज हुई। केस-2: बैंक ने जिम्मेदारी से किया किनारा धार रोड स्थित वर्मा यूनियन अस्पताल में रेडियोलॉजी विभाग में कार्यरत सचिन बनोधा ने बताया कि उनके एक्सिस बैंक के क्रेडिट कार्ड के रिवॉर्ड पॉइंट रिडीम कराने के बहाने खुद को बैंक अधिकारी बताने वाला व्यक्ति कई दिनों तक कॉल करता रहा। एक लिंक पर क्लिक करते ही ओटीपी स्वतः भर गया और कार्ड से 50 हजार रुपए कट गए। बनोधा का आरोप है कि बैंक ने इसे उनकी जिम्मेदारी बताया। साइबर सेल में शिकायत के बावजूद करीब 14 दिन बाद एफआईआर दर्ज हुई। केस-3: 1 लाख की ठगी, पुलिस से नहीं मिला सहयोग बड़वाह से हाल ही में इंदौर आई एक युवती ऑनलाइन जॉब दिलाने के झांसे में आ गई। अलग-अलग ट्रांजेक्शन के जरिए उससे 12 बार में कुल 1,03,062 रुपए ठग लिए गए। आखिरी ट्रांजेक्शन 7 जुलाई को हुआ। ठगी का पता चलने पर उसने एरोड्रम थाने में शिकायत की और 9 जुलाई को एफआईआर दर्ज हुई। युवती का कहना है कि पुलिस ने आठ दिन बाद बुलाने की बात कही थी, लेकिन अब तक न तो कोई संपर्क किया गया, न राशि वापस मिली और न ही आरोपी पकड़े गए। साइबर एक्सपर्ट बोले- ठगी के मामलों में पहले 24 घंटे सबसे अहम डिजिटल साइबर विशेषज्ञ ईश्वर भारद्वाज के अनुसार, साइबर ठगी के मामलों में डिजिटल लॉग सबसे अहम साक्ष्य होते हैं। मनी ट्रांजेक्शन रिकॉर्ड, डिवाइस फिंगरप्रिंट, आईपी एड्रेस, ऑथेंटिकेशन लॉग, एनपीसीआई ऑडिट ट्रेल और पेमेंट गेटवे लॉग शुरुआती चरण में सुरक्षित कर लिए जाएं तो आरोपियों की पहचान और ठगी गई राशि की रिकवरी की संभावना काफी बढ़ जाती है। पहले 24 घंटे सबसे अहम होते हैं। उन्होंने कहा कि बैंकों की जिम्मेदारी है कि हर वित्तीय लेन-देन की सूचना ग्राहकों तक तुरंत एसएमएस, ई-मेल या अन्य माध्यम से पहुंचे, ताकि पीड़ित समय रहते बैंक, 1930 हेल्पलाइन और साइबर पुलिस को सूचना देकर खाते को सुरक्षित करा सके। पुलिस अफसर बोले- मामला दर्ज करने में देरी नहीं होती साइबर पुलिस के डीएसपी नरेंद्र रघुवंशी ने कहा कि अब मामला दर्ज करने में देरी नहीं होती। सरकार की गाइडलाइन के अनुसार 25 हजार रुपए से अधिक की साइबर ठगी होने पर पीड़ित 112 या 1930 हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज करा सकता है। आवश्यक जानकारी लेने के बाद जीरो एफआईआर संबंधित थाने भेजी जाती है, जहां भौतिक साक्ष्य जुटाकर आगे की कार्रवाई की जाती है।



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